
जैविक खेतीः एक अभिनव तथ्य Publish Date : 20/11/2025
जैविक खेतीः एक अभिनव तथ्य
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
वर्तमान में सुरक्षित वातावरण एवं भोजन के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती जागरूकता के चलते पिछले कुछ वर्षों से जैविक तरीके से उत्पादित पदार्थों जैसे कि भोज्य सामग्री, औषधीय पौध (शाक), सुगंध और गंध आदि की मांग में काफी बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। जैविक कृषि, जो कि कृषि का सबसे पुराना स्वरूप है, जिसके बहुत से लाभ प्राप्त होते हैं जैसे कि उच्च मूल्य, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जैेसे भूमि की उर्वरता, जल की गुणवत्ता, भूमि के कटाव की रोकथाम और प्राकृतिक जैव विविधता की सुरक्षा और विभिन्नि प्रकार के सामाजिक लाभ जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, संशोधित पोषण और बाहर के आदानों पर न्यूनतम निर्भरता आदि हैं।
जैवीय पोषण, सक्षम जैविक उर्वरक एवं कीटनाशक, दलहनी और हरी खाद वाली फसलों युक्त फसल चक्र और वानस्पतिक कीट एवं रोग नाशक सफल जैविक उत्पाद के अपरिहार्य घटक हैं। जैविक उत्पादन, उच्च उत्पादकता के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु उपरोक्त वर्णित जैवीय लागतों का सफलतापूर्वक उपयोग करना भी आवश्यक है। इसी सन्दर्भ में पाँच मुख्य जैविक उत्पादों का वर्णन इस प्रकार से हैः-

वर्मी-कम्पोस्टः अधिकतर जैविक खादें उचित समय और मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाती हैं और इससे भी बड़ी समस्या है इन खादों का गुणवत्ता में, अर्थात (यह पूरी तरह से सड़ी हुई नहीं होती है) भी निम्न स्तर की होती हैं। इस कमी के चलते यह फसलों पर विपरीत प्रभाव (कीट एवं व्याधियों के आक्रमण) पर पड़ता है। वर्मी-कम्पोस्ट अथवा केंचुआ खाद, अन्य प्रकार की जैविक खाद की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होता है, क्योंकि आसानी से बनाई जा सकती है तथा साथ ही इसमें पोषक तत्वों के साथ-साथ लाभकारी सूक्ष्म जीवों की भी अधिकता भी होती है। किसी भी कृषि प्रक्षेत्र पर भारी मात्रा में कृषि अपशिष्ट उपलब्ध होते हैं, जिनका वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन में प्रयोग कर कृषक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है।
सीमैप लखनऊ के द्वारा सगंध पौधों के आसवन अपशिष्ट प्रबन्धन की एक बेहतर तकनीक विकसित की गई है जिसके माध्यम से इन अपशिष्टों की सहायता से उच्च गुणवत्ता युक्त केंचुआ खाद (वर्मी-कम्पोस्ट) बनाई जाती है। इस तकनीक का सबसे प्रमुख लाभ यह है कि इससे कम समय में बेहतर गणों से युक्त और पोषक तत्वों से भरपूर खाद का उत्पादन किया जा सकता है। आसवन अपशिष्टों (भूसा, पुआल या सब्जियों के अपशिष्ट) आदि की तुलना खाद तैयार करने में 20 से 35 दिनों की बचत की होती है। आसवन अपशिष्ट, जो कि कुछ या सीमित आर्थिक महत्व वाले होते हैं और खुले में प्रदूषण करते हैं, कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया के दौरान अपघटन में लगने वाले समय की काफी बचत उनके पूर्व में अत्याधिक भारी दबाव से उपचारित होने के कारण होती है। आसवन अपशिष्ट के माध्यम से उत्पादित होने वाली खाद में व्यवहारिक अपशिष्टों से उत्पादित खाद की तुलना में एन. पी. और के. की मात्रा भी 20-75 प्रतिशत तक अधिक होती है।
जैव उर्वरकः जैविक खाद, जीवित अथवा सुप्त अवस्था वाले सूक्ष्म जीवियों का वह समूह है, जिसकी जैविक क्रियाओं के परिणामस्वरूप फसलों के द्वारा पोषक तत्वों का अवशोषण करने से उनकी उपलब्धता बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए राईजोबियम, एजेक्टोबेक्टर और एजोस्पाइरिलियम आदि नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं, जबकि स्यूडोमोनास फॉस्फोरस की घुलनशीलता में वृद्वि कर उसकी उपलब्धता पौधों के लिए बढ़ाते हैं। इन सूक्ष्मजवियों के माध्यम से होने वाले लाभ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं हो पाते हैंे। उचित दशाओं की उपलब्धता में जैविक खादों के द्वारा प्रति हेक्टेयर की दर से 20-200 कि.ग्रा. तक नाइट्रोजन प्राप्त किया जा सकता है। चरागाह और चारे वाली फसलों में इनका प्रभाव अधिक असरकाक होता है।
इनका उपयोग करने से उत्पादकता में 10-25 प्रतिशत तक की वृद्वि होती है। साफ है कि जब कम लागत वाली सतत् फसलोत्पादन, कम से कम रसायनों के उपयोग से फसल उत्पादित करने का उद्देश्य होता है तो उस समय जैविक खाद के जैसे उत्पाद ही अधिक उपयोगी होते हैं।
जैविक कीटनाशकः कीटों और व्याधियों के द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 29,000 करोड़ रूपये की हानि फसलों में होती है, जिसमें से एक अकेले हेलीकोवेरपा नामक कीट के द्वारा ही 3,500 करोड़ रूपये की हानि होती है। इस प्रकार की स्थितियाँ उत्पन्न होने का कारण अविवेकपूर्ण तरीके से रसायनों का प्रयोग करना है, जिसके परिणामस्वरूप कीटों और व्याधियों में स्व-उत्पादित रसायनरोधिता और सूक्ष्म कीटों का प्रादुर्भाव है। प्रदूषण मुक्त, लक्ष्य विशिष्ट, अप्रतिरोधजन्य, सीमित प्रयोग, उत्पादन एवं गुणवत्ता में सुधार, अधिक माँग और मूल्य के जैसी विशिष्टताओं से युक्त जैविक कीटनाशक लाभकारी होने के साथ ही ्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। रासायनिक कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए जैविक कीट नियंत्रण (जैविक, प्रबन्धात्मक और जैविक रूप से मान्यता प्राप्त रसायनों के द्वारा) पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

जैविक कीट शत्रु जैसे परभक्षी (क्राइसोपेरिया), परजीवी (ट्राईकोग्रामा), जैव कीटनाशक जैसे ट्राईकोडर्मा, बैसीलस थूनजिनेसिस और एम. पी. वी. इत्यदि प्रदूषण मुक्त और मूल्य प्रभावी जैविक कीट एवं व्याधिनाशक हैं। सीमैप के द्वारा विकसित की गई ट्राईकोडर्मा हंरिजिनेसिस एक नई प्रजाति भूम्य जन्य रोगकारक कवकों और नीमेटोडड के नियंत्रण में सक्षम होने के साथ ही पौधों की वृद्वि में भी सहायक होते हैं। ऐसी आशा की जा रही है कि इस प्रजाति का प्रयोग कवकनाशकों, नीमेटोड नाशकों, उर्वरक और हॉरमोन आदि की खपत में कमी करने में भी सहायक होगा।
हरित खादें: हरित खादों में सामान्यतः वह फसलें शामिल की जाती हैं, जो उगाने के बाद जुताई कर भूमि मिला दी जाती है और इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। हरित खादों के लिए प्रयुक्त की जाने वाली फसलों की वृद्वि तीव्र गति से होती है और वह कम समय में अधिक शाकीय भाग पैदा करती है, जैसे कि गर्मियों के मौसम में ढैंचा और सर्दियों के मौसम में लूसर्न आदि फसलों को उगाया जाता है। यह फसलें मृदा की संरचना और उर्वरता को बढ़ाने के साथ-साथ भूमि में कार्बन पदार्थ की मात्रा में भी वृद्वि करती हैं जिससे कृषि के लिए लाभकारी सूक्ष्म जीवियों की संख्या में वृद्वि होती है।
अच्छी और सक्षम हरित खाद वाली फसलों के लिए यह आवश्यक है कि वह शीघ्रता के साथ बढ़ने वाली हो और कम समय में अधिक शाकीय पदार्थों को पैदा करने में सक्षम हों, जिससे कि मृदा में समुचित मात्रा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण हो सके। अच्छी हरी खाद वाली वह मानी जाती है, जो कि कम से कम समय में 40-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तक नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर सके और यह नाइट्रोजन बाद में बोई जाने वाली फसलों के लिए उपलब्ध हो सके।
वानस्पातिक कीटनाशकः कुछ पौधों में इस प्रकार के अवयव पाए जाते हैं जो कि कीटों एवं सूक्ष्मजीवियों के लिए वृद्विरोधी और घातक होते हैं, ऐसे पौधों को ही वानस्पातिक कीटनाशक कहते हैं। नीम, तम्बाकू और पायरेथ्रम ऐसे ही कुछ पौधे हैं, जिनसे कीटनाशक प्राप्त होते हैं। वानस्पातिक कीटनाशकों में कोई लक्ष्य विशिष्टता नहीं होती है। आमतौर पर वानस्पातिक कीटनाशक विभिन्न प्रकार के कीटों एवं सूक्ष्म जीवियों के प्रति प्रभावी सिद्व होते हैं। वानस्पातिक कीटनाशकों में तीव्र अपघटन होता है, जिसके चलते इनका प्रभाव देर नहीं बना रहता है और इसी कारण से यह प्रदूषण मुक्त होते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
