
पशुपालन एवं पोषण की आधुनिकतम तकनीकें अपनायें और दुग्ध उत्पादन बढ़ायें Publish Date : 12/08/2026
पशुपालन एवं पोषण की आधुनिकतम तकनीकें अपनायें और दुग्ध उत्पादन बढ़ायें
डॉक्टर पूतन सिंह
पशुपालन कृषि का एक अभिन्न अंग है। पशुपालन व्यवसाय का विकास उन्नतशील जातियों का चयन, उचित देखभाल एवं प्रबन्ध, सन्तुलित आहार व पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था द्वारा किया जा सकता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पशुपालकों के लिये सन्तुलित आहार है।
पशुओं को उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये 24 घंटों में जो चारा व दाना एक बार या कई बार में खिलाया जाता है उसको आहार कहते हैं। जबकि दुधारू पशुओं के सन्तुलित आहार से तात्पर्य ऐसे आहार से है जो पशु की सभी आवश्यकताओं (जीवन निर्वाह एवं उत्पादन) की पूर्ति करता है तथा उसमें सभी पौषक तत्व उचित अनुपात में उपस्थित रहते हैं। अर्थात दुधारू पशुओं के सन्तुलित आहार में न तो उसकी आवश्यकता से अधिक पोषक तत्व प्राप्त हो, और न ही 2. कम प्राप्त होने चाहिये।
वैज्ञानिकों का हमेशा यही प्रयत्न रहा है कि पशुओं से अधिक से अधिक उत्पादन लेकर मनुष्य के लिए खाद्य पदार्थों को उपलब्ध करायें। पशु के वैज्ञानिक खान-पान एवं पैत्रिक गुणों पर उनकी बढ़वार की दर एवं दुग्ध उत्पादन क्षमता निर्भर करती है। इसी प्रयास में पशु पोषण वैज्ञानिकों ने कुछ तकनीकें इजाद की है और यदि इनका प्रयोग पशुपालक पशुओं के पोषण में करेंगे तो निश्चय ही उनका दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
पशु आहार में खाद्य योगज यौगिकों (फीड एडीट्विस) का प्रयोगः पशुपोषण
विज्ञान की नई खोजों में कुछ ऐसे पदार्थ सामने आये हैं जिनको दुधारू पशुओं के आहार में समाविष्ठ करने से उनका शारीरिक विकास होता है एवं उत्पादन भी बढ़ता है। सामान्यतः इन खाद्य योगज यौगिकों का कोई पोषण मूल्य या महत्व नहीं होता वरन् या तो यह पाचक नली में भोजन की पचनीयता बढ़ाने में सहायक होते हैं या फिर रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं को नष्ट करके पशु स्वस्थ्य रखने में सहायक होते हैं या फिर शरीर में उपापचय दर को बढ़ाकर पशु में उत्पादन बढ़ाने में सहायक होते हैं। अतः यदि इन खाद्य योगजों की बहुत ही अल्प मात्रा पशुआहार में मिलायी जावे तो पशुओं की आहार अन्तःग्रहण क्षमता, आहार पचाने की क्षमता, पशुओं की वृद्धि, पशुओं के उत्पादन को भी बढ़ाया जा सकता है एवं कई बीमारियों की रोकथाम में भी यह सहायक सिद्ध होते हैं। इस श्रेणी में जो पदार्थ आते हैं वे इस प्रकार हैं:-
जीवाणुद्देशी पदार्थ (फीड एन्टीबायोक्टिक्स): नवजातों में बीमारियों का 1 प्रभाव बड़ी तेजी से होता है, कारण यही है कि उनमें प्रतिरक्षा गुण मौजूद नहीं होते। एक बार आरंभ में बीमारियों से प्रभावित होने पर शरीर में वृद्धि पर घातक प्रभाव पड़ता है और मृत्युदर भी बढ़ती है। इसी कारण नवजातों के आहार में जीवाणु वेशी पदार्थ देने से शरीर वृद्धिकारी प्रभाव देखने में आते हैं। (शरीर वृद्धि में 10-15% तक बढ़ोतरी एवं मृत्युदर 10-15% की कमी देखी गई है) अतः नवजातों (बछियाँ एवं बछड़ों) के आहार में जीवाणु द्वेशी पदार्थ यदि 20-40 मि.ग्रा. प्रति कि.ग्रा. वजन के हिसाब से मिलायें जायें तो आहार क्षमता में 6-7 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी देखी गई है। इन खाद्य द्देशी पदार्थों के उदाहरण है- फ्लेवोफास्फोलीपॉल, एवीलामाईसिन, सेलीनोमाईसिन सोडियम एवं मोनान्सिन सोडियम। दूधारू व्यस्क पशुओं की अपेक्षा नवजातों में (बछड़ों) पर जीवाणु वेशी पदार्थों का प्रभाव अच्छा पड़ता है क्योंकि वयस्क रूमनधारी पशुओं में पाचन क्रिया जीवाणुओं द्वारा ही सम्पन्न होती है। परन्तु यदि मोनेन्सिन सोडियम को दुधारू पशुओं के आहार में 20-30 मि.ग्रा. प्रति कि. ग्रा. आहार, समाविष्ट करें तो दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इसका कारण मोनेन्सिस रूमन में मीथेन गैस का उत्पादन कम करता है और प्रोपिओनिक अम्ल के आणविक उत्पादन बढ़ाता है। अतः जहां चारे की अपेक्षा दुधारू जानवरों को दाना (पशुआहार) अधिक दिया जाता है, मोनेन्सिन् डालना प्रभावकारी है।
प्रोबायोटिक्स (लाभदायक जीवाणु एवं फफूंदयुक्त पदार्थ): नवजात बछड़ों में लाभदायक जीवाणु युक्त पदार्थों का आहार में यदि समावेश कराया जावे तो उनकी मृत्युदर में कमी एवं शरीर भार में वृद्धि देखी जाती है। ये लाभदायक जीवाणु युक्त पदार्थ बछड़ों के पेट में लेक्टिक अम्ल बनाते हैं जिससे उसका पी. एच. घट जाता है जिससे बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु वृद्धि नहीं कर पाते हैं अथवा मर जाते है। इन पदार्थों में लेक्टिक अम्ल उत्पन्न करने वाले जीवाणु, बाईफीडों जीवाणु एवं बैसिलिस जीवाणु प्रमुख है।
इसी प्रकार यदि दुधारू पशुओं के आहार में सेक्रोमाईसिस सेरीविसी नामक फफूंद की जीवित कोशिकायें अथवा उनसे उपजे चयापचय पदार्थ समावेश किये जावे तो दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी देखी जा सकती है। ये लाभदायक फफूंदयुक्त पदार्थ कम चारे एवं अधिक दाना देने वाली आहार पद्धति में अधिक लाभदायक होते हैं क्योंकि अधिक दाना खिलाने से पेट में अम्ल अधिक उत्पन्न होता है (एसीडोसिस) अतः ये पदार्थ उच्चअम्लता को कम करते हैं एवं पेट का पी. एच. मान सामान्य करने में सहायक होते हैं। ये पदार्थ मोटे चारों का अन्तःग्रहण क्षमता एवं पचनीयता दोनों बढ़ाते हैं, साथ ही साथ जीवाणु प्रोटीन भी अधिक मात्रा में बनती है, जिससे दुग्ध उत्पादन बढ़ता है। ये मीथेन गैस का पेट में उत्पादन कम करने एवं गर्मियों में पशुओं का तापमान स्ट्रेस कम करने में भी सहायक है। येबाजार में "यी सेक", लेक्टोसेक एवं न्यूट्रीसेक के रूप में उपलब्ध हैं।
3. बफर पदार्थः दुधारू पशुओं में अधिक दुग्ध उत्पादन हेतु एवं ब्याने के तुरंत बाद के दुग्ध उत्पादन काल में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता कम चारे एवं अधिक दाने वाले आहार को देने से पूर्ण होती है, पर इस प्रकार के आहार प्रदान करने से पेट में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है और एसीडोसिस, लंगड़ापन आना, दुग्ध ज्वर इत्यादि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। साथ ही साथ मोटे चारों की पचनीयता एवं दुग्ध में वसा का स्तर भी गिर जाता है। ऐसी स्थिति में बफर पदार्थ जैसे सोडियम बाईकार्बोनेट (खाने का सोडा) 200 ग्राम प्रति पशु प्रतिदिन या 1.5 प्रतिशत पशु आहार (दाने में) दिये जावे तो उपरोक्त विकारों से मुक्ति पाई जा सकती है।
ब. खाद्य अवयवों के पोषक मानों को बढ़ाने में प्रयुक्त नई तकनीकें:-
जो पशु 15 लीटर से ज्यादा दूध देते हैं उन्हें ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- अधिक उत्पादन व उपापचयन दर वाले पशु की पोषक आवश्यकताएं इच्छानुसार भरपेट खिलाई से आवश्यक पाच्य ऊर्जा नहीं प्राप्त हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में पशु को अधिक उर्जा उपलब्ध करवाने हेतु अधिक ऊर्जा वाले दाना मिश्रण की आवश्यकता होती है।
- ऐसी स्थिति में किसान दुधारू जानवरों को तेल पिलाते हैं, जो कि पेट में चारों को पचाने में सहायक जीवाणुओं की क्रियाओं पर बुरा असर डालता है। अतः किसान कुछ नवीनतम तकनीकों का प्रयोग करें जो इस प्रकार है।
1. बाईपास फैट तकनीकी: इस तकनीक में वसा को क्षारों (कैल्शियम व सोडियम हाईड्रोक्साइड) से क्रिया कराके ऐसे पदार्थ बनाये जाते हैं, जो कि खिलाने पर रूमन को बाईपास कर जाते हैं एवं स को अधिक ऊर्जा प्राप्त कराते हैं व तेल पिलाने के बुरे असर को खत्म कर देते हैं।
दुधारू पशुओं को बाईपास फैट (वसा) खिलाने के लाभ:-
- ब्यात के बाद जब पशुओं को अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है।
- दुग्ध ज्वर को कम करने में।
- बाईपास फैट खिलाने से दुग्ध उत्पादन बढ़ता है तथा उसके वसा में असंतृप्त फैटी ऐसिड की मात्रा बढ़ती है, जो कि हृदय रोगियों के लिए अच्छा दुग्ध है।
- पशुओं की प्रजनन क्षमता बढ़ती है।
2. बाईपास प्रोटीन तकनीकीः अधिक दुग्ध उत्पादन हेतु अधिक प्रोटीन का पशु आहार में स्तर होना आवश्यक है, परन्तु ऐसा करने पर प्रोटीन का अधिकतर हिस्सा पेट (रूमन) में अमोनिया में तुरंत परिवर्तित हो जाता है और वे पेट के जीवाणु इतनी एकदम से बढ़ी अमोनिया को ग्रहण नहीं कर पाते हैं और प्रोटीन का हास हो जाता है परन्तु अब नई तकनीकी जिसे "प्रोटीन बाईपास" कहते हैं इसमें खलियोनी को भूसी, शीरा, नमक, खनिज लवण तथा विटामिनों का प्रयोग किया जाता है। यह महंगा भी नहीं होता तथा पशु इसे चाव से खाते हैं। पशुओं को दी जाने वाली पशुओं की मात्रा तालिका 1 व 2 में दी गई है।
- प्रोटीन, ऊर्जा, खनिज और विटामिन से भरपूर पशु आहार से जानवर स्वस्थ रहते हैं व उनका विकास अच्छा रहता है। गर्भ में पल रहे बच्चे के समुचित विकास के लिए भी पशु को इसे खिलाना लाभप्रद होता है।
- यह प्रजनन शक्ति को बढ़ाता है तथा दुग्ध उत्पादन एवं वसा की मात्रा में भी वृद्धि करता है।
- बछड़े/बछियों को 1 से 1.5 कि.ग्रा. संतुलित आहार प्रतिदिन देना चाहिए।
- दुधारू पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए 2 कि.ग्रा. पशु आहार और प्रति लीटर उत्पादित दूध के लिए गाय को 400 ग्राम तथा भैंस को 500 ग्राम संतुलित पशु आहार खिलाना चाहिए।
- ब्याने वाली गायों/भैंसों को 1 कि.ग्रा. पशु आहार तथा । कि.ग्रा. अच्छी गुणवत्ता की खली, गर्भावस्था के अंतिम 2 महीने में अतिरिक्त देना चाहिए।
"दुधारू पशुओं के लिये आदर्श आहार" का मिश्रण
दुधारू पशुओं के आदर्श आहार निर्धारण के लिये निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-
1. आहार पशु को सन्तुष्टि देने वाला होना चाहिए।
2. आहार पाचन शील होना चाहिए।
3. आहार स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिए।
4. आहार दूध में उत्तम सुगंध देने वाला होना चाहिए।
5. आहार में समस्त पौष्टिक तत्व उचित मात्रा में होने चाहिये।
6. आहार में कई प्रकार के खाद्य होने चाहिए।
7. आहार में रसीले और हरे चारे पर्याप्त मात्रा में होने चाहिये।
8. आहार सस्ता होना चाहिए।
9. आहार स्थूल तथा सन्तुलित होना चाहिए।
10. आहार विषैला नहीं होना चाहिए।
पशुओं को दिये जाने वाले आहार में दाने का मिश्रण सस्ते, उपलब्ध अवयवों के अनुसार तैयार करना चाहिये कभी-कभी एक ही प्रकार के दाने को न देकर कई प्रकार के दानों को मिलाकर मिश्रण तैयार करना चाहिये।
दुधारू पशुओं के आहार में हरा चारा पर्याप्त मात्रा में होना चाहिये, लगभग 10 घण्टे के अन्तराल पर दिन में केवल 2 बार आहार देना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि चारा व दाना प्रतिदिन नियमित अन्तराल पर दें। दुधारू पशुओं को दिये जाने वाले आहार की उपयोगिता बढ़ाने के लिये दानों को पीसकर, भिगोकर खिलाते हैं तथा चारों को काटकर खिलाना चाहिये। आहार से अधिकतम लाभ प्रतिशत पोषक तत्वों की पूर्ति चारे से करनी चाहिये। इन बातों का ध्यान रखते हुये साथ-साथ हमें दुधारू पशुओं को पर्यापत पीने के लिये स्वच्छ व ताजा पानी भी उपलब्ध करवाना अनिवार्य है। खल व दाना कंकड़, पत्थर, फफूंदी रहित होना चाहिये, विशेषकर खल अच्छी एवं विश्वसनीय कम्पनी का उत्पादन होना चाहिए।
लेखकः डॉक्टर पूतन सिंह, प्रधान वैज्ञानिक भारतीय कृषि पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान इज्जत नगर बरेली।
