एजेटोबैक्टर: फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्तम      Publish Date : 15/09/2026

एजेटोबैक्टर: फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्तम

                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता  

  • एजेटोबैक्टर जैव उर्वरक नाइट्रोजन की पूर्ति, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और फसल उत्पादन में सुधार के लिए उपयोगी है। 

एजेटोबैक्टर: फसलों में नाइट्रोजन नामक पोषक तत्त्व की पूर्ति के लिए केमिकल खादों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, लेकिन एक तो खादों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और ये कभी समय पर मिल भी नहीं पाती हैं। वैसे भी केमिकल खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी, पानी और हमारा वातावरण आदि सभी प्रदूषित हो रहे हैं।

इस समस्या से बचाव के लिए अब कृषि वैज्ञानिकों का ध्यान इसके विकल्प की ओर लगा हुआ है। उन्होंने नाइट्रोजन के रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैव उर्वरकों को इस्तेमाल करने का रास्ता सुझाया है, जिन में एजेटोबैक्टर सबसे विशेष है, क्योंकि यह सस्ता, सभी जगह मिलने वाला और हमारी जलवायु के प्रति अनुकूल भी होता है। ऐसे में आज हम इसके बारे में आपको पूरी जानकारी प्रदान करने जा रहे हैं-

एजेटोबैक्टर के जीवाणु मिट्टी में पौधे के जड़ क्षेत्र में रहते हैं, ये वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को अमोनियम में बदल देते हैं, जो पौधों को मिल जाती है। ये कुछ हारमोन जैसे जिब्रेलिक एसिड भी पैदा करते हैं, जिस से पौधों के विकास में तेजी आती है।

अनाज वाली फसलों में नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए 20वीं शताब्दी के शुरू में सोवियत वैज्ञानिक बैजरींक ने एजोबैक्टर नामक जीवाणु को जमीन से निकाल कर उस की क्वालिटी और काम का पता लगाया था। यह एक बड़ी कामयाबी थी, जिस का आज कई देशों में लाभ भी उठाया जा रहा है।

भारतीय मिट्टी में एजेटोबैक्टर की ‘एजेटोबैक्टर कोकोकम’नामक वैरायटी पाई जाती है, जो पौधों की जड़ों पर रहती है। यह वैरायटी आक्सीजन की मौजूदगी में नाइट्रोजन को इकट्ठा कर के उसे अमोनियम में बदल कर पौधों के लिए उपलब्ध कराती है। तमाम तरह की जांचों से पता चला है कि एजेटोबैक्टर जीवाणुओं का सभी तरह की गैर दलहनी फसलों में उपयोग किया जा सकता है।

एजेटोबैक्टर का इस्तेमाल धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, गेहूं, जौ, सरसों, तिल, सूरजमुखी, अरहर, मूंग, उड़द, मटर, मसूर, गन्ना, कपास, तंबाकू, जूट, आलू, टमाटर, प्याज, लहसुन, बैगन, गोभी, मिर्च, केला, अंगूर, पपीता आदि सभी फसलों में किया जा सकता है।

उपयोग करने का तरीका

एजेटोबैक्टर को बीज व मिट्टी उपचार के लिए उपयोग किया जाता है-

बीजोपचार के रूप में: एजेटोबैक्टर कल्चर से बीजों को बोने से पहले उपचारित किया जाता है। इस के लिए थोड़ा पानी लें और उस में 2 सौ ग्राम एजेटोबैक्टर कल्चर मिलाकर कर उसकी लुगदी तैयार कर ली जाती है। तैयार की गई इस लुगदी में थोड़ी मिट्टी और गुड़ भी मिला सकते हैं। गुड़ की वजह से कल्चर बीजों के ऊपर आसानी से चिपक जाता है। इस तैयार लुगदी को एक एकड़ में बोए जाने वाले बीजों में मिलाएं और तब तक पलटते रहें जब तक कि सभी बीजों पर लुगदी की परत न चढ़ जाए। उपचारित बीजों को छाया में सुखाएं और जल्दी ही इन बीजों की बुवाई कर दें।

मृदा के उपचार के लिएः एजेटोबैक्टर कल्चर को भुरभुरी मिट्टी, खाद या कंपोस्ट के साथ 1:5 अनुपात में मिला कर समान रूप से खेत में बिखेर दिया जाता है। अगर इसे कूंड़ों में डाला जाए तो यह अधिक लाभदायक साबित होता है।

इससे मिट्टी का उपचार तब करें जबः

  • फसल की बुवाई गरम मौसम में करनी हो।
  • जब उपचारित की जाने वाली जमीन में डिनाइट्रीकारक की मात्रा अधिक हो।

पौध उपचार के लिएः इस का इस्तेमाल धान, सब्जियों व फलों के पौधे लगाते समय किया जाता है। इस के लिए 3 पैकेट एजेटोबैक्टर कल्चर को 15-20 लीटर पानी (प्रति एकड़ के हिसाब से) में डाल कर घोल बना लें और इस में पौधों की जड़ों को 10-15 मिनट तक डुबो कर रखने के बाद उनकी रोपाई करें।

गन्ना, आलू और केले के टुकड़ों, कंदों व जड़ों के गुच्छों को उपचारित करने के लिए 3 पैकेट कल्चर को 40-45 लीटर पानी में डाल कर घोल बनाएं और इस घोल में टुकड़ों, कंदों व जड़ों को उपचारित कर के इनकी तुरंत ही बुवाई कर देनी चाहिए।

एजेटोबैक्टर से प्राप्त होने वाले लाभ

  • एजेटोबैक्टर कल्चर से उपचारित बीजों, कंदों व टुकड़ों वगैरह का अंकुरण जल्दी होता है।
  • इस से मिट्टी उपचार करने से उस की भौतिक, रासायनिक व जैविक स्थिति में सुधार होता है और उर्वरा ताकत बढ़ती है।
  • इस के इस्तेमाल से मक्का में प्रोटीन, आलू में स्टार्च और चुकंदर में शर्करा की मात्रा में इजाफा होता है। सूरजमुखी को उपचारित करने से बीजों में तेल की मात्रा बढ़ती है।
  • एजेटोबैक्टर कल्चर से हर साल औसतन 25-30 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर इकट्ठा हो जाती है।

अपेक्षित सावधानियां

एजेटोबैक्टर के इस्तेमाल में कुछ सावधानियां भी बरतने की आवश्यकता होती है-

  • पारे वाले केमिकलों से बीज उपचारित करने पर इस के कल्चर की मात्रा दोगुनी कर देनी चाहिए।
  • आमतौर पर एक एकड़ के लिए कल्चर का एक पैकेट 10 किलोग्राम बीज उपचारित करने के लिए पर्याप्त होता है। अगर बीज अधिक मात्रा मात्रा में बोना हो तो कल्चर की मात्रा भी उसी के अनुरूप बढ़ा देनी चाहिए।
  • कल्चर अधिक पुराना नहीं होना चाहिए और कल्चर को रासायनिक उर्वरकों, कीट व फफूंदी नाशकों के साथ नहीं मिलाना चाहिए।
  • दलहनी फसलों में जैव उर्वरकों का प्रचलन काफी हो चुका है। जरूरत इस बात की है कि गैर दलहनी फसलों में एजेटोबैक्टर का इस्तेमाल प्रमुखता के साथ किया जाए और देश का कृषि उत्पादन बढ़ाया जाए।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।