शून्य बजट आधारित प्राकृतिक खेती      Publish Date : 31/07/2026

      शून्य बजट आधारित प्राकृतिक खेती

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

कई वैकल्पिक एवं कम निवेश खेती की पद्धतियां भारत में और वैश्विक स्तर पर उभरी हैं. जिनसे किसानों को कम लागत में उच्च पैदावार मिल सकती है। उपभोक्ताओं के लिए रसायनमुक्त आहार की उपलब्धता के साथ मृदा की उर्वरता में भी इन पद्धतियों से सुधार होगा। शून्य बजट प्राकृतिक खेती का ऐसा ही एक तरीका है जहां फसल की बुआई तथा कटाई की लागत शून्य है। इसका मतलब है कि किसानों को फसल की स्वस्थ वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद करने की आवश्यकता नहीं है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती एक कम निवेश वाली जलवायु अनुकूल खेती की तकनीक है। यह किसानों को कम लागत और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है। 

शोध छात्री, पीएचडी, सस्य विज्ञान विभाग, डा. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषिविद्यालय, पूसा समस्तीपुर 848125 (पीएचडी उद्यानिकी निकी विभागाला नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर-482004 (मध्य प्रदेश)

  • कीटनाशकों के उपयोग को यह समाप्त करती है।

शून्य बजट प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ

जीवामृत

                                   

जीवामृत उपयुक्त सूक्ष्मजीवाणुओं तथा ह्यूमस निर्मित करने वाले उपयुक्त सभी प्रकार के जीवाणुओं का सर्वोत्तम जामन है। यह एक प्रकार का सूक्ष्मजीव कल्चर है। इसको बनाने की विधि निम्न है:

  • 200 लीटर पानी के डूम में 180 लीटर 

बीजामृत के लाभ

  • बीजामृत बीज पर अमृत के समान कार्य करता है। इससे बीज की अंकुरण क्षमता 90 प्रतिशत तक हो जाती है।
  • बीज को सेहतमंद बना देता है, जिससे बेहतर पैदावार की संभावना अधिक हो जाती है।
  • बीजामृत से बीज उपचारित करने से बीज तेजी से और अधिक मात्रा में उगकर आता है। जड़ें ज्यादा विकास करती है और फफूंद जैसे रोग नहीं लगते हैं।
  • पानी के साथ 10 कि.ग्रा देसी गाय का ताजा गोबर डालें। 8 से 10 लीटर देसी गाय का गौमूत्र भी डालें।
  • 1 कि.ग्रा गुड़ के साथ । कि.ग्रा बेसन डालने के साथ किसी पेड़ के नीचे की एक मुट्टी मिट्टी डालें।

यह सब डालने के बाद एक डंडे की सहायता से घड़ी की दिशा में इसे 2-3 मिनट तक घुमायें। इसके बाद इसे छांव में बोरी से ढककर 3 दिनों तक रख दें। इन 3 दिनों में इसे सुबह-शाम घड़ी चलने की दिशा में 2-3 मिनट तक घुमायें। इस तरह 3 दिनों बाद जीवाणुओं से भरपूर जीवामृत तैयार हो जाएगा।

यदि कम या ज्यादा जीवामृत बनाना चाहते हैं, तो पानी की मात्रा के अनुपात में बाकी पदार्थों को घटा या बढ़ा सकते हैं।

सावधानियां

  • देसी गाय का गौमूत्र जितना पुराना होगा उत्तना अच्छा होगा तथा गोबर जितना ताजा उतना अच्छा होगा।
  • काले रंग का गुड़ प्राकृतिक गुड़ होता है। यदि काले रंग का गुड़ उपलब्धइस्तेमाल कर सकते हैं।
  • तैयार जीवामृत को एक सप्ताह के अंदर खेतों में डाल दें, क्योंकि 9 दिनों बाद इसमें जीवाणुओं की संख्या घटने लगती है।

प्रयोग विधि

  • देसी गाय का ताजा गोबर लें और इसे छांव या हल्की धूप में सुखा लें।
  • 7 से 10 दिनों में गोबर सूखने के बाद इसमें से 100 कि.या गोचर को छांव में फैला लें।
  • अब इसके ऊपर पेड़ के नीचे की एक मुट्टी मि‌ट्टी छिड़क दो फिर इसके ऊपर। किग्रा बेसन का छिड़‌काव करें।
  • 1 कि.ग्रा गुड़ को 4 से 5 लीटर देसी गाय के गौमूत्र में घोलकर गोबर पर छिड़काव करें।

इन सब तत्वों को गोबर में अच्छी तरह से मिला दें। 4 से 5 दिनों तक इसे ऐसे ही रहने दें। इसके बाद धनजीवामृत तैयार हो जाएगा। इसके बाद इसे कूटकर बारीक कर लें और एक जगह छांव में इक‌ट्ठा कर लें।

एक बार में 21 लीटर जीवामृत के घोल को 100 लीटर पानी में मिलाकर । एकड़ क्षेत्रफल में डालें। यह प्रक्रिया 21 दिनों बाद फिर दोहराएं। इस तरह एक फसल में 21 दिनों के अंतराल में 3 से 4 बार जीवामृत हाल सकते हैं।

घनजीवामृत प्रयोग विधि

  • 1 क्विंटल घनजीवामृत एकड़ में एक या दो बार एक फसल में डालें।

लाभ

जीवामृत कीटरोधक, फफूंदनाशक तथा सर्वोत्तम विषाणुनाशक भी है।

बीजामृत का प्राकृतिक खेती में बहुत ही बड़ा योगदान है। कोई भी फसल बोने से पहले अपने बीजों का उपचार जरूर कर लें।

जीवामृत के छिड़‌काव से फसल पाले से बचती है।

प्रयोग विधि

यह पौधों की पत्तियों को सूरज की रोशनी के साथ आने वाली घातक विकिरणों से बचाता है।

जीवामृत में ऐसे वृद्धिकारक संजीवक हैं, जिनके छिड़‌काव से पत्तियों का आकार बढ़‌ता है। जब पत्तियों का आकार बढ़ता है, तो पत्तियों के आहार बनाने का क्षेत्र भी बढ़ता है, जिससे उत्पादन बढ़ता है।

गेहूं, धान, दलहनी फसलों तथा सब्जियों के बीजों पर बीजामृत का छिड़‌काव करें। अच्छी तरह से मिलाकर छांव में सुखाकर बीजों का उपयोग बुआई के लिए करें।

सब्जियों की बुआई (नर्सरी द्वारा): खेत में रोपाई से पहले अंकुर को बीजामृत्त घोल में डुबोकर रोपाई करें।

जीवामृत छिड़‌कने से एसीटोडाइजोटोपीकस जैसे सूक्ष्मजीवाणु आपातकाल में सोधे, हवा से नाइट्रोजन लेते हैं और पत्तियों को देते हैं।

आच्छादन (मल्चिंग)

मुख्यतः 3 तरीके से मल्चिंग की जा सकती है।

मृदा-आच्छादनः यह खेती के दौरान शीर्ष मृदा की रक्षा करता है तथा हल चलाकर या जुताई कर मृदा को नष्ट नहीं करता है।

भूसा/पुआल-आच्छादनः भूसा आमतौर पर पिछली फसलों के सूखे बायोमास अपशिष्ट को कहते हैं।

जीवित-आच्छादनः यह आवश्यक है कि मोनोकोटाइलडन (एकबीजपत्रीय) और डाइकोटाइलडन (द्विबीजपत्रीय) की कई प्रकार की फसलें एक ही खेत में उगायें। इससे मृदा और फसलों की सभी आवश्यक तत्वों को आपूर्ति हो जाती है।

वाफसा (मॉइश्चर)

वाफसा वह स्थिति है, जहां वायु और जल के अणु, दोनों मृदा में उपस्थित होते हैं। इससे सिंचाई जल देने की आवृति कम हो जायेगी।

शून्य बजट प्राकृतिक खेती का लक्ष्य पर्यावरण और किसान दोनों को कई प्रकार के लाभ प्रदान करना है। यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती के संकट को दूर करने, आजीविका को बनाए रखने और परिवार के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखने के लिए एक कृषि मॉडल के रूप में उभरा है। यह बाहरी आदान-प्रदान को खत्म करने के साथ-साथ मृदा को फिर से जीवंत करने के लिए मूल स्थान पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके, आय सूजन, मृदा स्वास्थ्य को बहाल करने और विविध, बहु-स्तरीय फसल प्रणालियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के असर को कम करके किसानों की लागत को कम करता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ