शलजम की सफल खेती      Publish Date : 23/08/2026

              शलजम की सफल खेती

                                                                         प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा

शलजम ‘बरासीकेसी’ परिवार से संबंध रखती है। यह एक ठंडे मौसम वाली सब्जी की फसल है। शलजम की खेती इसकी जड़ों और हरे पत्तों के लिए की जाती है। शलजम की जड़ें विटामिन सी का उच्चतम स्रोत होती हैं जबकि इसके पत्ते विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन के, फोलिएट और कैलशियम का उच्च स्रोत होते हैं। शलजम को भारत के समशीतोष्ण, उष्ण कटिबंधीय और उप उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। आमतौर पर शलजम सफेद रंग की होती है। बिहार, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और तामिलनाडू आदि भारत के मुख्य शलजम उत्पादक राज्य हैं।

शलजम के लिए उपयुक्त मृदा

शलजम को विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है परन्तु शलजम के अच्छे उत्पादन के लिए दोमट मिट्टी, जिसमें जैविक तत्व उच्च मात्रा में हो, में उगाया जाए तो यह अच्छे परिणाम देती है। भारी, घनी या हल्की मिट्टी में खेती करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे विकृत जड़ों का उत्पादन होता है। अच्छी वृद्धि के लिए मिट्टी की मृदा का pH मान 5.5-6.8 के बीच होना अच्छा माना जाता है।

शलजम की किस्में और पैदावार

L-1: शलजम की यह किस्म 45 से 60 दिन बाद पक जाती है। इसकी जड़ें गोल और पूरी तरह सफेद, मुलायम और कुरकुरी होती हैं। इसकी जड़ों की औसतन पैदावार 105 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त हो जाती है।

Punjab Safed 4: इस किस्म खेती की सिफारिश पंजाब और हरियाणा में की जाती है। इसकी जड़ें पूरी तरह सफेद, गोल, सामान्य आकार और स्वाद में बहुत बढ़िया होती हैं।

दूसरे राज्यों के लिए उपयुक्त किस्में

  • Pusa Kanchan
  • Pusa Sweti
  • Pusa Chandrima
  • Purple top white globe
  • Golden Ball
  • Snowball
  • Pusa Swarnima

खेत की तैयारी

खेत की जुताई करें और खेत को खरपतवार और मोटे ढ़ेलों से रहित बनायें। गाय के गोबर की अच्छी तरह से सड़ी-गली हुई खाद 60-80 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें और खेत की तैयारी के समय मिट्टी में इसे अच्छी तरह मिलायें। बिना गले हुए गोबर की खाद का प्रयोग करने से बचे, क्योंकि इससे शलजम की जड़ें दोमुंही हो जाती हैं।

शलजम की बुआई और बुआई का उचित समय

देसी किस्मों की बुआई करने का उचित समय अगस्त-सितम्बर माना जाता है, जबकि यूरोपी किस्मों का अक्तूबर- नवंबर के महीने में बुवाई की जाती है।

उचित दूरी

पंक्तियों के बीच 30-40 cm की दूरी और पौधों के बीच 6-8 cm की दूरी रखनी चाहिए।

बीज की गहराई

बीज की बुवाई 1.5 सें.मी. की गहराई पर करना उचित माना जाता है।

बुवाई करने का तरीका

शलजम की बुवाई बैड पर सीधे बो कर या मेड़ पर कतारों में बोकर की जाती है।

बीज की मात्रा

एक एकड़ खेत में बुवाई करने के लिए 2-3 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीज का उपचार

जड़ गलन से फसल को बचाने के लिए बुवाई से पहले थीरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज का उपचार करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

  • UREA    SSP MURIATE OF POTASH

      55 kg.        75  kg.

पोषक तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN    PHOSPHORUS POTASH

     25 kg.         12 kg.

खाद की मात्रा स्थान के हिसाब से बदलती रहती है। यह जलवायु, मिट्टी की किस्म और मृदा की उपजाऊ शक्ति पर निर्भर करती है।

बुवाई के समय गाय के गोबर के साथ नाइट्रोजन 25 किलो (यूरिया 55 किलो), फासफोरस 12 किलो (सिंगल सुपर फासफेट 75 किलो प्रति एकड़) का प्रयोग करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

अंकुरण के 10-15 दिनों के बाद छंटाई की प्रक्रिया करें। मिट्टी को हवादार और नदीन-मुक्त बनाये रखने के लिए कसी के साथ गुड़ाई करनी चाहिए। शलजम की बुवाई के दो से तीन सप्ताह बाद एक बार गुडाई अतिरिक्त करें। गुडाई करने के बाद मेंड़ पर मिट्टी चढ़ाएं।

शलजम में सिंचाई

शलजम को तीन से चार सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। बुवाई करने के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें, यह अच्छे अंकुरण में मदद करती है। गर्मियों में मिट्टी की किस्म और जलवायु के अनुसार, बाकी की सिंचाइयां 6-7 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। सर्दियों में 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। शलजम को 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है, अतः अनावश्यक रूप से सिंचाई से बचें। इससे जड़ों का आकार विकृत हो सकता है और इस पर बाल उग जाते है।

शलजम के रोग और उनकी रोकथाम

जड़ गलनः इस बीमारी के बचाव के लिए, बुवाई करने से पहले थीरम 3 ग्राम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज का उपचार करें। बिजाई के बाद 7 और 15 दिन नए पौधों के आस पास की मिट्टी में कप्तान 200 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई

शलजम की कटाई, किस्म के आधार पर और मंडी के आकार के हिसाब से जैसे कि 5-10 cm व्यास के हो जाने पर करनी चाहिए। आमतौर पर शलजम के फल 45-60 दिनों में काटने के लिए तैयार हो जाते है। कटाई में देरी होने पर इसकी पुटाई में मुश्किल और फल रेशेदार हो जाते हैं। इसकी पुटाई शाम के समय करें। कटाई के बाद शलजम के हरे सिरों को पानी से धोया जाता है तथा उन्हें टोकरी में भरा जाता है और मंडी में भेज दिया जाता है। इसके फलों को ठंडे और नमी वाले हालातों में  2-3 दिन के लिए  8-15 सप्ताह के लिए स्टोर करके रखना हो तो उन्हें रखा जा सकता है।

बीज उत्पादन

बीज उद्देश्य के लिए, शलजम के बीज को मध्य सितंबर में बोयें और फिर दिसंबर के पहले सप्ताह में नए पौधों को रोपण किया जाता है। 45 cm x 15 cm फासले का प्रयोग करें। नाइट्रोजन 30 किलो (यूरिया 65 किलो) और फासफोरस 8 किलो (सिंगल सुपर फासफेट 50 किलो) प्रति एकड़ में डालें। बिजाई के समय फासफोरस की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा डालें। बिजाई के 30 दिनों के बाद नाइट्रोजन की बाकी की मात्रा को डाल दें। जब पौधे पर 70% फलियां जिनका रंग हल्का पीला हो तब कटाई कर लेनी चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।