
गन्ने में फंफूदी के चलते होने वाले रोग Publish Date : 05/09/2026
गन्ने में फंफूदी के चलते होने वाले रोग
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
गन्ना बोने के बाद 15-20 दिन में गन्ना बीज के कटे हुए भाग से फफूंदी प्रवेश कर जाती है। रोगी गन्ने पहले लाल व बाद में भूरे लाल-काले हो जाते हैं। बाद में गन्ना बीज के टुकड़े सड़ने लगते हैं और सड़े हुए प्रभावित भाग से अनन्नास जैसी गंध आने लगती हैं। रोगी गन्ने में एथीलीन गैस बनती है जिसका जड़ों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और बीमार गन्ने का विकास रुक जाता है तथा गन्ना छोटा रह जाता है। यह रोग एक विशेष प्रकार की फफूंदी श्सेरेटासिस्टिस पैराडाक्सा द्वारा जनित होती है। इस फफूंद में दो प्रकार के छोटे और बड़े बीजाणु बनते हैं। फफूंदी मिट्टी में पड़े गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़ों या मिट्टी में ही मौजूद रहती है जो सिंचाई के पानी द्वारा नई जगहों तक पहुंच जाती है।
क्षतिग्रस्त गन्ने में यह बीमारी शीघ्र प्रवेश कर जाती है। गन्ना बेधक कीटों का इस बीमारी को फैलाने में प्रमुख स्थान है। मक्खियां व श्रृंगकीट भी इस बीमारी को फैलाने में मदद करते हैं। इस रोग के नियंत्रण हेतु गन्ने के लंबे टुकड़े बोने चाहिए, लंबे टुकड़े बोने से रोग कारक आसानी से पूरे बीज को प्रभावित नहीं कर पाता। चार या पांच आंख के टुकड़े बोने से फसल को इस रोग से बचाया जा सकता है। कवकनाशी रसायन, डिमोसान का उपयोग इस रोग के नियंत्रण में काफी सार्थक सिद्ध हुआ है। डिमोसान (0.1 प्रतिशत घोल) में बीज गन्ने को 15 मि. डुबोकर बोने से फफूंदी का प्रकोप समाप्त हो जाता है और जमाव अधिक होता है।
परीक्षणों से पता चला है कि बीज गन्ने को 30 मिनट साधारण पानी में भिगोने के बाद 20 मिनट बेनोमिल रसायन में 52°से. पर उपचारित करने पर रोग कारक पूर्णतया नष्ट हो जाता है। रोग रोधी प्रजातियों के बोने से भी इस रोग को कम किया जा सकता है। पानी निकासी का समुचित प्रबन्ध होने से यह बीमारी कम लगती है।
गन्ने का पीली पत्ती विषाणु रोग
काया इस बीमारी को सर्वप्रथम 1988 में श्हवाई देश तथा फिर 1990 में ब्राजील में देखा गया था। तदुपरान्त विश्व के कई अन्य देशों में भी इस रोग के लक्षण पाये गये हैं। भारत व मारीशस आदि देशों में इस रोग को 2000-2001 में पहचाना गया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में अनेक प्रजातियों में यह रोग पाया गया है। पत्तियों की मुख्य मध्य शिरा पीली पड़ जाती है। पत्तियों के अंतिम छोर से पीलापन प्रारंभ होता है और अन्ततः नीचे तक फैल जाता है। इसके साथ-साथ पत्तियां ऊपर से सूखने लगती हैं। भीषण लक्षण उत्पन्न होने पर पीलापन पूरी पत्तियों में फैल जाता है और पत्तियां सूख जाती हैं।
अक्तूबर-नवंबर से पौधों में पीलेपन के लक्षण दिखाई देना प्रारंभ होते हैं। यह रोग एक विशेष प्रकार के विषाणु द्वारा जनित होता है और रोग का फैलाव माहूया एफिड कीट (मेलनाफिस सेकराई, मेलनाफिस इन्डोसैकराई रोपैलासइिफम मेडिस) द्वारा होता है। बीमार पत्तियों के रगड़ से या उनके रस से यह रोग स्वस्थ पौधों में नहीं फैलता है। इस रोग के नियंत्रण के लिए बीज का चयन स्वस्थ फसल से करना चाहिए। कीटनाशक रसायन छिड़कने से रोगवाहक एफिड नष्ट हो जाते हैं और फसल में रोग का फैलाव कम हो जाता है।
पत्तियों के धब्बे रोग
गन्ने की पत्तियों पर अनेक फफूंदियों से विभिन्न प्रकार के धब्बे रोग उत्पन्न होते हैं। सरकोस्पोरा के पीले धब्बे, आंखनुमा धब्बे, अंगूठीनुमा धब्बे, किट्ट रोग, पट्टीदार स्कलोरिसियल रोग आदि ये बीमारियां उपज में, हानि के दृष्टिकोण से अधिक महत्व की नहीं है। परंतु कभी-कभी ये रोग अनुकूल वातावरण वाले विभिन्न स्थानों/राज्यों में महामारी का रूप लेते हैं और तब अधिक हानि होती है। इन रोगजनक कवकों के भिन्न-भिन्न तरह के असंख्य बीजाणु बनते हैं जो हवा या पानी द्वारा फैलकर दूसरे स्वस्थ पौधों की पत्तियों को रोगी कर देते हैं। इन बीमारियों से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और सूखने लगती हैं। पत्तियों में हरितपर्ण (क्लोरोफिल) कम हो जाता है जिससे गन्ने कमजोर हो जाते हैं और चीनी की मात्रा कम हो जाती है।
इन रोगों का नियंत्रण फफूंदीनाशक रसायनों के छिड़काव से बहुत हद तक संभव है। इन रसायनों में कॉपर आक्सीक्लोराइड, डाईथेन एम-45, डाइथेन जैड-78, फरबाम, मैनकोजेव आदि काफी प्रभावी सिद्ध हुये हैं। रोगों के लगने पर कवकनाशी दवाओं का छिड़काव कम से कम दो बार जरूर करना चाहिए। गन्ने की फसल के सभी मुख्य रोगों एवं इनके नियंत्रण के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ये अधिकांश रोग बीज द्वारा जनित होते हैं और फैलाव हवा, वर्षा एवं सिंचाई जल, खरपतवार, कीट एवं कृषि यंत्रों द्वारा होता है। इसलिए इन रोगों के प्रभावी नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत उपचार विधियों की अपेक्षा समेकित प्रबंधन से अधिक लाभ होता है। समेकित प्रबंधन से एक साथ कई रोगों का नियंत्रण किया जा सकता है और गन्ने की उपज एवं चीनी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
