गलत फैसला लेने से ऐसे बचें      Publish Date : 18/04/2026

           गलत फैसला लेने से ऐसे बचें

                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

सही और प्रभावी निर्णय लेने के लिए किसी भी आदमी का केवल बुद्धिमान होना काफी नहीं है। सही निर्णय लेने के लिए संतुलित सोच और अपने पूर्वाग्रहों को पहचानना भी उतना ही जरूरी है।

कई बार अधिक बुद्धिमान लोग भी गलत निर्णय ले लेते हैं। इसकी वजह केवल यह नहीं होती कि वे सोच नहीं सकते, बल्कि असली वजह तो यह होती है कि उनके दिमाग में पहले से मौजूद धारणाएं (पूर्वाग्रह) और खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा (अति आत्मविश्वास) असर डालते हैं। इसके अलावा, ज्यादा बुद्धिमान होने का एक नुकसान यह भी हो सकता है कि वे अपनी गलत बातों को भी तर्क देकर सही ठहराने की कोशिश करने लगते हैं। यानी वे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल सही निर्णय लेने के बजाय, अपने गलत निर्णय को सही ठहराने में करने लगते हैं।

                                 

इसके लिए जिम्मेदार असली वजह को समझें

कई बार लोग अपने पहले से बने विचारों को ही सही मानकर उसी के समर्थन में सबूत ढूंढते हैं और गलत निर्णयों को भी तर्क देकर सही ठहराने लगते हैं। उनके फैसले अक्सर अनजाने पूर्वाग्रहों, भावनाओं और अनावश्यक कारकों से प्रभावित होते हैं, साथ ही अति-आत्मविश्वास भी गलतियां करवाता है। कभी वे अपनी आसान समझ को नजरअंदाज कर देते हैं, तो कभी उसी पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जिससे संतुलित निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।

निर्णय की स्वच्छता को अपनाएं

जरूरी है कि हम फैसले लेते समय जितना हो सके अपने दिमाग को उतना ही अनावश्यक प्रभावों से मुक्त रखें। यानी भावनाओं, पूर्वाग्रहों और बाहरी शोर के बजाय तथ्यों और स्पष्ट सोच के आधार पर स्थिति का शांत और व्यवस्थित तरीके से मूल्यांकन करें। साथ ही, अपनी शुरुआती धारणा को चुनौती दें, न कि सिर्फ उसके समर्थन में सबूत ढूंढें। जब हम यह सोचते हैं कि अगर मैं गलत हूं तो क्यों? तो हमारी सोच अधिक निष्पक्ष, गहरी और संतुलित बनती है।

विकल्पों पर भी विचार करें

फैसला लेते समय केवल एक ही विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय सभी संभावित विकल्पों पर गहराई से विचार करना जरूरी होता है। इसके लिए खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि अगर हमारी मान्यताएं गलत साबित हों तो इसका परिणाम क्या होगा? इससे हम अपनी सोच की सीमाओं को पहचान पाते हैं और एक तरफा निर्णय लेने से बच जाते हैं। साथ ही, उस समय पर उपलब्ध प्रत्येक विकल्प के फायदे और नुकसान का शांत और निष्पक्ष विश्लेषण करना चाहिए तथा अलग-अलग दृष्टिकोणों को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए।

जब हम अपने खुले मन से विकल्पों की तुलना करते हैं, संभावित जोखिमों का आकलन करते हैं और अपनी धारणाओं को चुनौती देते हैं, तब हमारे निर्णय अधिक संतुलित, व्यावहारिक और अधिक प्रभावी बन जाते हैं।

निर्णयों को परिणामों से अलग करें

                                

किसी निर्णय को केवल उसके नतीजे से नहीं आंका जाना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि उसे लेने की प्रक्रिया कैसी थी। कई बार गलत फैसले भी संयोग से अच्छे परिणाम दे देते हैं, और सही फैसले भी कभी-कभी खराब परिणाम दे सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया- जैसे सोच, विश्लेषण और तर्क आदि के स्तर को अधिक बेहतर बनाएं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।