जैविक उत्पाद प्रमाणिकरण की व्यवस्था      Publish Date : 07/08/2026

    जैविक उत्पाद प्रमाणिकरण की व्यवस्था

                                                                                 प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

देश में जैविक प्रमाणिकरण संस्थाओं, के गठन के बाद प्रायः ऐसे कृषक व उत्पादक संस्था कार्यालय में सम्पर्क कर रहे हैं जो खेती कार्याें में खाद के रूप में गोबर का प्रयोग कर रहे हैं या अपने फार्मों पर केचुआं खाद अथवा कम्पोस्ट इत्यादि को बनाने का कार्य कर रहे हैं तथा जैविक खेती प्रमाण-पत्र अथवा लाईसेंस जारी करने की बात कर रहे हैं, परन्तु जैविक खेती प्रमाणन का कार्य एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही मान्य होता है जिसमें खेती सम्बन्धी किये गये प्रत्येक क्रिया कलापों व खेती में प्रयुक्त सभी आदानों जैसे खाद, कीट व रोग नियंत्रण इत्यादि के प्रबंधन के लिए उपयोग में लिए गए पदार्थों का प्रलेख (रिकार्ड) मय तारीख के फार्मों पर संधारित करना होता है जिसका निरीक्षण कार्य प्रमाणीकरण संस्था द्वारा समय-समय पर जैविक खेती के मानकों के अनुसार किया जाता है।

जैविक खेती के मानक

जैविक खेती के अपने मानक तय है भारत में ये मानक राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एन.पी.ओ.पी.) कहलाते हैं जो वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा तय किये गये हैं। ये मानक त्पादन की विधि को प्रमाणित करने के लिए न कि उत्पादन की गुणवता को, ये मानक उत्पादन की न्यूनतम आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्मित किये गये हैं। प्रमाणीकरण के इन मानको व मापदण्डों व क्षेत्र के उत्पादन की आवश्यकताओं अनुसार परिवर्तित भी किया जा सकता जिसकी अनुमति व अनुमोदन भारत कार के राष्ट्रीय प्रत्यायन निकाय जिसका प्रतनिधित्व वर्तमान में कृषि तथा प्रसंस्कृत - उत्पादन विकास प्राधिकरण (एपिडा) दिल्ली कर रहा है, उससे होना जरूरी है।

जैविक उत्पाद के मानक विश्व में अलग-अलग देशों के अपने अलग-अलग निर्धारित किये गये हैं विश्व में मुख्यतः तीन के मानक हैं-यूरोप, अमेरिका व जापान, जिनमें आपस में थोड़ा ही अंतर है क्योकि ये सभी अर्न्तराष्ट्रीय मानक जैसे कांडेक्स एलिमेन्टेरियम, आई.एस.ओ.-65 व आई फोम मूल मानक के दिशा निर्देशों पर आधारित हैं। जैविक उत्पादन के प्रमाणीकरण कराते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस देश को जैविक उत्पाद का निर्यात करना है वहाँ के मानक क्या है व कौनसी प्रमाणीकरण संस्था को उस देश में मान्यता है।

  • चावल (मुख्यतः बासमती)।
  • दाल (मसूर)।
  • तिलहन (तिल, मूंगफली, सोयाबीन)।
  • गन्ना व उसके उत्पाद (गुड़ व शक्कर)।
  • फल (आम, अन्नानास, लीची, केला)।
  • कपास।
  • मसाला फसलें।
  • कॉफी व चाय।
  • शहद।
  • नारियल के उत्पाद।
  • सूख मेचे (काजू, अखरोट)।

उपरोक्त उत्पादों को सीधे या संधारित कर जैसे आम का रस, केले का रस या सूखा केला आदि भी निर्यात किया जा रहा है। एक अन्य क्षेत्र जिसमें मांगे तेजी से बढ़ रही है वह है औषधीय पौधे। औषधीय पौधे के बढ़ते अर्न्तराष्ट्रीय बाजार को देखते हुए औषधीय पादप बोर्ड की स्थापना भारत सरकार ने की है और यह बोर्ड भी औषधीय पौधों की जैविक खेती को ही बढ़ावा देने में प्रयासरत है। औषधीय पौधों को रासायनिक खेती में अमृत की बजाय विष बनाने से बचाने के लिए आवश्यक है कि औषधीय पौधों की खेती सदैव जैविक विधि से ही की जाये।

जैविक खेती एक आवश्यकता

देश में हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न का उत्पादन कई गुणा बढ़ा है जहां 1950-51 में अनाज उत्पादन 50.82 मिलियन टन था वहीं 2003-04 में इसका उत्पादन 212.05 मिलियन टन तक पहुंच गया है। लेकिन यह भी सच है कि उत्पादन बढ़ाने की होड़ में रासायनिक खाद, रासायनिक कीटनाशक, फंफूद नाशक, जीवाणुनाशक इत्यादि के प्रयोग में अंधाधुन्ध वृद्धि होती रही जिससे सब से बड़ा नुकसान मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी आना हुआ, मृदा में प्राकृतिक पोषक तत्वों की कमी होती गई तथा प्रदूषण की मात्रा व जहरीलापन मिट्टी, पानी, हवा सब में फैलता गया, इस मृदा में उत्पन्न खाद्यान्न, सब्जी, फल इत्यादि सभी में विष की मात्रा आने लगी जिसके दैनिक उपयोग से मनुष्य शरीर में कई विकार उत्पन्न होने लगे तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से ये घातक सिद्ध होने लगे।

इसका दूसरा सब से बड़ा असर हुआ कि महंगे रसायनों की खरीद में किसान कर्जदार बन गए तथा कर्ज में डूबा किसान आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध करने लगे हैं, जिसका ज्वलंत उदाहरण महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ में हुई ऐसी ही कृषक आत्महत्याओं की घटनाएँ हैं। ऐसी ही घटनाओं के कारण जागरूक उत्पादकों व उपभोक्ताओं का रूझान जैविक खेती की तरफ बढ़ा है, वैसे तो जितनी भी खाद्यान्न वस्तुएँ खेती से उत्पादित होती हैं उन सभी की कम ज्यादा मांग बाजार में रहती है इसमें फल और सब्जियों की मांग ज्यादा रहती है क्योंकि उनमें रसायनों के अवशेष ज्यादा होते हैं।

रासायनिक खेती में जहर की मात्रा कीट रोग नियंत्रण तक ही सीमित नहीं रहती है वरन् आजकल तो फूल गोभी को सफेद करने तथा भिंडी जैसी सब्जियों को हरा करने के लिए उन पर रसायनों का छिड़काव किया जाता है या फलों को रसायनों में डुबोया जाता है। इसलिए उपभोक्ता फल सब्जियों को जैविक खेती से उत्पादित ही खरीदना पसंद करने लगा है। संतुलित व पोषक तत्वों वाला भोजन करके ही मनुष्य तन्दरूस्त रह सकता है और स्वस्थ लंबी आयु को प्राप्त कर सकता है। इसलिए अपने व आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए हमें जैविक खेती पर बल देना चाहिए।

जैविक खेती-प्रबन्धन

जैविक खेती, देशी खेती का उन्नत तरीका है जिसमें भूमि की सजीवता, जल की गुणवता एवं जैव विविधता आदि को बनाये रखते हुए दीर्घकाल तक पर्यावरण एवं वायु प्रदूषित किये बिना ही टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जैविक खेती में जीवांश, प्राकृतिक संसाधनों एवं पदार्थों का समुचित उपयोग किया जाता है ताकि कम लागत में अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो सके।

जैविक खेती प्रबंधन के अंतर्गत फसल, मृदा, खेत पशु व पर्यावरण में संतुलन बनाये रखने के लिए निम्न क्रियाओं को खेती का हिस्सा बनाया जाना चाहिए-

  • यह उचित रहेगा की जैविक फार्म के कुछ हिस्से में पशुओं के चारे के लिए फसलें लगाई जावें ताकि बिना प्रदूषण के ही पशुओं के चारे की व्यवस्था फार्म पर हो जाये।
  • खेती में फसल चक्र को अपनाया जाये तथा फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश अनिवार्य रूप से करें।
  • भूमि में जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिए हरी खाद का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • जैव-विविधता को अपनाना चाहिए तथा फसलो की रोग प्रतिरोधक किस्मों का ही बुनाई हेतु प्रयोग करना चाहिए।
  • भूमि की उर्वरकता के लिए रासायनिक पदार्थ का उपयोग न कर जैविक खादजो स्वयं के खेत पर तैयार की गई हो जैसे वर्मी कम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट इत्यादि को प्रयोग में लाना चाहिए।
  • कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर जीवाणु खाद जैसे राईजोबियम, एजोटीवेक्टर इत्यादि खादों का प्रयोग करना चाहिए।
  • रासायनिक तत्वों से मुक्त जान से फसल की सिंचाई करता चाहिए, पानी की अधिकता की स्थिति खेत में उत्पन्न न हो साथ ही ध्यान रहे कि कारखाने के प्रदूषित जल सीवरेज जल से फसलों की सिंचाई नहीं करनी चाहिए।
  • कीट नियंत्रण हेतु स्वयं के खेत पर तैयार नीम, धतूरा, आंक एवं गौमूत्र को जैव कीटनाशी के रूप में प्रयोग में लाना चाहिए।
  • खरपतवार नियंत्रण हेतु समय पर निराई-गुड़ाई करवाते रहना चाहिए।
  • जल व मृदा संरक्षण के प्रबंधन फार्म पर आवश्यक रूप से करना चाहिए।
  • रोग नियंत्रण हेतु जैविक बीजोपचार ट्राईकोडरमा, खट्टी छाछ इत्यादि का उपयोग कर करना चाहिए।
  • पशुओं के साथ मानवीय व्यवहार करना चाहिए। अधिक दूध प्राप्त करने के लिए आक्सीटोक्सीन का इंजेक्शन नहीं लगाना चाहिए।
  • जैविक खेती से उत्पादित खाद्यान्नों की पैकिंग के लिए प्रमाणीकरण संस्था द्वारा स्वीकृत पैकिंग सामग्री का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
  • जैविक पदार्थों का भण्डारण परम्परागत जैविक विधि से ही करना चाहिए।
  • जैविक पदार्थों के परिवहन में राष्ट्रीय जैविक उत्पादक मानकों के दिशानिर्देशों की अनुपालना करनी चाहिए।

जैविक खेती में बुवाई से लेकर जैव उत्पाद के उपभोक्ता तक पहुंचने की सम्पूर्ण प्रक्रिया में यह ध्यान रखना होगा कि प्रक्षण को सम्भावना नगण्य रहे तथा उत्पाद में रसायनिक भारी तत्वों का नाम मात्र भी समावेश सम्भावित न हो। अतः जैविक उत्पादन के प्रमाणीकरण प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए उत्पादक स्वयं आश्वस्त होना चाहिए कि क्या वह जैविक खेती के लिए भारत सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय जैविक उत्पादन मानक” में दिये गये दिशा निर्देशों की अनुपालना में समर्थ है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।