प्राकृतिक खेती: एक सामूहिक प्रयास      Publish Date : 09/11/2025

                     प्राकृतिक खेती: एक सामूहिक प्रयास

                                                                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

प्राकृतिक कृषि एक सामूहिक प्रयास है, जिसमें भूमि के स्वास्थ्य पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। यह पद्धति गाय पर आधारित है, जिसमें फसलों के आवश्यक सभी पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है। आज प्रकृति का दोहन इस स्तर पर पहुँच चुका है। कि जमीन, पानी वायु आदि हर प्रकार की प्राकृतिक कृषि में प्रदूषण व्याप्त है। भूमि के स्वास्थ्य मे इतनी विकृत आ गई है कि इसमें पैदा होने वाली वनस्पति एवं अन्य अत्यन्त जहरीले हो गये है। कृषि मंहगी होती जा रही है, उपरोक्त सभी का संरक्षण गौ आधारित प्राकृतिक खेती एक विकल्प के रूप में सामने आई है।

कम लागत प्राकृतिक खेती में जब भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है तो इसका मुख्य कारण भूमि में केंचुओं व सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या का बढ़ना है और इसकी संख्या को बढ़ाने में मुख्य योगदान देशी गाय के गोबर व गोमूत्र का है। जो अधिक मात्रा में नहीं चाहिए बल्कि इनसे ऐसे उत्पाद तैयार किये जाते है। जिससे आवश्यक पादप पोषण, कीट व रोग नियन्त्रण साथ ही लागत कम आती है।

जीवामृत

                                                             

जीवामृत पौधो व फसलों को उनकी वृद्धि के लिए आवश्यक सूक्ष्मजीवाणु उपलब्ध कराता है।

जीवामृत बनाने की विधि व प्रयोगः

उपरोक्त सामग्री को एक प्लास्टिक के ड्रम में डालकर प्रतिदिन डण्डे की सहायता से सुबह-शाम 2 से 5 मिनट तक मिलाना है। यहप्रक्रिया दो से तीन दिन तक करनी है। ड्रम के मुंह को सूती कपड़े अथवा जूट के बोरे से ढककर छायादार स्थान पर रखना है। इसका प्रयोग सिंचाई के पानी के साथ 200 ली० प्रति एकड़ प्रयोग करना है। सभी फसलों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

बीजामृत

बुवाई से पूर्व बीज को उपचारित करना आवश्यक होता है 100 कि.ग्रा. बीज के लिए बीजामृत हेतु निम्न की आवश्यकता पड़ती है।

1- पानी 20 ली0

2- गाय का गोबर 5 कि.ग्रा.

3- गाय का मूत्र 5 लीटर

4- मिट्टी जीवाणु युक्त 250 ग्रा.

5- चूना 50 ग्राम

उपरोक्त को मिलाकर 24 घंटे रखे राधा लकड़ी से मिलाये बीज में अच्छी तरह मिलाकर व छाया में सुखाकर बुवाई करें।

घनजीवामृत

घन जीवामृत सूक्ष्म जीवाणुओं का भण्डार गृह है। इसको बनाने के लिए निम्न सामग्री की आवश्यकता पड़नी है।

1- गाय का गोबर 100 कि.ग्रा.

2- गौमूत्र 5 लीटर

3- दलहन का आटा 2 कि.ग्रा.

4- गुड़ 2 किग्रा.

5- जीवाणु युक्त मिट्टी 250 ग्रा.

उपरोक्त सभी सामग्री को अच्छी तरह से मिलाकर हलवा/लड्डू जैसा गाढ़ा कर लें। दो दिन तक बोरी से ढककर रखें। सूखने पर पानी छिड़क दें।

बाद में इसे इतना गाढ़ा बना ले जिससे इसके बड़े साइज के लड्डू बन जाये। अब इन्हे छायादार स्थान पर ढककर रखें।

सूखा घन जीवामृत-

गीले घन जीवामृत को छाया में अच्छी तरह सुखा लें सूखने के बाद इसको लकड़ी से पीटकर बारीक करें व बोरो में भरकर छाया में भण्डारणकरें। इसे 6 महीने तक प्रयोग में लाया जा सकता है। इसे एक एकड़ में 100 किग्रा. घन जीवामृत तथा 100 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर खेत की तैयारी के समय नमी की अवस्था में प्रयोग करें।

नीमास्त्रः

                                                                

इसे बनाने के लिए 5 कि.ग्रा. नीम की हरी पत्तियों या 5 कि.ग्रा. निबोली लेकर अच्छी तरह से कूट लें। 100 ली. पानी में डालकर 5 लीटर गोमूत्र मिलायें तथा 1 कि.ग्रा. गाय का गोबर मिला लें। लकड़ी से इसे घोले व 2 दिन इसे ढककर रखें। 2 दिन बाद कपड़े से छान कर रस चूसने वाली कीट व सूड़ी इल्लियों के लिए नियन्त्रण हेतु फसल पर छिड़काव करें।

ब्रह्मास्त्रः

इसके लिए 10 ली. गोमूत्र में 2 कि.ग्रा. नीम के पत्ते 2 किग्रा. करंज के पत्ते, 2 किग्रा. सीताफल के पत्ते, 2 कि.ग्रा. धतूरे के पत्ते पीसकर डालें। अब सभी को एक बर्तन में डालकर व ढ़ककर उबालें 3-4 उबाल आने के बाद उतार लें। 2 दिन ठण्डा होने के बाद कपड़े से छानकर किसी बर्तन में भरकर रखे। 100 ली० पानी में 2-2.5 ली. ब्रहमास्त्र मिलाकर कीड़ों बड़ी सुण्डियों व इल्लियों के नियन्त्रण हेतु फसल में प्रयोग करें।

अग्नि अस्त्र-

इसके लिए 20 लीटर गोमूत्र, 1 किग्रा हरी मिर्च, 500 ग्रा. लहसुन, 5.0 किग्रा नीम के पत्ते 500 ग्राम अदरक सभी कूटकर एक बर्तन में मिलाकर डाले, तथा 4-5 उबाल आने पर उतार लें 2 दिन ठण्डा करने के बाद तथा 2 दिन बाद कपड़े से छानकर 100 ली० पानी में 2-2.5 लीटर घोल मिलाकर कीड़ों, सुण्डियों, टिड्डो तथा सभी प्रकार की बड़ी सुंडियों व इल्लियों के नियन्त्रण के लिए प्रयोग करें।

फफूँदी नाशकः

100 लीटर पानी में 3 लीटर खट्टी छाछ या लस्सी मिलाकर फसल पर छिड़काव करें। यह कवक नाशक तथा विषाणु रोधक है। सभी फसलों में प्रयोग किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।