
चने की खेती के लिए आधुनिक और उन्नत तरीके Publish Date : 20/10/2026
चने की खेती के लिए आधुनिक और उन्नत तरीके
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
चने की खेती के बारे में पूरी जानकारी
कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली फसल का चयन करना किसानों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि सभी फसलें अलग-अलग उत्पाद देती हैं। ऐसे में जब चने की फसल की बात आती है तो इसकी खेती के लिए बेहतर और स्मार्ट तरीकों को अपनाकर फसल में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। पूरे भारत में चना का उत्पादन किया जाता है, क्योंकि चने की फसल उच्च तापमान का सामना कर सकती है और चावल या किसी अन्य अनाज वाली फसल की तुलना में अच्छी उपज भी प्रदान करती है।
चने की बुवाई का उपयुक्त समय
किसान अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक असिंचित दशा में चना की बुवाई कर देनी चाहिए साथ ही चने की बुवाई धान की फसल की कटाई करने के बाद भी की जाती है, ऐसी स्थिति में बुआई दिसंबर के मध्य तक अवश्य कर देनी चाहिए। इस फसल में चना फली भेदक का प्रकोप अधिक होने की संभावना बनी रहती है। इसलिए अक्टूबर के पहले सप्ताह चने की बुवाई के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।
चने की उन्नत किस्में
जी.एन.जी. 1958
चने के किसानों के लिए जीएनजी 1958 एक अच्छी उपज देने वाली किस्म है जो कि चने की खेती के लिए काफी लाभकारी पाई गई है। चने की इस किस्म की खेती के लिए केवल एक सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिससे पानी की बचत होती है। जबकि दोमट मिट्टी में यह फसल दो सिंचाइयों में पककर तैयार हो जाती है और जीएनजी 1958 चने के 100 दानों का वजन 26 ग्राम होता है। इस किस्म में का कीट उवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है जिससे किसानों की लागत कम हो जाती है। चने की यह किस्म 120 से 125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके साथ ही चने की यह किस्म प्रति हेक्टेयर 18 से 24 औसत तक उपज देती है।
जे.जी. 14
चने की यह किस्म एक तेजी से बढ़ने वाली किस्म है और 100 दिनों में अपने उत्कृष्ट उत्पाद प्रदान करती है और यह किस्म प्रति हेक्टेयर 20 से 25 क्विंटल तक उपज प्रदान करती है, जिसमें कीटों का प्रकोप कम होता है। चने की इस किस्म को भी कम पानी की आवश्यकता होती है, इस किस्म में एक पंक्ति में अधिक मात्रा में पौधों को लगाने से उत्पादन में अच्छी बढोत्तरी प्राप्त की जा सकती है। यह छोटी अवधि की खेती के लिए भी एक उपयुक्त किस्म है।
चने की उन्नत खेती के लिए चने की बुवाई किसान भाईयो को समय में सीडड्रिल की सहायता से करनी चाहिए और यदि आपके खेत में पौधों की संख्या कम हो तो बीज को लेकर खाली स्थानों में बुवाई की जा सकती है। पौध की संख्या 25 से 30 प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से बना कर सुनिश्चित करें। पंक्तियों के बीच की दूरी 30 से.मी रखें और साथ ही बीज उपचार करने के बाद चने की बुवाई करें। चने की पिछेती बुवाई करने की दशा में कम वृद्धि के कारण चने की उपज में होने वाली क्षति की संभावना को कम करने के लिए सामान्य बीज दर से 20-25 की दर से बुवाई करें। विलंब से बुवाई करने की स्थिति में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से.मी. रखें।
इसके अलावा इस बात का विशेष ध्यान रखें कि चने के बीज को बहुत अधिक गहराई में बोना चाहिए। इससे फसल को काटने का काम मुश्किल हो सकता है और उपचारों की संख्या भी कम हो सकती है। चने की अच्छी पैदावार और उपज प्राप्त करने के लिए बीज की गहराई 2 सेमी से अधिक न रखें।
चने की खेती के लिए उपयुक्त खाद एवं उर्वरक
चने की खेती में खाद, उर्वरक और कीटनाशक का प्रयोग मिट्टी की जांच के आधार पर किया जाना चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 20-25 किग्रा. एनपीके, 50-60 किग्रा. फॉस्फोरस 50-60 किग्रा. नाइट्रोजन एवं 20 किग्रा. पोटाश और 20 किग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए। असिंचित दशाओं में 2 किग्रा. जिंक या डी.ए.पी. का फ़सल पर प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है।
चने की खेती के लिए आवश्यक सिंचाई
जैसा कि आप जानते हैं किसान भाइयों के लिए चने की फसल के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है। सिंचिंत क्षेत्र में चने की खेती के लिए 3 से 4 सींचना ही करनाल। इसकी अंतिम खोज अंतिम सील के 35-40 दिन बाद पहली सीलिंग, 70-80 दिन बाद दूसरी सील और अंतिम सील 105-110 दिन बाद की स्थापना। ओर किसान भाइयों इस बात का विशेष ध्यान रखें कि फसल को अधिक पानी नहीं दे इस से जड़त्व और पोषक तत्व की कमी हो सकती है, ओर कम पानी देने से वृद्धि रुक सकती है और निर्माण की समस्या हो सकती है। इस फ़सल को पर्याप्त पानी ही दे
चना की खेती के लिए मौसमी हरी खाद प्राप्त करें
किसान भाईयों चना एक पौधे वाले वातावरण की फसल है जिसे रबी सीजन में बोया जाता है। चने की खेती के लिए मध्यम वर्षा और पौधे वाले का क्षेत्र सर्वाेच्च है। फसल में फूल आने के बाद वर्षा से उत्पादन में कमी आती है, क्योंकि वर्षा के कारण फूल परकन परकोश से निकल कर एक दूसरे से चिपक जाती है, जिससे बीज नहीं बन पाता है, फसल के दाना के समय 30 कोल से कम और 300 कोल से उच्च तापक्रम क्षति रहती है।
चने की खेती में होने वाली क्षति
किसान भाईयों जैसा कि आप जानते हैं कि चने की खेती में हिरणखुरी, गाजरी, प्याजी, हिरणखुरी, गाजरी, प्याजी, मोथा, बथुआ जैसे विभिन्न खरपतवारों की उपज में 40 से 50 प्रतिशत की कमी होती है, लेकिन किसानों को आवश्यक तत्व नहीं मिलते और छोटी रह जाती है जिससे की खेती में कमी के साथ फसल की गुणवत्ता पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
चने की खेती में खरपतवार नियंत्रण के उपाय
किसान खेत में विभिन्न प्रकार की घासों को पैदा होने से रोकने के लिए 2 से 3 दिन बाद प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी के अंदर 700 मिली लीटर पेंडीमेथिलीन और 38.8 सीएस कुल मिलाकर किसान खेत में विभिन्न प्रकार की घासों को पैदा करने से रोक लगा दी। और साथ ही प्रति चॉकलेट में 200 ग्राम एट्राजिन का प्रयोग किया जा सकता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।