
पालक की खेती करने का वैज्ञानिक तरीका Publish Date : 29/10/2025
पालक की खेती करने का वैज्ञानिक तरीका
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
इस मौसम में पालक की खेती करके किसान 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टयेर तक पत्तों का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, जिसे बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति गड्डी के हिसाब से बेचा जा सकता है।
भारत में हरी पत्तेदार सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. विशेष रूप से सितम्बर के महीने से लेकर नवम्बर के महीने तक पालक, मेथी और धनिया आदि के जैसी हरे पत्तेदार सब्जियों की खेती करने के लिए यह मौसम काफी अनुकूल रहता है.। किसान चाहें तो इस समय सर्दियों की सबसे लोकप्रिय सब्जी पालक की खेती कर काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
ज्ञात हों कि पालक में विटामिन-ए, विटामिन-सी, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और फास्फोरस जैसे कई खनिज तत्व पाये जाते हैं, जिनसे सब्जी, सलाद, भाजी, पराठे, पकौड़े और जूस बनाया जाता है। यह सेहत के लिए फायदेमंद है ही, साथ ही किसानों के लिए भरपूर मुनाफे का सौदा बन सकता है। सितबंर माह में पालक की खेती कर 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टयेर तक पत्तों का उत्पादन प्राप्त किया जा सकते हैं, जिसे बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति गड्डी के हिसाब से बेचा जाता है।
पालक की खेती के लिए जलवायु

पालक जैसी पत्तेदार सब्जियों को उगाने का सबसे बड़ा लाभ यह भी है कि यह कम समय में पककर तैयार हो जाती है। इसकी खेती के लिए सामान्य सर्द मौसम ही सबसे अच्छा रहता है। विशेषतः ठंड के मौसम में पालक के पत्तों की अच्छी उपज मिलती है। किसान चाहें तो बेहतर उत्पादन के लिए पालक की ऑलग्रीन, पूसा पालक, पूसा हरित और पूसा ज्योति आदि उन्नत किस्मों की बुवाई कर सकते हैं।
पालक की खेती के लिए मिट्टी
वैसे तो पालक को देश भर की अलग-अलग मिट्टियों में उगाया जाता है। कई लोग घर की छत पर या बालकनी में क्यारियां या कंटेनर बनाकर भी पालक के पत्ते उगाते हैं। वहीं खेतों में नमकीन या लवणीय भूमि इसकी खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। हैरान करने वाली बात यह भी है कि जिस मिट्टी में किसी भी फसल का उत्पादन नहीं मिल पाता है, वहां किसान पालक की सबसे अधिक पैदावार ले सकते हैं। बाकी बागवानी फसलों की तरह जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में भी पालक की खेती करके कम मेहनत में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता हैं।
खाद और बीज
पालक जैसी पत्तेदार सब्जियों का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि अच्छी मात्रा में जैविक खाद या वर्मी कंपोस्ट का उपयोग किया जाए। वैसे तो पालक की फसल में नाइट्रोजन का इस्तेमाल करने पर भी अच्छे परिणाम सामने आते हैं, लेकिन जैविक खेती करने वाले किसान नाइट्रोजन की जगह जीवामृत का उपयोग भी कर सकते हैं। एक हेक्टेयर खेत में पालक की खेती करने के लिए 30 से 32 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है, जिसके बाद फसल से 150 से 200 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता हैं।
पालक की खेती
स्पष्ट है कि पालक एक पत्तेदार सब्जी फसल है, जिससे बेहद कम लागत में अधिका मुनाफा कमाया जा सकता हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि बाजार में पालक की काफी ज्यादा डिमांड बनी रहती है और रसोई के व्यंजनों से लेकर सलाद और जूस तक पालक का उपयोग किया जाता है। इसलिए केवल एक बार बुवाई के बाद 5 से 6 कटाईयां कर इसका बंपर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता हैं। आपको बता दें कि एक बार कटाई के बाद वापस 15 दिनों के बाद पालक के पत्तों का फिर से उत्पादन मिल जाता है। अधिक गर्म तापमान को छोड़कर साल के 10 महीनों तक पालक का अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता हैं।
पालक में सिंचाई
पालक एक कम लागत और मुनाफे से भरपूर फसल है, जिसमें पानी की काफी अच्छी मात्रा होती है, लेकिन इसके सिंचाई में अधिक पानी खर्च करने की जरूरत नहीं होती। बता दें की पालक के खेत में से हल्की नमी बनाकर भी अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। विशेषज्ञों की माने तो सर्दियों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर ही पालक के खेत में सिंचाई की जरूरत होती है। वहीं कटाई से दो-तीन दिन पहले भी हल्का पानी लगाकर अच्छा उत्पादन मिल सकता है।
पालक में कीट प्रबंधन
पालक एक पत्तेदार सब्जी की फसल है, जो कि सीधे जमीन से ही जुड़ी होती है, इसीलिए इसमें कवक रोग और कीटों का लगना सम्भव है. अक्सर पालक की फसल में खरपतवारों के साथ-साथ कैटरपिलर और इल्लियों का प्रकोप हो जाता है। ये इल्लियां पालक के पत्तियों को बीच में से खाकर सारी पैदावार को बर्बाद कर सकती हैं। अतः इन सभी की रोकथाम के लिए खेत में नीम-गौमूत्र आधारित कीटनाशक का 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव किया जा सकता हैं।
पालक की कटाई और पैदावार

पालक की खेती के लिए उन्नत किस्मों का चयन करने पर फसल जल्दी पक कर तैयार हो जाती है, जहां साधारण किस्मों के समूह को पकने में 30 दिन का समय लगता है. वहीं उन्नत किस्में 20 से 25 दिनों के अंदर 15 से 30 सेंटीमीटर तक बड़ी हो जाती हैं। पालक की पहली कटाई के समय पौधों की जड़ों से 5 से 6 सेंटीमीटर ऊपर ही पत्तियों की कटाई करनी चाहिये। इसके बाद इन्हीं जड़ों से हर 15 दिन के अंतराल पर 5 से 6 कटाईयां करके किसान बंपर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
