
खेती में रसायनों का प्रयोग का जाल और बढ़ती रोग- समस्याएँ Publish Date : 15/04/2026
खेती में रसायनों का प्रयोग का जाल और बढ़ती रोग- समस्याएँ
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
1. मिट्टी की प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो गई:
लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी के लाभकारी मित्र जीवाणु नष्ट हो गए हैं। मिट्टी सख्त हो जाने से जड़ों को हवा नहीं मिलती, जिसके कारण पौधा शुरुआत से ही कमजोर रहता है।
2. कीटों में बढ़ी हुई ‘रेज़िस्टेंस’ (Resistance):
एक ही प्रकार के जहरीले कीटनाशकों के लगातार उपयोग से कीट अब उन दवाओं का असर नहीं ले रहे हैं। आज जो दवाइयाँ हम छिड़क रहे हैं, वे कीटों को खत्म करने के बजाय मानो उन्हें और मजबूत बना रही हैं — ऐसी तकनीकी स्थिति बन गई है।
3. खाद्य पदार्थों में ज़हर और मानव स्वास्थ्य:
फसलों पर उपयोग किए गए रसायनों के अवशेष (Residues) भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में पहुँच रहे हैं। इससे कैंसर जैसे गंभीर रोगों का खतरा बढ़ रहा है और मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो रही है।
4. मित्र कीटों का नाश:

- स्प्रे के कारण फसल की रक्षा करने वाले लाभकारी कीट (जैसे मधुमक्खियाँ, लेडीबर्ड) नष्ट हो रहे हैं। प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से हानिकारक कीटों का प्रकोप और भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
- केवल रसायनों पर निर्भर रहना संकट को निमंत्रण देने जैसा है।
- अब हमें एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना ही होगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
