
मटर उत्पादन की वैज्ञानिक विधि Publish Date : 26/11/2025
मटर उत्पादन की वैज्ञानिक विधि
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
जलवायुः मटर का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए शुष्क एवं ठण्डी जलवायु अधिक उपयुक्त होती है किन्तु पाले से इस फसल को अधिक नुकसान होता है।
मिट्टीः मटर का अच्छा उत्पादन लेने के लिए उचित जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है।
खेत की तैयारीः मटर का अच्छा उत्पादन लेने के लिए खेत की एक जुताई मिट्टी पलट हल से तथा दो से तीन जुताईयां कल्टीवेटर या हैरो से करके खेत में पाटा लगाकर समतल एवं ढेले रहित कर लेना चाहिए।
खाद एवं उर्वरकः संतुलित पोषक तत्वों को प्रदान करने के लिए खेत का मृदा परीक्षण कराना आवश्यक है। मृदा परीक्षण न करा पाने की दशा में खेत में बुवाई से पहले 60-80 क्विंटल अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देना चाहिए। बुवाई के समय ही खेत में 20 किग्रा. नाइट्रोजन, 60 किग्रा. फास्फोरस तथा 40 किग्रा. पोटाश एवं 20 किग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से बीज के नीचे कूँड़ में डालें। अधिक उपज वाली प्रजातियों में बोने के समय 20 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त देनी चाहिए।
फसल सुरक्षा उपायः

उन्नतशील प्रजातियां: रचना, इन्द्र, अपर्णा, शिखा, जय, अमन, सपना, प्रकाश, पूसा, प्रभात, पंत मटर 5, मालवीय मटर 2 एवं मालवीय मटर 15 तथा विकास आदि मटर की प्रमुख प्रजातियाँ हैं।
बुवाई का समयः मटर की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा होता है। किन्तु इसे 15 नवम्बर तक बोया जा सकता है।
बीज की मात्रा: लम्बे पौधों वाली प्रजातियों की 80-100 किग्रा. तथा बौनी प्रजातियों की 125 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यक होता है।
बीज उपचार: बीज जनित रोगों से बचाव के लिए 2 ग्राम थीरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किग्रा. बीज अथवा 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा बीज की दर से शोधित करते हैं। तत्पश्चात बीज को मटर के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से एक पैकेट (200 ग्राम) प्रति 10 किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद बोया जाता है।
बोने की विधि: उपचारित बीज को हल के पीछे कूँड़ में या पंतनगर जीरोटिल ड्रिल द्वारा बुवाई की जाती है। लम्बी प्रजातियों की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. तथा बौनी प्रजातियों की 20 सेमी. एवं गहराई 5 सेमी. रखते हैं।
सिंचाई एवं जलनिकास: फसल में फूल आने के समय खेत में उचित नमी होना अनिवार्य है। इस समय यदि खेत में नमी की कमी हो तो सिंचाई करना आवश्यक होता है। दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करें। मटर खेत में अधिक नमी को सह नहीं पाती इसीलिए खेत में आवश्यकता से अधिक पानी को जल निकास नाली द्वारा बाहर निकाल दें।
निराई-गुड़ाई: फसल के प्रारंभ में बुवाई के 40-45 दिनों तक खेत में खरपतवार नहीं हो अन्यथा फसल की पैदावार घट जाती है। इसके लिए बीज बोने के 30-35 दिन पर खुरपी द्वारा एक निराई कर खरपतवारों तथा अवांछित पौधों को खेत से निकाल दें।
कीट नियंत्रण: तने की मक्खी, पत्ती सुरंगक तथा फली बेधक मटर के मुख्य कीट हैं। फलीबेधक कीट की हरी सूंडियाँ मटर की फलियों में छेद करके अंदर ही अंदर फली के दानों को खा जाती हैं।

उपरोक्त कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए फसल की समय से बुवाई करें। फलीबेधक कीट को नियंत्रित करने के लिए क्विनालफास 25 ई.सी. की 2 लीटर की मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें।
रोग नियंत्रणः मटर की फसल में मुख्य रूप से बुकनी या चूर्णिल आसिता रोग तथा मृदारोमिल आसिता रोग लगते हैं। बुकनी या चूर्णिल आसिता रोग लगने पर पत्तियों पर सफेद रंग के फफूंद का चूर्ण या पाउडर जमा हो जाता है। जो बाद में भूरे रंग का हो जाता है। मृदारोमिल आसिता में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे तथा निचली सतह पर रुई जैसे सफेद रंग की फफूंद दिखाई देती है जिससे बाद में पत्तियां सूख जाती हैं।
उपरोक्त रोगों के नियंत्रण के लिए रोग रोधी प्रजातियों, समय से बुवाई करें तथा उस खेत में 2-3 वर्षों तक मटर की बुवाई नहीं करें। बुकनी या चूर्णिल आसिता रोग लगने पर गंधक 80 का घुलनशील चूर्ण की 2 किग्रा. तथा मृदारोमिल आसिता रोग लगने पर मैंकोजेब-75 डब्ल्यू. पी. की 2 किग्रा. मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़कें।
फसल सुरक्षा:
कटाई, मड़ाई तथा भण्डारण: हरी मटर की फली की तुड़ाई 10-12 दिनों के अंतर पर 3-4 बार करते हैं। जबकि दाल वाली फसल मार्च के अंत में पककर तैयार हो जाती है, जिसकी कटाई एक बार में कर ली जाती है, मड़ाई बैलों या थ्रेसर द्वारा की जा सकती है। हरी मटर के दानों का भण्डारण डिब्बाबंदी के रूप में शीत गृह में तथा सूखे दानों को भण्डार गृह में रखा जाता है।
उपज: उन्नत विधि से खेती करने पर हरी फलियों की उपज औसतन 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा दानों की उपज 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
