
प्राकृतिक खेती से बढ़ाएं आय Publish Date : 28/07/2026
प्राकृतिक खेती से बढ़ाएं आय
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
शून्य बजट कम बजट प्राकृतिक खेती, खेती का एक नया तरीका है, जिसे 'पुनः पारंपरिक खेती की ओर' या खेती के आधार के रूप में संदर्भित किया जाता है। इसमें उत्पादन की लागत शून्य मानी जाती है (एफ.ए.ओ., 2016)1। इसे 'जीरो बजट आध्यात्मिक खेती' के रूप में भी जाना जाता है। इसमें पारंपरिक कृषि पद्धतियों को शामिल किया जाता है, जिनमें खेत पर उपलब्ध संसाधनों में ही खेती होती है तथा बाहरी फसल आदानों की आवश्यकता नहीं होती है। खेती के लिए खेत के बाहर से कुछ भी नहीं खरीदना पड़ता है
शून्य बजट प्राकृतिक खेती की आशंकाएं
जीरो बजट प्राकृतिक खेती ने अपने संभावित आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों के कारण ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया है। कई विशेषज्ञों को शून्य बजट प्राकृतिक खेती पद्धति के प्रदर्शन और प्रभाविता पर संदेह है। केवल सीमित अध्ययन यह दरावा करने के लिए उपलब्ध है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती कृषि आदानों की लागत में उल्लेखनीय कमी और उपज में वृद्धि करती है। कई अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती को अपनाने के कुछ वर्षों के बाद आमदनी में गिरावट आनी शुरू हो जाती है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती में उत्पादन लागत शून्य नहीं है। उन्हें सिंचाई, मशीनरी और उपकरणों जैसे आदानों पर खर्च करना पड़ता है। लाभप्रदता के मुर पर किये गये अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती को अपनाने के कुछ वर्षों के बाद कई किसानों ने पुनः पारंपरिक खेती की ओर रुख किया है (आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक, वर्ष 2019)।
खेत में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग पौधों की वृद्धि के लिए किया जाता है, ताकि मृदा की उत्पादकता और फसल की उपज में सुधार हो सके।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती के स्तंभ

शून्य बजट प्राकृतिक खेती टिकाऊ कृषि पारिस्थितिक प्रणाली के दृष्टिकोण पर आधारित है और यह पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने में मदद करती है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती के सिद्धांत सुभाष पालेकर द्वारा विकसित किए गए थे। सुभाष पालेकर द्वारा वर्णित शून्य बजट प्राकृतिक खेती के चार संचालक जीवामृत, बीजामृत, आच्छादन (पलवार) एवं व्हापासा (नमी मृदा वातन) है।
जीवामृत
यह गाय के गोबर और मूत्र, गुड़, दाल के आर्ट, पानी एवं मृदा से तैयार सूक्ष्मजीवों का किण्वित मिश्रण होता है। यह मृदा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ाता है और मृदा में पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि करता है। विभिन्न प्रक्षेत्र परीक्षणों के परिणामों ने पुष्टि की है कि जीवामृत, फसलों के विकास और उपज कारकों की वृद्धि में सहायक है। सुभाष पालेकर के अनुसार, प्रति हैक्टर भूमि पर लगभग 500 लीटर जीवामृत की आवश्यकता होती है। इसका महीने में दो बार छिड़काव करना चाहिए। 12 हैक्टर क्षेत्रफल के लिए जीवामृत बनाने के लिए एक गाय पर्याप्त होती है।
बीजामृत
इसको गाय के गोबर एवं मूत्र तथा चूने से तैयार किया जाता है, जिसका बीज को कोटों एवं मृदाजनित रोगों से बचाने के लिए बीज के चारों ओर सूक्ष्मजीव आवरण बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। वेंकटराव (वर्ष 2019) द्वारा किए गए प्रच परीक्षण के परिणाम से पुष्टि होती है कि जब दलहनी फसलों के बीजों को बीजामृत से उपचारित करके बुआई करते है, तो अंकुरण दर, अंकुर वृद्धि और बीज ओज सूचकांक में वृद्धि होती है।
आच्छादन (पलवार)
इससे अभिप्राय मृदा सतह को फसल अवशेषों या आवरण फसलों से ढकना है। इसका मुख्य उद्देश्य मृदा नमी का संरक्षण, मुदाजलधारण क्षमता में वृद्धि एवं खरपतवारों का प्रबंधन है। व्हापासा (नमी मृदा वातन) जल प्रबंधन में परिवर्तन है जहां मृदा में मौजूद हवा और पानी के अणु पानी की उपलब्धता और पानी के उपयोगकी दक्षता को बढ़ाने में मदद करते हैं। अंतर फसल, वर्षा जल संग्रहण के लिए समोच्च एवं मेड़ का निर्माण, केंचुओं की स्थानीय प्रजातियों का उपयोग अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती एवं आय

विशेषज्ञों के अनुसार, शून्य बजट प्राकृतिक खेती से सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक लाभ प्राप्त होने की संभावना है। शून्य बजट प्राकृतिक खेती को अपनाने वाले राज्यों आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में हुए सामाजिक, आर्थिक और कृषिगत प्रभावों का विवरण सारणी में दिया गया है।
आंध्र प्रदेश का अनुभव
आंध्र प्रदेश सरकार ने वर्ष 2015-16 में शून्य बजट प्राकृतिक खेती की शुरुआत की। वर्ष 2017-18 में शून्य बजट प्राकृतिक खेती एवं गैर-शून्य बजट प्राकृतिक खेती प्रक्षेत्रों में किए गए फसल कटाई परीक्षणों से ज्ञात हुआ कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती के अंतर्गत उगाई गयी सभी फसलों से अपेक्षाकृत अधिक उपज प्राप्त हुई।
कर्नाटक का अनुभव
कर्नाटक में जिन किसानों ने शून्य बजट प्राकृतिक खेती को अपनाया है। वे लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनकी आजीविका में सुधार हुआ है। खड़से एवं साथियों (वर्ष 2017) के अनुसार पारिवारिक स्वास्थ्य, उत्पादन की लागत में कमी, खाद्य उपभोग में आत्मनिर्भरता एवं पर्यावरण लाभ कर्नाटक में शून्य बजट प्राकृतिक खेती की लोकप्रियता के प्रमुख कारक हैं।
संभावना
शून्य बजट प्राकृतिक खेती से होने वाले लाभों पर साक्ष्य एवं तथ्य जुटाने के लिए व्यापक प्रक्षेत्र अध्ययनों की आवश्यकता है। देश में लागू करने से पहले शून्य/कम बजट प्राकृतिक खेती पद्धति की प्रभावकारिता का मूल्यांकन अग्रगामी परियोजना के रूप में किया जाना नितांत आवश्यक है। व्यापक प्रसार से पहले शून्य बजट प्राकृतिक खेती की आर्थिक व्यवहार्यता एवं दीर्घकालिक प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन बहु-स्थानीय अध्ययनों के द्वारा किया जाना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
