
फसलोत्पादन एवं मृदा उर्वरता में जैविक खेती का महत्व Publish Date : 16/12/2025
फसलोत्पादन एवं मृदा उर्वरता में जैविक खेती का महत्व
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
किसानी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुख्य आधारशिला के रूप में जाना जाता है, और आज भी किसानों की आय का मुख्य साधन कृषि है। ग्रामीण भारत में लगभग 14.50 करोड़ किसान परिवारों को आजीविका प्रदान करने में कृषि महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। विश्व में निरन्तर बढ़ रही जनसंख्या एक विकट समस्या का रूप धारण कर रही है।
सम्पूर्ण जनमानस को भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की रासायनिक उर्वरकों जहरीले कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है। इससे फसलों के उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाया जा सका है, परन्तु भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता के साथ ही प्रकृति पर भी कुप्रभावों का असर दिखाई पड़ने लगा है।
रसायनों से होने वाले इस नुकसान को हम जैविक खेती से कम कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, जैविक खेती के और भी कई लाभहैं, जिसका उल्लेख निम्नवत है:
जैविक खेती

जैविक खेती कृषि की वह पद्धति है, जिसमें पर्यावरण के स्वच्छ प्राकृतिक संतुलन के साथ, जल एवं वायु को प्रदूषित किए बिना दीर्घकालीन व स्थिर फसल उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का उपयोग कम व आवश्यकतानुसार किया जाता है। यह पद्धति रसायनिक कृषि की अपेक्षा सस्ती एवं स्थाई होती है। जैविक खेती में मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना जाता है, जिसमे लाखों की संख्या मे सूक्ष्मजीव (कवक, जीवाणु आदि) पाये जाते हैं। देश मे विगत वर्षों से लगातार रासायनिक खादों का इस्तेमाल कम करने पर अत्यधिक जोर दिया जा रहा है।
इसके साथ-साथ जैविक खेती को बढ़ावा देने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, जैविक उत्पादन के मानक नियम के अनुसार रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग करने वाले क्षेत्रों में जैविक खेती के लिए मान्यता प्राप्त करने के लिए कम से कम 3 वर्षों का समय लगता है। इससे उस क्षेत्र पर पूर्ण रूप से रासायनिक उर्वरकों का असर समाप्त हो जाता है, जिसके फलस्वरूप खाद्यान्न, फल एवं सब्जियों को हानिकारक रसायनों से पूर्णतः मुक्त प्राप्त किया जा सकता है।
जैविक खेती भारत में सर्वप्रथम वर्ष 2001-2002 में मध्य प्रदेश राज्य से प्रारम्भ की गई और प्रत्येक जिले के गाँवों में जैविक खेती की गयी तथा इन गाँवों को जैविक गाँव का नाम भी प्रदान किया गया। मई 2002 में कृषि विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसके माध्यम से जैविक खेती अपनाने हेतु किसानों को प्रोत्साहित किया गया।
प्रदेश में जैविक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु चलित झांकी, पोस्टर्स, बैनर्स, जैविक हाट एवं विशेषज्ञों द्वारा जैविक खेती पर उद्बोधन आदि के माध्यम से किसानों में जैविक खेती के प्रति रुझान बढ़ाया जा सका। जैविक खेती वर्ष 2003-2004 में भारत में 76,000 हेक्टेयर में की जाती थी, जो कि वर्ष 2009-2010 में बढ़कर 10.85 लाख हेक्टेयर हो गई तथा अब सम्पूर्ण देश में जैविक खेती का क्षेत्रफल बढ़कर लगभग 33.32 लाख हेक्टेयर हो गया है।
पूरे विश्व में निरन्तर जैविक उत्पादों की मांग में वृद्धि हो रही है, जिसे पूरा करने के लिए भारत सरकार द्वारा निरन्तर प्रयास किया जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात प्राधिकरण (एपिडा) के अनुसार वर्ष 2017-2018 में लगभग 4.58 लाख मीट्रिक जैविक उत्पाद का निर्यात करके भारत ने विदेशों से लगभग ₹3,453.48 करोड़ का व्यापार किया था। जबकि वर्ष 2019-2020 में यह बढ़कर लगभग ₹6,38,998 मीट्रिक टन हो गया तथा लगभग ₹4,686 करोड़ का निर्यात भारत ने अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा, स्विट्जरलैंड, आस्ट्रेलिया, इजरायल, वियतनाम, न्यूजीलैंड और जापान इत्यादि देशों में किया है।
भारत सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) की सहायता से लगभग ₹1,576.65 करोड़ की आर्थिक सहायता प्रदान की है, जिससे किसान जैविक खेती के प्रति और अधिक जागरूक होकर इसे आसानी से अपना सके।हमारे देश में प्राचीन काल से कृषि के साथ पशुपालन पर भी अधिक ज़ोर दिया गया है, जिससे प्राप्त होने वाले गोबर को खाद के रूप में उपयोग किया जाता था। परन्तु बदलते परिवेश में पशुपालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का प्रयोग होने लगा है, जिसके परिणामस्वरूप जैविक और अजैविक चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है।
वातावरण प्रदूषित होकर, मानव जाति के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है जिससे आज लगभग सम्पूर्ण मानव समाज में विभिन्न प्रकार की भयंकर बीमारियों ने जन्म ले लिया है। मानव समाज में उत्पन्न होने वाली भीषण बीमारियों एवं महामारियों से निजात पाने के लिए जैविक खेती करना अति आवश्यक हो गया है। जैविक खेती की सहायता से सिर्फ बीमारियों का प्रकोप हीकम नही होगा अपितु जलवायु और वातावरण में हो रहे बदलाव को भी रोका जा सकेगा। जिससे मृदा उर्वरता के साथ उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि होगी।
जैविक खेती का मृदा एवं उत्पादन पर प्रभाव

- जैविक खेती से रासायनिक खेती की तुलना में लगभग बराबर ही उत्पादन प्राप्त होता है। जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णरूप से सक्षम है।
- वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती और भी अधिक लाभदायक है। इसके साथ ही किसानों की आय बढ़ाने के साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पादों को अच्छी कीमतों पर खरीदा जाता है। जिसके फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा जैविक उत्पाद को बेचने में आसानी होती है, इसके साथ ही मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधनों को कम से कम प्रदूषित किया जाए एवं पौष्टिक भोजन सम्पूर्ण मानव समाज के लिए आसानी से उपलब्ध कराया जा सके, जिसके लिये हमें रासायनिक खेती की पद्धतियाँ त्याग कर जैविक खेती की पद्धतियों को अपनाना होगा।
- यह हमारे प्राकृतिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हम स्वस्थ मानव जीवन के साथ पर्यावरण को भी स्वच्छ और सुरक्षित रख सकेंगे।
जैविक खेती अपनाने में आने वाली चुनौतियां
- जैविक खेती अपनाने में किसानों की विभिन्न प्रकार की चुनौतियों में से सबसे महत्वपूर्ण चुनौती जैविक उत्पाद की बिक्री के लिए बाजार व्यवस्था का न होना है, हालांकि भारत सरकार द्वारा जैविक खेती करने वाले किसानों का निरन्तर प्रमाणीकरण कराया जा रहा है, परन्तु इसकी प्रक्रिया गति बहुत धीमी होने के साथ ही अधिकतर किसानों को इसके बारे में जानकारी भी नहीं है।
- अतः किसानों तक जैविक खेती का समुचित लाम पहुँचाने के लिए किसानों को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
जैविक खेती के लाभ
- जैविक खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होने के साथ उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है।
- जैविक खेती करने वाले किसानों को फसलों में सिंचाई कम देनी पड़ती है अर्थात सिचाई अंतराल में भी वृद्धि होती है।
- जैविक खेती की सहायता से रासायनिक उर्वरक पर निर्भरता कम होने के साथ उत्पादन लागत में भी कमी आती है।
- जैविक उत्पादों की बाज़ार में मांग बढ़ने के साथ किसानों को अपने उत्पाद का अच्छा मूल्य प्राप्त होने से किसानों की आय में वृद्धि होती है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति और अधिक मजबूत होती है।
- जैविक खेती फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायता प्रदान करती है।
निष्कर्ष
रासायनिक खेती के नुकसान को देखते हुए, हम ये कह सकते हैं कि जैविक खेती आज के समय की मांग है। जैविक खेती हमें सतत विकास की तरफ ले जाएगी, जिससे हम अपनी मिट्टी और वातावरण को सुरक्षित रख सकते हैं। यह मानव जीवन के अतिरिक्त, अन्य जीवों के लिए भी लाभकारी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
