
जिसे खोज रहे हो वह तो आपके भीतर ही है Publish Date : 25/09/2026
जिसे खोज रहे हो वह तो आपके भीतर ही है
प्रो0 आर. एस. सेंगर
मनुष्य जीवन भर उत्तरों की खोज करता रहता है। वह जानना चाहता है कि ईश्वर है या नहीं, संसार क्यों बना, मृत्यु के बाद क्या होता है, कर्म क्या है, भाग्य क्या है, सुख कहां है, दुख क्यों है आदि। ये प्रश्न स्वाभाविक हैं। लेकिन क्या तुमने कभी यह देखा है कि इन सब सवालों को पूछने वाला कौन है? तुम्हारा मन बाहर की ओर दौड़ता है। वह हर घटना का कारण जानना चाहता है। पर जिसने यह जिज्ञासा उठाई, उसे जानने का प्रयास मनुष्य बहुत कम करता है। यह ऐसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति वृक्ष के हरेक पत्ते का अध्ययन करे, किंतु यह न देखे कि आखिर यह निकला किस जड़ से है।
मैं केवल इतना कहता हूं कि एक क्षण रुक कर उस 'मैं' को देखों जो हर अनुभव में सबसे पहले उपस्थित होता है। तुम कहते हो- मैं सोचता हूं, मैं दुखी हूं, मैं प्रसन्न हूं। पर ये 'मैं' है कौन? तुम्हारे ज्यादातर प्रश्न वास्तव में संसार के नहीं हैं, बल्कि वे उस 'मैं' की अस्थिरता से निकलते हैं, जिसे तुम अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठे हो। जब यह 'मैं' स्वयं को शरीर मानता है, तब उसे मृत्यु का डर सताता है। इसलिए प्रश्नों से लड़ो मत। उनके स्रोत को देखो। हर प्रश्न के पीछे एक 'मैं' बैठा है, जो स्वयं को सीमित मानता है। उसी सीमितता से भय जन्म लेता है व भय से सवालों की लंबी श्रृंखला। जब तुम पूछते हो- मैं कौन हूं? तब वह तुम्हारी चेतना को उसी दिशा में मोड़ देता है, जहां से सभी अनुभव उत्पन्न होते हैं।
धीरे-धीरे तुम देखोगे कि 'मैं' एक विचार की तरह उठता है। जागते ही सबसे पहले 'मैं' का भाव आता है और उसके बाद संसार उपस्थित हो जाता है- मेरा परिवार, मेरी स्मृतियां, मेरी योजनाएं। यदि इस प्रथम विचार की जांच कर ली जाए, तो उसके पीछे एक मौन उपस्थिति दिखाई देने लगती है, जो किसी विचार पर निर्भर नहीं है। वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। ज्ञानी व अज्ञानी दोनों एक ही संसार में रहते हैं, पर उनका अनुभव एक जैसा नहीं होता। अज्ञानी हर घटना को अपने छोटे-से 'मैं' से जोड़ता है।
ज्ञानी उसी घटना को आते-जाते हुए देखता है। वह भागता नहीं, चिपकता नहीं। वह जीवन के साथ संघर्ष नहीं करता, क्योंकि उसने स्वयं को जीवन से अलग मानना छोड़ दिया है। इसलिए मैं यह नहीं कहता कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद तुम्हारे पास कोई प्रश्न नहीं रहेगा। मैं केवल यह कहता हूं कि प्रश्न पूछने वाला बदल जाएगा। अंतर केवल इतना है कि अब तुम उसे अपने भय, इच्छाओं और अहंकार की धुंध से नहीं देखोगे। इसलिए यदि तुम सचमुच सभी प्रश्नों का अंत चाहते हो, तो प्रश्नों की संख्या कम मत करो। उस पहले प्रश्न को पूरी गंभीरता से पूछो, जिससे सब प्रश्न जन्म लेते हैं- मैं कौन हूं? जब यह प्रश्न अपने अंतिम मौन में विलीन हो जाता है, तब कोई विजेता नहीं बचता, कोई पराजित नहीं बचता।
केवल वही शांति शेष रहती है, जिसे न शब्द व्यक्त कर सकते हैं, न विचार पकड़ सकते हैं। उसी शांति में ज्ञात होता है कि खोज कभी बाहर थी ही नहीं, खोजने वाला ही वह था, जिसे खोजा जा रहा था।
लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।
