दिमागी नक्सल की पहचान      Publish Date : 05/09/2026

             दिमागी नक्सल की पहचान

                                                                                                               प्रो0 आर. एस. सेंगर

नक्सल शब्द वैसे तो एक गांव नक्सलबाड़ी से आया, जब 70 के दशक में इस गांव के लोगों ने सशस्त्र विद्रोह किया और कट्टरपंथी कम्युनिस्ट नेताओं ने हथियार के रूप में इसका प्रयोग किया। आगे चल कर समाज को तहस नहस करने, अराजकता का वातावरण बनाने तथा सशस्त्र विद्रोह के कम्युनिस्ट आतंकवाद बाद को एक नाम मिल गया जिसे नक्सलवाद कहा जाने लगा।

नक्सलवाद अनेक दशकों तक भारत के अनेक राज्यों की सबसे बड़ी समस्या बना रहा जहां कम्युनिस्ट संगठन और उनके नेता इन क्षेत्रों के लोगों को विकास की मुख्य धारा से वंचित रखने का प्रयास करते थे, जिससे कि वहां के निर्धन और अशिक्षित नागरिक इनकी मंशाओं के अनुरूप हथियार की तरह प्रयुक्त होते रहें। नक्सलवाद के प्रभाव में अपने ही देश के नागरिक अपनी ही सेनाओं पुलिस और संस्थाओं के विरुद्ध वर्षों तक लड़ते रहते हैं और बदले में अपने परिवार गांव और क्षेत्र को पीछे धकेलते रहते हैं।

इसका भुक्त भोगी समाज अब इससे मुक्त हो गया है और विकास की धारा में काफी आगे बढ़ रहा है, इन सबके बीच ध्यान देने की बात यह है कि नक्सली जहां अशिक्षित रहकर जंगलों में रहते थे वहीं नक्सली नेता अच्छे पढ़े लिखे और देश के बड़े शहरों में रहते रहे हैं। इन नेताओं का कार्य क्षेत्र पहले भी शहर भी हुआ करता था, जहां युवा मन में विभिन्न विषयों के माध्यम से भ्रम उत्पन्न कर उन्हें अपने ही देश के विरुद्ध खड़ा कर सामाजिक अशांति को जन्म देते थे तथा यह शहरी वातावरण उन ग्रामीण नक्सलियों के लिए प्रेरणा बनता रहा है।

 उन गाँवों तक सड़कें और विभिन्न संसाधन पंहुचने के कारण वहां इनकी दाल अब नहीं गलती है। अतः इन्होंने पूरी ताकत सामान्य दिमागों को नक्सली बनाने में लगाना शुरू कर दिया है। ऐसे नक्सली दिमाग हर क्षेत्र में मिल जायेंगे इनकी पहचान यही है कि ये भारत के गौरवशाली इतिहास की नकारते हैं, भारत के वैभवशाली भविष्य को असंभव बताते हैं और अवसर आने पर भारत के टुकड़े करने की मंशा रखते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।