‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती’ से आत्मनिर्भर किसान      Publish Date : 22/09/2026

‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती’ से आत्मनिर्भर किसान

                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

वर्तमान समय में जारी ग्लोबल वार्मिंग एवं वायुमण्ड़ल में आने वाले परिवर्तनों का सामना करने और उसके दुष्प्रभावों को कम करने में ‘‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती” पूरी तरह से सक्षम है। इस तकनीक का उपयोग करने वाले किसान भाई कर्ज के दुष्चक्रों से भी मुक्त रहते है। एक अनुमान के अनुसार, देश में अभी लगभग 40 लाख किसान ही ‘‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती” विधि से खेती कर रहे हैं। आम किसानों के बजट में श्री सुभाष पालेकर द्वारा पेश की गई ‘‘शून्य बजट प्राकृतिक खेती” तकनीक को देशभर के किसानों को अपानाने की बात कही गई है।

गौरतलब है कि इस तकनीक के माध्यम से खेती-किसानी कार्यों की लागत लगभग शून्य ही आती है। इसी के चलते वित्तीय वर्ष 2026-27 की आर्थिक समीक्षा में इस तकनीक से खेती करने को छोटे किसानों के लिए आजीविका का एक आकर्षक विकल्प बताया गया था। उस दौरान अपने बजटीय भाषण में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि यह कृषि पद्वति नवोन्मेषी है, जिसके माध्यम से किसानों की आय को बढ़ाया जा सकता है। 

न्य लागत प्राकृतिक खेती क्या है

इस तकनीकी के माध्यम से पिछले कुछ समय से देश के कुछ भागों में खेती-किसानी की जा रही है। प्राकृतिक खेती ऑर्गेनिक खेती से अलग प्रकृति की होती है, हालांकि, कुछ लोग पूरी जानकारी नही होने के कारण इन दोनों को एक ही मान लेते हैं। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद् के द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसर ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” तकनीक से खेती-किसानी करने के दौरान किसान को चार प्रक्रियाओं को अपनाना होता है, जिनमें से प्रथम प्रक्रिया है ‘‘बीजामृत”। इस प्रक्रिया के अंतर्गत गोबर एवं गौमूत्र का लेप बीज के ऊपर चढ़ाया जाता है। दूसरी प्रक्रिया होती है ‘‘जीवामृत” जीवामृत प्रक्रिया के अंतर्गत गोबर, गौमूत्र, गुड़, दलहनी चूरा, पानी और मिट्टी के घोल का छिड़काव जमीन के ऊपर किया जाता है और क्रिया से मृदा जीवाणुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है।

‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” जैविक खेती की तीसरी प्रक्रिया ‘‘आच्छादन” की होती है, इस प्रक्रिया में मिट्टी की सतह पर जैव सामग्री की एक परत बनाई जाती है, जिससे कि जल के वाष्पीकरण की प्रक्रिया को बन्द या धीमा किया जा सके और मृदा में ह्यूमस का निर्माण हो सके। इसकी चौथी और अन्तिम प्रक्रिया होती है ‘‘वाफसा” जिसका उद्देश्य मृदा में वायू एवं वाष्प के कणों का एक समान मात्रा में निर्माण करना होता है। ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” प्रणाली में कीटों के नियंत्रण के लिए गोबर, गौमूत्र एवं हरी मिर्च की सहायता से बने विभिनन घोलों का उपयोग किया जाता है, जिसे ‘‘क्षयम” कहते हैं।

लागतः ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” के माध्यम से खेती-किसानी मोटेतौर पर देशी गाय के गोबर एवं गौमूत्र की सहायता से से ही की जाती है और इसमें बाहर के आदानों का प्रयोग नही किया जाता है। इस तकनीक के माध्यम से एक किसान, एक देशी गाय के गोबर एवं गौमूत्र की सहायता से तीस एकड़ जमीन पर शून्य लागत प्राकृतिक खेती कर सकता है। देशी गाय की प्रजाति से उसके गोबर एवं गौमूत्र से जीवामृत, घन-जीवामृत एवं जामन बीजामृत तैयार कर लिया जाता है। इसका उपयोग खेत में करने से मृदा में पोषक तत्वों की वृद्वि के साथ ही साथ उसकी जैविक गतिविधियों का भी विस्तार होता है। महीने में एक अथवा दो बार जीवामृत का छिड़काव खेत में किया जा सकता है, जबकि बीजामृत का उपयोग केवल बीजोपचार के लिए ही किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाहर से कोई भी कीटनाशक रसायन अथवा खाद को खरीदने की आवश्यकता नही होती है। ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” तकनीक के अंतर्गत फसलों की सिंचाई के लिए लगने वाली बिजली एवं पानी की लागत भी वर्तमान लागत का मात्र 10 प्रतिशत ही होती है।

शुरूआतः जापानी दाशर्निक एवं वैज्ञानिक मासानोबू फुकुओका के द्वारा सर्वप्रथम ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” को लोकप्रियता प्रदान की गई थी। उन्होंने ही सबसे पहले कृषि के इस मॉडल का परीक्षण सिंकोकू में स्थित अपने खेतों में किया था। इस प्रकार इस तकनीक से खेती आरम्भ करने का श्रेय मासानोबू फुकुओका को ही दिया जाता है।

भारत में इस तकनीक का आरम्भः भारत में ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” प्रणाली का चलन सदियों पुराना है। हालांकि, ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” को वर्तमान में लोकप्रिय बनाने का श्रेय सुभाष पालेकर को प्रदान किया जाता है। ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” को ऑन्ध्र प्रदेश सरकार के द्वारा वर्ष 2015 में अपनाया गया। कृषि की इस पद्वति को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने का महत्वपूर्ण कार्य एक गैर-लाभकरी संगठन ‘‘रैयत साधिकरा” नामक एक संस्था कर रही है। इस संगठन को अजीम प्रेमजी फिलनथ्रॉपिक इनिशिएटिव और ऑन्ध्र प्रदेश सरकार विततीय सहायता उपलब्ध करा रही हैं। इस संगठन के द्वारा लगभग 1,38,000 किसानों तक ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” तकनीक को पहुँचाया गया है और मात्र दो वर्ष की अवधि में ही 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि में कृषि के इस मॉडल के माध्यम से खेती की जाने लगी हैं।

देश के अन्य हिस्सों में भी प्रसारः ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” की पद्वति का देश के अनेक भागों में प्रसार किया गया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 की आर्थिक समीक्षा के अनुसार कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश ऐसे अन्य राज्यों में शामिल हैं, जिनमें यह कृषि पद्वति तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

“राष्ट्रीय कृषि विकास योजना” से ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” पद्वति का प्रसारः आर्थिक समीक्षा के अनुसार, ‘‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना” के अंतर्गत 704 गाँवों के 131 संकुलों में ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती” की तकनीक को अपनाया जा रहा है। देश में कृषि के इस मॉडल को लगभग 1,63,034 किसानों के द्वारा अपनाया जा रहा है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।