
धान के कटते ही पराली न जलाएं, बल्कि मशीन से बनाएं जैविक खाद Publish Date : 04/10/2026
धान के कटते ही पराली न जलाएं, बल्कि मशीन से बनाएं जैविक खाद
प्रो0 आर. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
धान की कटाई के बाद किसानों के खेत में एक बहुत बड़ी मात्रा में पराली बच जाती है। ऐसे में कई किसान खेत को जल्दी खाली करने के चक्कर में पराली को जला देते हैं, लेकिन ऐसा करने पर सरकारी प्रतिबन्ध है और इससे मिट्टी और पर्यावरण दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में किसानों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि धान की पराली को किस प्रकार से गलाएं और इसे खेत में ही उपयोगी जैविक पदार्थ में कैसे बदला जा सकता है।
ऐसे में पराली को जलाने के बजाय मल्चर, सुपर सीडर और इसी प्रकार के अन्य कृषि मशीनों की सहायता से पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खेत की मिट्टी में मिलाया जा सकता है। इसके बाद पर्याप्त नमी बनाए रखने और उचित पोषक तत्व उपलब्ध कराने से पराली के विघटन की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
धान की पराली को विघटित करने आसान तरीका
धान की पाली को गलाने का सबसे आसान तरीका यह है कि सबसे पहले खेत में मौजूद पराली को मल्चर या किसी अन्य उपयुक्त मशीन से उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में कुतर दिया जाए, क्योंकि पराली जितनी अच्छी तरह कटेगी, उसके मिट्टी के संपर्क में आने की संभावना उतनी बढ़ जाती है। इसके बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए किसान अपने खेत की स्थिति के अनुसार सिंचाई भी कर सकते हैं।
लेख में दिए गए किसान अनुभव के अनुसार, कुतरी हुई पराली पर करीब 5 से 6 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल करने से सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ाने और पराली के विघटन में मदद मिल सकती है। हालांकि, यूरिया की मात्रा खेत के क्षेत्रफल, मिट्टी की स्थिति और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार निर्धारित करना बेहतर रहता है। और इस हेतु अत्यधिक यूरिया का प्रयोग करने से बचना चाहिए।
मल्चर मशीन से पराली के करें छोटे टुकडें
धान की पराली को गलाने के लिए सबसे पहले पराली की कटाई और कतराई की प्रक्रिया को सही तरीके से समझना जरूरी है। मल्चर मशीन फसल अवशेषों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने में मदद करती है। मल्चर से कुतरी हुई पराली खेत की मिट्टी के साथ आसानी से मिल सकती है। इससे फसल अवशेषों के विघटन की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है। किसान ट्रैक्टर और खेत की स्थिति के अनुसार उपयुक्त मल्चर का चुनाव कर सकते हैं। मशीन से पराली को खेत में मिलाने से किसान को पराली इकट्ठा करके बाहर ले जाने की जरूरत भी कम हो सकती है। इससे समय और श्रम दोनों की बचत हो सकती है।
सुपर सीडर से पराली प्रबंधन और गेहूं की बुवाई

धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई करने वाले किसानों के लिए सुपर सीडर एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। इसके साथ ही यह भी समझना भी जरूरी है कि पराली को खेत में मिलाकर अगली फसल की तैयारी कैसे की जाए। सुपर सीडर पराली को काटकर खेत में मिलाने के साथ गेहूं की बुवाई में भी मदद करता है। इससे किसान को पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती और खेत में मौजूद फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इस तकनीक का इस्तेमाल खेत की नमी, पराली की मात्रा और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए। मशीन चलाने से पहले खेत की स्थिति और मशीन की सेटिंग सही रखना भी जरूरी है।
पराली सड़ने में कितना समय लगता है?
कई किसान यह सवाल पूछते हैं कि पराली को पूरी तरह सड़ने में कितना समय लगता है। इसका कोई एक निश्चित समय नहीं है। तापमान, नमी, पराली की मात्रा, मिट्टी और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता के आधार पर समय अलग-अलग हो सकता है। उचित नमी और अनुकूल परिस्थितियों में कुतरी हुई पराली कुछ सप्ताह में काफी हद तक सड़ सकती है। खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना इस प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। किसानों को पराली के विघटन के दौरान खेत की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए और जरूरत के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए।
पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी को क्या फायदा होगा?
इसका महत्व केवल पराली के निस्तारण तक ही सीमित नहीं होता है। फसल अवशेषों को खेत में वापस मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिल सकती है। पराली के सड़ने के बाद उसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व मिट्टी में वापस पहुंचते हैं। इससे मिट्टी की संरचना, जलधारण क्षमता और जैविक गतिविधियों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
लंबे समय तक फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ सकती है। हालांकि, मिट्टी की वास्तविक स्थिति के अनुसार पोषक तत्वों की जरूरत अलग-अलग होती है, इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद और उर्वरक प्रबंधन करना बेहतर रहता है।
पराली जलाने के बजाय अपनाएं यह तरीका

धान की पराली जलाने से निकलने वाला धुआं आसपास की हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। आग लगाने से खेत की ऊपरी सतह पर मौजूद लाभकारी जीवों और जैविक पदार्थ को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसका समाधान मशीनों और उचित खेत प्रबंधन में देखा जा सकता है। किसान पराली को खेत में मिलाकर उसका उपयोग कर सकते हैं या फिर इसे बेलर मशीन की मदद से गट्ठर बनाकर बेच सकते हैं। इससे पराली को समस्या मानकर जलाने के बजाय उसका उपयोगी प्रबंधन किया जा सकता है।
बेलर मशीन से पराली बेचकर करें अतिरिक्त कमाई
हर किसान के लिए पराली को खेत में मिलाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। इसके साथ ही किसान यह भी देख सकते हैं कि उनके क्षेत्र में पराली की खरीद होती है या नहीं। बेलर मशीन पराली को इकट्ठा करके मजबूत गट्ठरों में बदल देती है। इन गट्ठरों को स्थानीय खरीदारों, बायोमास से जुड़े उद्योगों और अन्य संबंधित इकाइयों को बेचा जा सकता है, जहां स्थानीय स्तर पर ऐसी मांग मौजूद हो। पराली बेचने से पहले किसान को खरीदार, बाजार भाव, गट्ठर का वजन और परिवहन लागत की जानकारी जरूर कर लेनी चाहिए। इससे वास्तविक कमाई का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।
पराली प्रबंधन का तरीका
प्रगतिशील युवा किसान राजेन्द्र सिंह के अनुसार, पराली जलाने के बजाय इसे खेत में सड़ाना जमीन के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है। उनके अनुसार, पराली के सड़ने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिलती है और खेत की मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। उनका कहना है कि कुतरी हुई पराली पर उचित नमी और यूरिया उपलब्ध होने से इसके सड़ने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। किसान अपने क्षेत्र की कृषि सलाह के अनुसार इस तकनीक को अपना सकते हैं।
किन बातों का ध्यान रखना जरूरी?
धान की पराली के प्रबन्धन की इस विधि को अपनाते समय किसानों को कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले पराली को अच्छी तरह कुतरना जरूरी है ताकि वह मिट्टी के संपर्क में आ सके। इसके बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें। यूरिया या किसी अन्य उर्वरक का इस्तेमाल मिट्टी परीक्षण और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करना उचित है। बहुत अधिक मात्रा में उर्वरक डालने से बचना चाहिए। मशीन का चुनाव भी खेत की स्थिति और ट्रैक्टर की क्षमता के अनुसार करना चाहिए। इससे मशीन की कार्यक्षमता बेहतर रह सकती है और अतिरिक्त खर्च से बचने में मदद मिल सकती है।
पराली प्रबंधन से कम हो सकती है खेती की लागत
धान की पराली के प्रबन्धन का यह तरीका अपनाने से किसान पराली हटाने के लिए आग लगाने की जरूरत से बच सकते हैं। मशीनों के सही इस्तेमाल से पराली प्रबंधन में लगने वाले श्रम और समय को कम करने में मदद मिल सकती है। जब फसल अवशेष खेत में वापस मिलते हैं, तो मिट्टी में जैविक पदार्थ बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, खेती की लागत और पैदावार पर इसका प्रभाव खेत, मौसम, फसल प्रबंधन और मिट्टी की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए किसान लगातार कुछ वर्षों तक अपने खेत की मिट्टी, उत्पादन लागत और फसल की पैदावार का रिकॉर्ड रखकर इसके प्रभाव का आकलन भी कर सकते हैं।
किसानों के लिए आवश्यक जानकारी
अंत में धान की पराली के प्रबन्धन का सबसे महत्वपूर्ण तरीका यही है कि पराली को जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए। मल्चर से पराली को कुतरकर, खेत में उचित नमी बनाए रखकर और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार पोषक तत्वों का प्रबंधन करके इसके विघटन में मदद मिल सकती है। जिन किसानों के पास पराली बेचने की सुविधा उपलब्ध है, वे बेलर मशीन के माध्यम से गट्ठर बनाकर अतिरिक्त आमदनी का विकल्प भी तलाश सकते हैं। इस तरह पराली का सही प्रबंधन खेत, किसान और पर्यावरण, तीनों के लिए उपयोगी हो सकता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।