फसलों के लिए नीम की खली के लाभ      Publish Date : 03/11/2026

       फसलों के लिए नीम की खली के लाभ

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

किसान भाइयों के लिए महत्वपूर्ण सूचना: क्या आपने बिना नीम खली डाले ही बुवाई कर दी है? तो अब भी घबराइए मत, क्योंकि आपके पास अभी भी मौका है!

हमारे बहुत से किसान भाई ऐसे हैं जो कि बुवाई के समय नीम खली डालना भूल जाते हैं, लेकिन आप खड़ी फसल में भी नीम पाउडर/नीम खली का उपयोग कर सकते हैं और अच्छा मुनाफा भी कमा सकते हैं।

खड़ी फसल में नीम पाउडर / खली डालने के फायदे:

                               

1. जमीन के लिए:

  • जमीन में दीमक, व्हाइट ग्रब, निमेटोड और फफूंद को खत्म करती है।

  • जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है- इसमें NPK (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश) प्राकृतिक रूप में होता है।

  • यूरिया के असर को 30% तक बढ़ाती है, यूरिया कम उड़ने देती है।

2. फसल के लिए:

  • जड़ों का विकास तेज होता है, फसल हरी-भरी रहती है।

  • पौधे में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

  • फसल गिरती कम है।

3. खर्च कम, मुनाफा ज्यादा:

  • रासायनिक दवाओं का खर्च 40% तक कम हो जाता है

कैसे और कितना डालें?

                                 

मात्रा: 80 से 100 किलो प्रति एकड़

तरीका:

1.  नीम पाउडर को खेत में छिड़काव करके हल्की निराई-गुड़ाई कर दें। या

2.  सिंचाई के पानी के साथ बहा दें, ताकि वह जड़ तक पहुँच जाए।

उपयोग करने का सबसे अच्छा समय: बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली सिंचाई के साथ उपयोग करना चाहिए।

नीम तेल का उपयोग - हर किसान जरूर करे

पानी के साथ:

1 लीटर नीम तेल + 100 लीटर पानी प्रति एकड़, ड्रिप या सिंचाई के साथ दें। इससे जमीन के अंदर के कीट मर जाएंगे।

स्प्रे के साथ - हर स्प्रे में:

हर कीटनाशक / फफूंदनाशक के स्प्रे में नीम तेल जरूर मिलाएं।

मात्रा: 2 से 3 ml नीम तेल प्रति लीटर पानी + 1 ml कोई भी चिपकू (स्टिकर)।

फायदे:

  • रस चूसने वाले कीट जैसे एफिड, थ्रिप्स, सफेद मक्खी, मिली बग से बचाव।

  • दवा का असर 2 गुना बढ़ जाता है।

  • पत्तियों पर कुदरती चमक आती है, फसल जहरीली नहीं बनती।

> विशेष सलाह: हमेशा original कोल्ड प्रेस्ड नीम kernel तेल ही लें। तेज धूप में स्प्रे न करें।

एक बार नीम अपनाओ, जमीन भी बचाओ और पैसा भी!

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।