
पशुधन के माध्यम से गांवों में आएगी समृद्धि Publish Date : 26/02/2026
पशुधन के माध्यम से गांवों में आएगी समृद्धि
डॉ0 पूतान सिंह एवं डॉ0 डी0 के0 सिंह
गांवों की समृद्धि की तस्वीर अब केवल खेतों तक सीमित नहीं है। पशुधन ग्रामीणों की आय, रोजगार व आर्थिक स्थिरता का मजबूत आधार बन रहा है। खेती पर बढ़ते जोखिम और लागत के बीच पशुपालन, डेरी और पोल्ट्री किसानों के लिए भरोसेमंद्र सहारा बने हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में पशुधन को ग्रामीण विकास के इंजन के रूप में आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। सरकार देश में 20 हजार से अधिक पशु चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाने जा रही है, ताकि गांवों में इलाज इलाज सुलभ हो सके। पशु चिकित्सकों की दूर करने के लिए 1.5 लाख पशु देखभाल सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षण देने की योजना लाई गई है। इससे पशु मृत्यु दर घटेगी।

पशुधन की अहमियत इस तथ्य से समझी जा सकती है कि खेती से होने वाली कुल आय का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा पशुपालन से आता है। यह 2014-15 से लगातार 12.77 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। आज कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धित में पशुधन का योगदान 30.87 प्रतिशत से अधिक हो चुका है, जबकि एक दशक पहले यह मात्र 24.38 प्रतिशत था। यानी खेती की तुलना में पशुपालन अधिक तेज गति से ग्रामीणों की आय बढ़ा रहा है।
वेटरनरी और पैरा-वेट कालेज, पशु अस्पताल, डायग्नोस्टिक लैब और प्रजनन सुविधाएं स्थापित करने को ऋण आधारित सब्सिडी का प्रविधान है। देश में पशु चिकित्सा कालेजों की संख्या 84 है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है। पशुपालक किसान उत्पादक संगठनों को क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी से जोड़ा जा रहा है, ताकि वे नई तकनीक अपनाकर मूल्यवर्धन और विपणन में आगे बढ़े।
डेरी क्षेत्र बड़ी मिसाल, भारत सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश

डेरी क्षेत्र इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और वैश्विक दूध उत्पादन का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में होता है। वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 485 ग्राम प्रतिदिन रही, जो विश्व में औसत 328 ग्राम से कहीं अधिक है। यह केवल उत्पादन की कहानी नहीं है, बल्कि गांवों में रोजगार, नियमित नकदी प्रवाह और पोषण सुरक्षा की भी गाथा है।
दूध, अंडा, मांस, ऊन और बकरी के दूध जैसे उत्पादों ने ग्रामीणों की आय के कई रास्ते खोल दिए हैं। जाहिर है कि पशुधन अब गांवों में केवलः पूरक गतिविधि नहीं रहा, बल्कि समृद्धि की रीढ़ बनता जा रहा है। अगर पशु स्वास्थ्य एवं बाजार तक पहुंच मजबूत होती है तो पशुधन ग्रामीण भारत की आर्थिक तस्वीर को बदले सकता है।
लेखकः डॉक्टर पूतान सिंह: प्रिंसिपल साइंटिस्ट आईवीआरआई बरेली, प्रोफेसर डी. के. सिंह, पशु चिकित्सा महाविद्यालय, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ।
