शिमला मिर्च की उन्नतशील खेती      Publish Date : 24/11/2025

                    शिमला मिर्च की उन्नतशील खेती

                                                                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशू चौधरी

भारत में शिमला मिर्च की व्यावसायिक खेती हिमांचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में की जाती है। इसे ग्रीन पेपर या बेल पेपर या मीठी मिर्च के नाम से भी जाना जाता है। इसमें तीखापन नहीं होता है अथवा बहुत कम होता है। शिमला मिर्च में विटामिन सी तथा खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

जलवायु

शिमला मिर्च ठंडी जलवायु की फसल है, पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी रोपाई फरवरी से मई-जून तक की जाती है। यदि रात्रि का तापमान 12 डिग्री सेन्टीग्रेड से नीचे चला जाए तो पौधों की वृद्धि एवं फलत पर बुरा असर पड़ता है। दिन का तापमान 26-28 डिग्री सेन्टीग्रेड तथा रात्रि का 16-18 डिग्री सेन्टीग्रेड शिमला मिर्च में फूल तथा फल आने के लिए बहुत ही अनुकूल होता है।

उन्नत किस्में

                                                                      

सामान्य किस्में

केलिफोर्निया वान्डर, बुलनोल यलोवन्डर, निशान्त-1, अर्का गौरव, अर्का बसन्त, अर्का मोहिनी।

संकर किस्में

भारत, इन्दिरा, पूसा दीप्ती अनुपन, अर्का अतुल्या, हीरा, सुप्रिया ओरोविले, तन्वी, तन्वी प्लस, नताशा, स्वर्णा।

भूमि एवं उसकी तैयारी

बलुई दोमट मृदा जिसका पी.एच.मान 5.5-6.8 के बीच हो, सर्वोत्तम माना जाता है। खेत की 2-3 जुताई करके पाटा लगा देते हैं जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए।

बीज की मात्रा, बुआई तथा रोपाई का समय

एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए सामान्य किस्मों के 800-1,000 ग्राम तथा संकर किस्मों के 250-500 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। शिमला मिर्च के बीज की बुवाई मिर्चकी ही भांति की जाती है। नर्सरी में पौधे जब 30 दिन के हो जायें और उसमें 4-5 पत्तियां आ जाएँ तो रोपाई कर देनी चाहिए।

रोपाई का ढंग

शिमला मिर्च की रोपाई किस्मों के आधार पर 45-60× 30-45 सें.मी. की दूरी पर करनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

200 कुन्तल गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी प्रकार मिला लें। इसके अलावा 100-200 कि.ग्रा. नत्रजन, 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 50-60 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। संकर किस्मों के लिए 150 कि.ग्रा. नत्रजन, 75 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 75 कि.ग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना आवश्यक होता है। नत्रजन की आधी तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय तथा शेष नत्रजन को दो बराबर भागों में बांटकर रोपाई के 30 व 45 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहिए।

सिंचाई

                                                                     

भूमि में पर्याप्त नमी अच्छी फसल के लिए आवश्यक है। अतः 10-15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

अगस्त में बोयी गयी फसल में 3-4 बार तथा नवम्बर में बोई गई फसल में दो बार 30-30 दिन पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

फसल की तुड़ाई एवं उपज

पूरी तरह से विकसित स्वस्थ फल बिक्री के लिए उपयुक्त रहते हैं। रोपाई के लगभग तीन माह बाद फलों की तुड़ाई शुरू हो जाती है। 4-5 तुड़ाई 10-15 दिन के अन्तर पर की जा सकती है। इसकी औसत पैदावार लगभग 100-300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

शिमला मिर्च के प्रमुख रोग एवं कीट

डाईबैंक एवं एन्थेक्नोज

  1. मिर्च की रोपाई अगस्त के दूसरे पखवाड़े में करने से एन्थेक्नोज का संक्रमण बहुत कम हो जाता हैं।
  2. बुवाई के पूर्व 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम / किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें।
  3. पौधशाला के पौधों पर रोपाई के पूर्व 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम /लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें।
  4. फूल आने के समय 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम/लीटर पानी, फिर 9 दिन बाद कॉपर आक्सीक्लोराइड की 3 ग्राम /लीटर पानी के घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए।
  5. प्रथम फलत के मिचों को बीज के लिए कभी भी न रखें।

जीवाणु पर्ण धब्बा

  1. स्ट्रेप्टोसाइक्लीन दवा की 1 ग्राम मात्रा लगभग 6 लीटर पानी में घोलकर या कासुगामाइसीन 2 ग्राम /1 लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।

स्वेलेरोटिनिया झुलसा (सफेद गलन)

  1. कीचड़ की गई (पडलिंग) धान के साथ फसल चक्र प्रारम्भिक रोगाणु की संख्या में कमी करने में सहायक है।
  1. खेतों में हरी खाद को पलटने के बाद मिट्टी में ट्राइकोडर्मा पाउडर 5 कि.ग्रा./हे. की दर से बुरकाव करें।
  2. पौधे की रोपाई सघन नहीं करना चाहिए जिससे पौधों के चारों तरफ नमी ज्यादा न बनी रहे और संक्रमण कम हो।
  3. फूल आने की अवस्था में 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम/लीटर पानी की दर से तथा बाद में मैंकोजेब की 2.5 ग्राम /लीटर पानी की दर से पर्णीय छिड़काव फूल आने के बादकरना चाहिए।

पर्ण झुलसा

  1. पहला छिड़काव क्लोरोथेनिल 2 ग्राम/लीटर पानी एवं पुनः 8-10 दिन के बाद दूसरा थायोफनेट मिथाइल की 1 ग्राम/लीटर पानी की दर से करें।
  2. पौधों की प्रतिरोधिता एवं बढ़वार अच्छी बनाए रखने हेतु ट्रिसेल 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से 10-12 दिन के अन्तराल पर पर्णीय छिड़काव करें।

पर्णकुंचन विषाणु (गुरचा रोग)

  1. बीज को 2.5 मिली. इमिडाक्लोप्रिड/कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  2. सफेद मक्खी से बचाव हेतु पौधशाला को नाइलान जाली के अन्दर उगाना चाहिए।
  3. पुष्पन अवस्था तक मेटासिस्टाक्स 1 मिली./लीटर पानी के घोल की दर से 10 दिन के अन्तराल पर नियमित छिड़काव करें।
  4. रोग सहनशील प्रजातियों जैसे पन्त सी 1, चन्चल एवं के.ए. 2 को उगाना चाहिए।

थ्रिप्स और माइटजनित गुरचा

  1. बीज का शोधन इमिडाक्लोप्रिड दवा का 2.5 मिली./किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें।
  2. वर्टीमैक 0.8 मिली./लीटर पानी की दर से घोल कर 20 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
  3. डाईकोफाल 2.5 मिली. दवा एवं घुलनशील गंधक 2.0 ग्राम/लीटर की दर से घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अन्तराल पर एकान्तरित छिड़काव करते रहें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।