जैविक खेती की संभावनाएं      Publish Date : 30/05/2026

             जैविक खेती की संभावनाएं

                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

दुनिया के कई देशों के उपभोक्ता अब जैविक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दे रहे हैं। वैश्विक बाज़ार में भारत के जैविक कृषि उत्पादों की भी मांग बढ़ रही है। ऐसे में भारत के कृषि उत्पादों को जैव खाद्य पदार्थों के रूप में लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इससे भारत बाकी दुनिया के लोगों के लिए महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। साथ ही, जैविक खेती को बढ़ावा देने से कृषि उपादानों पर खर्च कम हो सकेगा। जैविक खेती से तात्पर्य फसल उत्पादन की उस पद्धति से है जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशियों, व्याधिनाशियों, शाकनाशियों, पादप वृद्धि नियामकों और पशुओं के भोजन में किसी भी रसायन का प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि उचित फसल चक्र, फसल अवशेष, पशुओं का गोबर व मलमूत्र, फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश, हरी खाद और अन्य जैविक तरीकों द्वारा भूमि की उपजाऊ शक्ति बनाए रखकर पौधों को पोषक तत्वों की प्राप्ति कराना एवं जैविक विधियों द्वारा कीट-पतंगों और खरपतवारों का नियंत्रण किया जाता है।

जैविक खेती एक पर्यावरण अनुकूल कृषि प्रणाली है

इसमें खाद्यान्नों, फलों और सब्जियों की पैदावार के दौरान उनका आकार बढ़ाने या वक्त से पहले पकाने के लिए किसी प्रकार के रसायन या पादप नियामकों का प्रयोग भी नहीं किया जाता है। जैविक खेती का उद्देश्य रसायन मुक्त उत्पादों और लाभकारी जैविक साम्रगी का प्रयोग करके मृदा स्वास्थ्य में सुधार और टिकाऊ फसल उत्पादन को बढ़ावा देना है। इससे उच्च गुणवत्ता वाली फसलों के उत्पादन के लिए मृदा को स्वस्थ और पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाया जा सकता है।

सतत कृषि विकास और जैविक खेती

जैविक खेती का एक उद्देश्य जीवंत तथा टिकाऊ खेती का विकास है। इसके अंतर्गत फार्म प्रबंधन की ऐसी प्रणाली अपनाई जाती है जिससे पारिस्थितिकी सुरक्षित रहे, खरपतवार तथा नाशीजीवों पर नियंत्रण हो, वानस्पतिक तथा जन्तु अवशेषों का पुनर्चक्रण हो, फसल चक्र अपनाया जाए, सिंचाई, निराई आदि की सही व्यवस्था हो। जैविक खेती में मृदा उर्वरता को स्थिर रखने के लिए ऐसी प्रणाली अपनाई जाती है जिससे जैव सक्रियता अधिकतम बनी रहे। मिट्टी की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशा ठीक रहे और पौधों के लिए संतुलित पोषक तत्वों की आपूर्ति होती रहे। इस प्रकार जैविक खेती में उत्पादक और उपभोक्ताओं की अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाता है।

कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत तेजी से दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो रहा है। भारत को आत्मनिर्भर और विकसित बनाने की दिशा में कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। ऐसे समय में जब एक तरफ़ भारत जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है, तो दूसरी तरफ़, पूरी दुनिया में वर्ष 2023 को भारत के नेतृत्व में 'अंतर्राष्ट्रीय पौष्टिक अनाज वर्ष' के रूप में मनाया जा रहा है, मोटे अनाजों से निर्मित जैविक फसल उत्पादों का महत्व और भी बढ़ जाता है।

जैविक उत्पादों की प्रमुख विशेषताएं

  • जैविक खाद्य पदार्थो में आमतौर पर विषैले तत्व नहीं होते हैं क्योंकि इनमें कृषि रसायनों, कीटनाशियों, पादप हार्मोन और संरक्षित रसायनों जैसे नुकसान पहुँचाने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया जाता है जबकि सामान्य खाद्य पदार्थों में कृषि रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ज्यादातर कीटनाशियों में ऑर्गेनो-फास्फोरस जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिनसे कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है।
  • जैविक रूप से तैयार किए गए खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद है। सामान्य खाद्य पदार्थों की अपेक्षा इनमें अधिक पोषक तत्व पाए जाते हैं क्योंकि इन्हें जिस मिट्टी में उगाया जाता है, वह अधिक उपजाऊ होती है।
  • जैविक खाद्य पदार्थ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। साथ ही, इनको लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जैविक खेती द्वारा उगाए जाने वाले फलों एवं सब्जियों में ज्यादा एंटी-ऑक्सिडेंटस होते हैं क्योंकि इनमें कीटनाशी अवशेष नहीं होते हैं।
  • आजकल लोगों में एंटीबायोटिक को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। इसका कारण यह है कि खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। जब हम ऐसे खाद्य पदार्थों को खाते हैं, तो हमारा इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। जैविक रूप से उगाए खाद्य पदार्थों की वजह से हम इस नुकसान से बच सकते हैं।
  • इसके अलावा, जैविक खाद्य पदार्थों में अधिक मात्रा में शुष्क पदार्थ पाए जाते हैं। साथ ही, जैविक सब्जियों में नाइट्रेट की मात्रा 50 पीपीएम से कम होती है जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है।
  • जैविक खेती शुरू करने से पहले जमीन को दो साल के लिए ऑर्गेनिक खाद पदार्थों के उपयुक्त नहीं माना जाता है ताकि इस अवधि के दौरान फसलें मिट्टी में मौजूद सभी हानिकारक व विषैले तत्वों का अवशोषण कर सकें।
  • फसल उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होने के कारण इनका आसानी से निर्यात किया जा सकेगा जिससे हमें विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिलेगी।

थाली से लेकर किसानों तक पहुँचे स्टार्टअप

'देहात' इस समय बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों में लाखों किसानों को जैविक उर्वरकों, कृषि बीमा, फसल कटाई और मृदा परीक्षण से संबंधित सेवा प्रदान कर रहा है। किसान की मेहनत से उगने वाले फूल जब देवालयों में चढ़ाए जाते हैं, तब तक तो पूजनीय होते हैं, मगर अगले कुछ दिनों में वे बेकार की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसे में इस जैविक कचरे को कारगर बनाने का काम कानपुर का 'फूल' नामक स्टार्टअप कर रहा है। यह भारत का पहला बायोमैटिरियल स्टार्टअप है जो मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों को रिसाइकल करके उनसे ऑर्गेनिक वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण करता है।

स्टार्टअप सीधे किसानों से जैविक उत्पाद खरीदते हैं। इनमें तमिलनाडु के 'ब्लिस ट्री' स्टार्टअप ने जैविक उत्पादों से बने दर्जनों दक्षिण भारतीय पकवानों के उत्पाद तैयार किए हैं। वहीं हैदराबाद के स्टार्टअप 'मिलेनोवा' ने मोटे अनाजों के जैविक उत्पादों में फल और सब्जियाँ मिलाकर 'रेडी-टू-ईट स्नैक्स' तैयार किए हैं।

फसल अवशेष प्रबंधन

किसानों के लिए फसल अवशेष के प्रबंधन हेतु 50 प्रतिशत सब्सिडी मूल्य पर भारत सरकार द्वारा संचालित योजना 'कृषि अभियंत्रण को बढ़ावा देकर फसल अवशेषों का खेतों में प्रबंधन' के अंतर्गत निम्नलिखित कृषि उपकरण व मशीनरी उपलब्ध कराने का प्रावधान है-

सूपर स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम, पैडी स्ट्रा चॉपर, थैशर मल्चर, हैपी सीडर, हब मास्टर/रोटरी स्लैशर, हाइड्रोलिक रिवर्सेबल मोल्ड बोल्ड प्लाउ, जीरो टिल सीड व उर्वरक ड्रिल, सुपर सीडर, बैलिंग मशीन, क्रॉप रीपर।

उपरोक्त सुविधाओं का लाभ लेने के लिए किसानों को अपने जिले के कृषि विस्तार अधिकारी से सम्पर्क करना होता है। इसके अलावा, सरकार धान उत्पादन करने वाले किसानों के खेतों पर पूसा बायो डिकम्पोजर का निशुल्क छिड़काव आयोजित करती है ताकि किसान के खेत पर ही फसल अवशेषों का सदुपयोग कम्पोस्ट के रूप में किया जा सके।

बीजोपचार की पर्यावरण हितैषी तकनीक

प्रकृति में पाए जाने वाले विभिन्न मित्र कीटों व फफूंदों को फसलों में बीमारी फैलाने वाले रोगाणुओं के नियंत्रण हेतु प्रयोग किया जा सकता है। इसी प्रकार ट्राईकोडरमा एक जैविक फफूंदी नाशक है जिसे भूमि जनित उत्पन्न रोगों के नियंत्रण में काम लेते है। यह एक तरह का सूक्ष्म परजीवी है जिसके प्रयोग से विभिन्न फफूंदजनित बीमारियों को रोका जा सकता है। सामान्यतः इसको जड़ गलन, उकठा, तना गलन व नर्सरी में पौधों का सड़ना इत्यादि रोगों के विरुद्ध प्रयोग करते हैं। इसके प्रभाव दूरगामी एवं विश्वसनीय होते हैं और पर्यावरण के लिए भी यह हानिकारक नहीं है।

ट्राईकोडरमा सस्ता, आसानी से उपलब्ध व इसका प्रयोग भी सुगम है। ट्राईकोडरमा की विभिन्न कल्चर ट्राईकोडरमा विरिडी, टी. हरजाइम, टी. पोलीस्पोरम है। मृदा उपचार के समय मृदा में पर्याप्त नमी होनी भी जरूरी है। इसका प्रयोग पहली सिंचाई के समय भी किया जा सकता है। ट्राईकोडरमा का प्रयोग गन्ना, कपास, चना, अरहर, गेहूँ व सभी दाल वाली फसलों में करें। इसके अलावा, मृदाजनित फफूंदी रोगों से प्रभावित सब्जियों व बागवानी फसलों में भी ट्राइकोडरमा का प्रयोग लाभदायक पाया गया है। ट्राइकोडरमा का भंडारण ठंडे व हवादार स्थान पर करें। कल्चर व उपचारित बीज को तेज धूप व गर्मी में न रखें। कल्चर का उपयोग उत्पादन तिथि के एक वर्ष के पूर्व ही कर लें।

ऑर्गेनिक उत्पादों की विश्व बाजार में मांग

दुनिया के कई देशों के उपभोक्ता अब ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दे रहे हैं। वैश्विक बाजार में भारत के ऑर्गेनिक कृषि उत्पादों की भी मांग बढ़ रही है। ऐसे में भारत के कृषि उत्पादों को जैव खाद्य पदार्थों के रूप में लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इससे भारत बाकी दुनिया के लोगों के लिए महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। साथ ही, जैविक खेती को बढ़ावा देने से कृषि उपादानों पर खर्च कम हो सकेगा। इसका नतीजा है कि इन उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी हो रही है। ऑर्गेनिक कृषि उत्पादों का सर्वाधिक निर्यात अमेरिका और यूरोपीय यूनियन को होता है।

वैश्विक बाजारों में जिन उत्पादों की सर्वाधिक मांग रही उनमें अलसी, तिल, सोयाबीन, अरहर, चना, चावल, चाय व औषधीय पौधे शामिल हैं। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के अलावा कनाडा, ताइवान व दक्षिण कोरिया से भी इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त, जर्मनी भी इन उत्पादों का बड़ा आयातक है। इनमें तिलहन, गन्ना, मोटे अनाज, कपास, दलहन, औषधीय पौधे, चाय, फल, मसाले, मेवे, सब्जियों और कॉफी जैसे उत्पाद शामिल हैं। एपीडा के अनुसार ऑर्गेनिक कृषि उत्पादों के मामले में मध्य प्रदेश सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का नंबर आता है।

अलसी की जैविक खेती

जैविक खेती के मामले में भारतीय किसानों ने दुनिया भर में नया मुकाम हासिल कर लिया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारत में पैदा जैविक अलसी की सर्वाधिक मांग है। जैविक कृषि उपज के बेहतर मूल्य मिलने से जहां किसानों को लाभ मिल रहा है वहीं उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक व गुणवत्तायुक्त उत्पाद मिलने लगे हैं। जैविक पद्धति द्वारा अलसी की खेती करने के लिए जैविक खादों के रूप में अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद, केंचुआ खाद एवं मुर्गी खाद क्रमशः 4 टन, 2.2 टन एवं 1.2 टन प्रति हेक्टेयर शुष्क भार आधार पर प्रयोग की जाती है। इससे लगभग 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। मृदाजनित रोगों से बचाव हेतु मृदा में ट्राइकोडर्मा विरिडी नामक फंफूदनाशक का प्रयोग किया जा सकता है। पौध संरक्षण हेतु 0.03 प्रतिशत नीम तेल का छिड़काव करना चाहिए। कीटों को आकर्षित करने के लिए फेरामैन ट्रैप लगाया जा सकता है। जैविक खेती के परिणाम दर्शाते हैं कि अलसी की प्रति हेक्टेयर उपज शुरुआती तीन वर्षों में कम प्राप्त होती है। इसके बाद उपज में उत्तरोतर वृद्धि देखी गई। यदि किसान उपलब्ध जैविक खादों व जैविक कीटनाशकों का प्रयोग कर जैविक अलसी की खेती करें, तो निश्चित ही कुछ वर्षों में मृदा गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ ज्यादा उपज एवं लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।