
विश्वास की कसौटी Publish Date : 24/08/2026
विश्वास की कसौटी
प्रो0 आर. एस. सेंगर
विश्वास एक साधारण शब्द भर नहीं है बल्कि पूरे जीवन को आगे बढ़ाने वाला सूत्र है जो सदैव मनुष्य को या समाज को संकट के अंधकार से निकाल कर लाता है। एक शिशु अपने बड़ों की उंगली पकड़ कर पहले खड़ा होना और चलना सीख जाता है, चलते चलते गिरकर चोट खाता है उसी समय से अपनों के प्रति विश्वास का अंकुरण भी प्रारंभ हो जाता है। जिनके मन में इस अंकुरण का पोषण होता रहता है वे सदैव सभी प्रकार के मार्गों पर निर्भीक होकर दौड़ते रहते हैं क्योंकि उन्हें यह विश्वास है कि गिरते समय किसी की उंगली सहारा देगी और यदि गिर भी गए तो कोई उठाने आयेगा।
लेकिन जहां यह विश्वास नहीं है वहां तो जीवन भर दौड़ना क्या चलना भी मुश्किल हो जाता है। जीवन में जिन उंगलियों को पकड़ कर हम चलना सीखते हैं उनका अनुभव ऐसा होता है कि आंख बंद कर भी उसका स्पर्श यह बता देता है कि यह कौन है, नेत्र बंद होने पर भी उस सहारे की पहचान जो करवा रहा है वह उसके प्रति अपना विश्वास ही है। मनुष्य के जीवन में परिवार में समाज में राष्ट्र में या इस संसार में जिन लोगों ने इस विश्वास को नहीं समझा वे सदैव मार्ग से भटकते रहे। मायावी संसार के रूप नाना प्रकार के हैं जो वायु के झोंको और वर्षा की बूदों में अपने रूप बदलते रहते हैं।
जिसने इसे नहीं समझा वह हवा के झोंकों या वर्षा की बूदों के साथ कभी इधर तो कभी उधर लुढ़कता रहा, इसलिए शास्त्रों में कहा गया है यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।" अर्थात भाग्य की सिद्धि के लिए कर्म करना ही पड़ता है। अतः जिनका यह विश्वास दृढ़ है उन्हें कोई डिगा नहीं सकता है।
माता जीजा बाई ने ईश्वर पर विश्वास कर शिवाजी की परवरिश की और शिवाजी ने स्वराज पर विश्वास कर अपनी जीवन की साधना की। लक्ष्य बड़ा हो या छोटा उसके प्रति दृढ़ता पूर्वक विश्वास करके आगे बढ़ने से ही वह प्राप्त होता है, परिस्थितियां सदैव हमारे विश्वास की परीक्षा लेती रहती है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
