पादप रोगों का नियंत्रण जैविक विधि के द्वारा      Publish Date : 30/03/2026

पादप रोगों का नियंत्रण जैविक विधि के द्वारा

                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

पादप रोगों का जैविक विधि के द्वारा नियंत्रण करना एक ऐसी तकनीक है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न रोग-जनकों जैसे कवक, बैक्टीरिया और वायरस आदि की संख्या को कम करने या उन्हें रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक जीवों जैसे कि कुछ विशेष सूक्ष्मजीवों और कीटों आदि का उपयोग किया जाता है। इस विधि के द्वारा रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कम किया जा सकता है, जो पर्यावरण और मानव के अतिरिक्त अन्य जवों के स्वास्थ्य के लिए अधिक सुरक्षित रहता है।

वर्तमान समय में पादप रोगों का नियंत्रण करने हेतु विभिन्न प्रकार के जैव नियंत्रण उपयोग में लाए जा रहे हैं और वतमान समय में विभिन्न प्रकार के पादप रोगों का नियंत्रण करने में इनकी भूमिका लगतार बढ़ती जा रही है। इस विधि का प्रयोग करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि यह पर्यावरण हितैषी होने के साथ ही मृदा के स्वास्थ्य के साथ ही उसकी उर्वरक क्षमता को भी बनाए रखने में काफी कारगर माने जाते हैं। 

पादप में रोग, विभिन्न प्रकार के रोगजनको (पथोजेंस) के द्वारा उत्पन्न होते है। यह रोग जनक विषाणु, जीवाणु, कवक विभिन्न प्रकार के कीट इत्यादि आदि हो सकते है।

पादप रोगों का जैविक नियंत्रण करने की विधिः

                                  

एक सर्वेक्षण के अनुसार सम्पूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 29 हजार करोड़ रुपए तक का नुकसान केवल फसलों पर लगने वाली विभिन्न प्रकार की बीमारियों के चलते हो जाता है, एवं इन रोगों के नियंत्रण हेतु साधारणतया जहरीले रसायनों का प्रयोग किया जाता है। देश में इन रसायनो की खपत लगभग 17.4 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष है, जिसका 90 प्रतिशत भाग कीट, खरपतवार एवं विभिन्न रोगों के रासायनिक नियंत्रण में उपयोग किया जाता है।

एक अनुमान के अनुसार, इन रसायनों का उपयोग करने के कारण हजारों करोड़ रुपए की कृषि पैदावार को बाजार में भी अस्वीकार कर दिया जाता हैं, क्योकि यह रासायनिक पदार्थ, खाध पदार्थाे के माध्यम से हमारी खाद्य श्रंखला में शामिल हो जाते है, जिससे मानव विभिन्न रोगो से ग्रसित हो जाता है। साथ ही साथ ये रसायन मृदा में शामिल होकर हमारे भूजल को भी प्रदूषित कर रहे होते है।

इस प्रकार इन रसायनो के कुप्रभाव से रोग करको मे भी इन रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही है। इस तरह कुछ मृदा जनित रोगो का नियंत्रण भी रसायनो के द्वारा कठिन होता जा रहा है। अतः रासायनिक पदार्थों के बढ़ते हुए दुष्प्रभावों को कम करने के लिये एक विकल्प के रूप में जैविक पादप रोग नियंत्रण की महत्त्वपूर्ण भूमिका वर्तमान समय मे उभर सामने कर आ रही है।

पादप रोगों का जैव नियंत्रणः

                                  

पादप रोगों के जैविक नियंत्रण की विधि वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत पौधो मे रोग/रोग कारको के नियंत्रण के लिये दूसरे लाभकारी जीवों का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में एक से अधिक सूक्ष्मजीवियों का उपयोग भी रोग कम करने या रोकने के लिये किया जा सकता है। अतः यह सूक्ष्मजीव, जो कि विभिन्न प्रकार के रोगों के नियंत्रण के लिये प्रयुक्त किए जाते हैं, जैविक रोग-नाशक कहलाते हैं, जिनका दुष्प्रभाव नगण्य होता है।

रोग नियंत्रण की इस प्रक्रिया मे, यह सूक्ष्मजीव रोग कारकों की संख्या को कम करते है तथा उनकी व्रद्धि को रोक देते है, जिससे संक्रमण के बाद भी यह बीमारी अधिक संक्रामक नही हो पाती और धीरे-धीरे सम्पूर्ण रोगों का नियंत्रण हो जाता है।

पादप रोगों के जैविक नियंत्रण की विधि में कवक एवं जीवाणु दोनों प्रकार के जैविक रोग नाशक सूक्ष्मजीव प्रयोग में लाये जा रहें और इनमें ट्राइकोडर्मा हारजिएनम, ट्राइकोडर्मा विरिडि, एसपरजिलस नाइजर, बैसिलस सबटिलिस एवं स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स आदि प्रमुख रूप से प्रयोग में लाए जा रहे हैं, जिनका उपयोग पादप रोग नियंत्रण हेतु प्रमुखता के साथ किया जा रहा है और अच्छे परिणाम भी प्राप्त किए जा रहे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।