
भारत में कृषि की विशाल क्षमता का पूरा दोहन Publish Date : 11/04/2026
भारत में कृषि की विशाल क्षमता का पूरा दोहन
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
भारत अपनी कृषि और कृषि की विशाल क्षमता का पूरा दोहन इसलिए नहीं कर पा रहा है क्योंकि किसानों तक नई एवं उन्नत तकनीकों तथा गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों की उपलब्धता सीमित है और उनके प्रति पर्याप्त जागरुकता का अभाव है।
भारत की आर्थिक उन्नति 21 वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरक कहानियों में से एक बनकर उभरी है। यद्यपि इस प्रगति को प्रायः सेवा क्षेत्र, विनिर्माण और डिजिटल नवाचार के विस्तार के माध्यम से देखा जाता है, परंतु इसकी सबसे गहरी जड़ें कृषि में निहित हैं- कृषि एक ऐसा क्षेत्र जिसने हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता को बल प्रदान किया है। सिंधु और गंगा की उपजाऊ घाटियों से लेकर आज की तेजी से तकनीक-आधारित खेती तक, कृषि निरंतर 140 करोड़ लोगों का पोषण करती रही है, देश की आधी से अधिक आबादी को आजीविका प्रदान करती हैं और ग्रामीण भारत को मजबूती देती है, जो राष्ट्र की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता की आधारशिला है।

फिर भी, अपनी केंद्रीय भूमिका के बावजूद, भारतीय कृषि आज अपनी अपार संभावनाओं का पूर्ण दोहन करने में सक्षम नहीं हो पा रही है। इसके मूल कारण स्पष्ट हैं- नई और उन्नत तकनीकों तक सीमित पहुँच, निम्न गुणवत्ता वाले कृषि आदानों का निरंतर प्रसार, तथा किसानों में आधुनिक समाधानों के प्रति व्यापक जागरूकता का अभाव, जो उत्पादकता और आय में उल्लेखनीय वृद्धि ला सकते हैं।
भारत का कृषि विकास व्यापक और सराहनीय रहा है। आधुनिक परिवर्तन की शुरुआत 1960 के दशक की हरित क्रांति से हुई, जब देश को खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए अमेरिका से PL-480 के अंतर्गत आयात पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता था। दूरदर्शी नेतृत्व, सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक उत्कृष्टता ने भारत की दिशा को मूलतः बदल दिया। उच्च उपज देने वाली किस्मों को अपनाने, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार तथा उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग ने देश को दीर्घकालिक खाद्यान्न संकट से बाहर निकालते हुए खाद्य आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया। इसी कालखंड में श्वेत क्रांति ने भारत को विश्व का अग्रणी दुग्ध उत्पादक राष्ट्र बना दिया, जहाँ सहकारी संस्थाओं के माध्यम से लाखों छोटे किसानों को सशक्त किया गया।
ये उपलब्धियाँ केवल कृषि क्षेत्र की प्रगति नहीं थीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के ऐसे ऐतिहासिक पड़ाव थे जिन्होंने देश में आत्मविश्वास, सम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना को नई ऊर्जा प्रदान की। इसके बाद के दशकों में भारतीय कृषि का विकास न केवल विस्तार में, बल्कि विविधता में भी निरंतर होता गया। आज भारत चावल, गेहूँ, फल, सब्ज़ियाँ, दूध, मसाले, कपास और चीनी जैसे अनेक कृषि उत्पादों के उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। चावल उत्पादन के क्षेत्र में भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए 150 मिलियन टन से अधिक उत्पादन के साथ विश्व में पहला स्थान प्राप्त कर लिया है।
भारतीय चावल का निर्यात आज वैश्विक खाद्य सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है, जो एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व के अनेक देशों की जनसंख्या को पोषण उपलब्ध करा रहा है। ये उपलब्धियाँ भारतीय किसानों की दृढ़ता और अथक परिश्रम, वैज्ञानिकों के अमूल्य योगदान तथा कृषि उद्योग से जुड़े हितधारकों सहयोग का प्रमाण हैं- विशेषकर ऐसे समय में जब वे विश्व की सबसे कठिन जलवायु परिस्थितियों और बाज़ार संबंधी चुनौतियों के बीच कार्य कर रहे हैं। हालाँकि, ये उपलब्धियाँ अपने भीतर एक गहरे विरोधाभास को भी छिपाए हुए हैं।

वैश्विक स्तर पर कुल उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद, प्रति हेक्टेयर उत्पादकता और किसानों की आय के मामले में भारत आज भी अनेक विकसित तथा कुछ विकासशील देशों से काफ़ी पीछे है। उदाहरणस्वरूप, कृषि सकल घरेलू उत्पाद (एग्रीकल्चरल जीडीपी) के संदर्भ में चीन भारत की तुलना में लगभग तीन गुना आगे है, जबकि दोनों देशों के पास भूमि और प्राकृतिक संसाधन मोटे तौर पर समान हैं। यह अंतर भारतीय किसानों की क्षमता, परिश्रम या प्रतिबद्धता की किसी कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि उन संरचनात्मक और प्रणालीगत सीमाओं का संकेत है, जो भारतीय कृषि को उसकी वास्तविक और पूर्ण क्षमता को साकार करने से रोकती हैं।
भारतीय कृषि की प्रमुख सीमाओं में से एक है आधुनिक कृषि तकनीकों की सीमित उपलब्धता- विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जो देश के लगभग 85 प्रतिशत कृषक समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। जोतों का अत्यधिक खंडित होना, उन्नत कृषि यंत्रों, सटीक कृषि (प्रिसिजन फार्मिंग) तकनीकों, उच्च गुणवत्ता वाले बीजों तथा आधुनिक फसल संरक्षण उपायों तक पहुँच में एक बड़ी बाधा बनता है। देश के अनेक क्षेत्रों में कृषि पद्धतियाँ दशकों से लगभग अपरिवर्तित बनी हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप किसान जलवायु परिवर्तन, कीट एवं रोग प्रकोप तथा अनिश्चित बाज़ार परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। उन्नत तकनीकों के अभाव में न केवल उत्पादकता प्रभावित होती है, बल्कि उत्पादन लागत बढ़ती है और कृषि एक उच्च जोखिम तथा कम प्रतिफल वाला व्यवसाय बनी रहती है। इस चुनौती को और गंभीर बनाता है किसानों में जागरूकता का व्यापक अभाव। कई मामलों में, जहाँ आधुनिक कृषि तकनीकें उपलब्ध भी हैं, वहाँ किसानों का एक बड़ा वर्ग या तो उनके अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है अथवा उनके प्रभावी उपयोग को लेकर असमंजस में होता है। सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग 60 प्रतिशत कृषक परिवारों को आधुनिक कृषि तकनीकों से संबंधित जानकारी किसी भी औपचारिक स्रोत से प्राप्त नहीं हुई है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में किसान ऐसी नवाचारों से कटे रह जाते हैं जो उनकी उत्पादकता और आय में वृद्धि कर सकते है।
सरकारी और मंत्रालय स्तर के विश्वसनीय अनुमानों से यह भी संकेत मिलता है कि केवल लगभग 40 से 45 प्रतिशत किसान ही उन्नत कृषि तकनीकों से परिचित हैं। जागरूकता की यह कमी उतनी ही घातक है जितनी स्वयं तकनीक की अनुपलब्धता, क्योंकि कोई भी नवाचार तभी सार्थक होता है जब वह किसानों तक समझने योग्य, किफायती और भरोसेमंद तरीके से पहुँच सके।
इस समस्या को और अधिक गंभीर बनाता है घटिया और नकली कृषि आदानों का व्यापक प्रसार। नकली पौध सामग्री, मिलावटी उर्वरक और नकली कीटनाशक देश के अनेक हिस्सों में एक छिपी हुई महामारी का रूप ले चुके हैं। ये आदान केवल उपज को ही कम नहीं करते, बल्कि फसलों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए जोखिम उत्पन्न करते हैं, वैज्ञानिक एवं संस्थागत व्यवस्थाओं में किसानों का विश्वास कमजोर करते हैं और अनेक परिवारों को कर्ज़ की दलदल में धकेल देते हैं।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और तेलंगाना जैसे राज्यों में हालिया प्रवर्तन कार्रवाइयों से यह सामने आया है कि अंतर-राज्यीय स्तर पर संगठित नेटवर्क प्रतिदिन हज़ारों टन नकली उर्वरकों के उत्पादन और वितरण में संलिप्त हैं। इस समस्या की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार को उर्वरक नकलीकरण और कालाबाज़ारी में लिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लागू करने का निर्णय लेना पड़ा। यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए सीधा और गंभीर खतरा है। वर्तमान में भारत के पास सुदृढ़ नियामक ढाँचे उपलब्ध हैं, जिनमें बीज अधिनियम, उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) और कीटनाशक अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानून शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, पीएमबी 2025 जैसे प्रस्तावित सुधार इन व्यवस्थाओं को और सशक्त बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। वास्तविक चुनौती कानूनों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उनके कमजोर और असंगत क्रियान्वयन में निहित है।
जब प्रवर्तन ढीला पड़ता है, तो अवैध तत्व फलते फूलते हैं, वैध और जिम्मेदार उद्योग प्रभावित होते हैं, और अंततः इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव किसानों को ही डझेलना पड़ता है। आज आवश्यकता है कठोर और प्रभावी प्रवर्तन की, जिसे डिजिटल ट्रेसबिलिटी, क्यूआर-कोड आधारित प्रमाणीकरण, मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं तथा बार-बार और जानबूझकर अपराध करने वालों के लिए त्वरित एवं उदाहरणात्मक दंड के साथ जोड़ा जाए। घटिया और नकली कृषि आदानों से किसानों की सुरक्षा न केवल उनके विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए अनिवार्य है, बल्कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। एक अन्य महत्वपूर्ण संरचनात्मक बाधा किसानों की शिक्षा, जागरूकता और विस्तार सेवाओं की सीमित पहुँच है। देश में 14 करोड़ से अधिक किसान 6.5 लाख से अधिक गाँवों में फैले हुए हैं- ऐसी स्थिति में, चाहे सरकार की मंशा कितनी ही सशक्त क्यों न हो, कोई भी सरकारी तंत्र अकेले देश के सबसे दूरस्थ गाँवों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुँच सकता। ऐसे में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) अब केवल एकविकल्प नहीं, बल्कि भारत जैसे प्रगतिशील राष्ट्र के लिए एक सुविचारित और अनिवार्य रणनीति बन चुकी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से सुसज्जित निजी क्षेत्र को नवाचार की क्षमता, व्यापक फील्ड नेटवर्क और अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीक प्रसार के क्षेत्र में सार्वजनिक पहलों को सशक्त बनाने हेतु प्रोत्साहन और सहयोग दिया जाना चाहिए। जब सार्वजनिक संस्थान और उत्तरदायी निजी उद्यम प्रभावी रूप से मिलकर कार्य करते हैं, तो किसानों को उन्नत वैज्ञानिक ज्ञान, भरोसेमंद बाज़ारों और नवीन तकनीकों का वास्तविक लाभ मिलता है।
प्रोत्साहन की बात यह है कि सहयोगात्मक मॉडल पहले से ही संभावित परिणामों को स्पष्ट रूप से दर्शा रहे हैं। आधुनिक और उन्नत फसल संरक्षण तकनीकें अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित, सटीक और अत्यंत प्रभावी हो चुकी हैं। जहाँ पहले कुछ कीटनाशकों के प्रयोग के लिए बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती थी, वहीं आज वही प्रभाव कुछ ही ग्राम में प्राप्त किया जा सकता है-जिससे न केवल प्रभावशीलता बढ़ती है, बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव भी उल्लेखनीय रूप से कम होता है। ड्रोन, मौसम निगरानी स्टेशन, मृदा एवं कृषि सेंसर तथा डेटा-आधारित परामर्श जैसी सटीक कृषि तकनीकें किसानों को आदानों के विवेकपूर्ण उपयोग, लागत में कमी और फसल उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम बना रही हैं। किंतु दुर्भाग्यवश, ये उन्नत तकनीकें अभी भी देश के सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटी हुई हैं और बहुसंख्यक भारतीय किसानों तक इनकी पहुंच होना अभी शेष है।
परिवर्तन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश है- एक ऐसा क्षेत्र जिसमें भारत लगातार अपेक्षा से कम प्रदर्शन करता रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर व्यय वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.7 प्रतिशत है, जबकि नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं जैसे चीन और इज़राइल में यह अनुपात क्रमशः लगभग 2.6 प्रतिशत और 5.6 प्रतिशत है। विडंबना यह है कि माननीय प्रधानमंत्री का प्रेरक आह्वान ‘‘जय अनुसंधान” तब तक साकार नहीं हो सकता, जब तक कृषि शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास में सतत तथा सार्थक निवेश सुनिश्चित न किया जाए। अतीत में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा मान्यता प्राप्त कंपनियों को अनुसंधान एवं विकास व्यय पर आयकर में 200 प्रतिशत की छूट जैसे प्रोत्साहनों ने निजी क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इन प्रोत्साहनों की समाप्ति ने ऐसे समय में अनुसंधान निवेश को कमजोर किया है, जब वैश्विक प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है। अतः इस नीति पर पुनर्विचार करना न केवल समय की आवश्यकता है, बल्कि भारत की दीर्घकालिक कृषि एवं तकनीकी प्रगति के लिए भी सके। अनिवार्य है। भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाएँ साहसिक और प्रेरक हैं। वर्ष 2028 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य, जिसमें कृषि का योगदान लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर हो, तथा 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का विकसित भारत- ये लक्ष्य कृषि क्षेत्र के मूलभूत और व्यापक रूपांतरण के बिना साकार नहीं हो सकते। भारत की विकास यात्रा अनिवार्य रूप से उसके खेतों, कृषि क्षेत्रों और ग्रामीण बसावटों से होकर ही गुज़रेगी।
अब समय आ गया है कि कृषि को केवल सब्सिडी आधारित निर्भरता से बाहर निकालकर उत्पादकता, स्थायित्व और उद्यमशीलता से युक्त क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए- जहाँ किसान उन्नत तकनीकों तक पहुँच, भरोसेमंद गुणवत्तापूर्ण आदानों, कुशल बाज़ारों और मूल्य संवर्धन के माध्यम से प्रति एकड़ अपनी आय में वृद्धि कर सकें।
आगे की राह अल्पकालिक हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक और सतत क्षमता निर्माण की ओर जाने की है। किसानों को धोखाधड़ी से सुरक्षित करना, उन्हें ज्ञान से सशक्त बनाना और आधुनिक उपकरणों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना अनिवार्य है। जागरूकता, शिक्षा और विश्वास तकनीक जितने ही महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब किसानों को समुचित प्रशिक्षण, समय पर जानकारी और भरोसेमंद सहयोग प्राप्त होता है, तो वे केवल सब्सिडी पर निर्भर लाभार्थी नहीं रहते, बल्कि आत्मनिर्भर उद्यमी बनकर उभरते हैं। इसी परिवर्तन के माध्यम से कृषि क्षेत्र वास्तव में राष्ट्रीय विकास का एक सशक्त इंजन बन सकता है।
भारत के पास भूमि है, उपजाऊ मृदा है, वैज्ञानिक क्षमता है, सशक्त उद्योग है और सबसे बढ़कर उसके किसानों का अद्वितीय चरित्र और संकल्प है। आज आवश्यकता है ऐसे तंत्र की, जो नवाचारपूर्ण और उन्नत तकनीकों तक किसानों की सुनिश्चित पहुँच बनाए, कृषि आदानों की गुणवत्ता की गारंटी दे और अंतिम छोर पर जागरूकता के अंतर को प्रभावी रूप से पाट यदि भारत इन बाधाओं को दूर करने में सफल होता है, तो कृषि केवल अधूरी संभावनाओं की कहानी नहीं रह जाएगी। यह न केवल देश का पोषण करेगी, बल्कि भारत को एक अग्रणी वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
