
कपास की फसल के लिए पोषण प्रबंधन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण Publish Date : 27/07/2026
कपास की फसल के लिए पोषण प्रबंधन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
कपास, जिसे ‘सफेद सोना‘ भी कहा जाता है, भारतीय कृषि व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह न केवल कपड़ा उद्योग की रीढ़ है बल्कि लाखों किसानों की आजीविका का एक प्रमुख स्रोत भी है। भारत विश्व के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है, और इसकी फसल देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, और मध्य प्रदेश आदि। कपास की खेती का हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास और निर्यात व्यापार में भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।
कपास की अधिक पैदावार लेने के लिए उन्नत किस्मो को सही समय पर बोने, उपयुक्त खाद देने एवं समय पर पौध सरंक्षण से सम्बन्धित उपायों को अपनाने की ओर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।
कपास में खाद का प्रयोग

कपास पर नाइट्रोजन वाली खादों का अच्छा प्रभाव होता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में फास्फोरस की खाद के नतीजे भी अच्छे प्रभावी पाए गए हैं। अब तक किए गए प्रयोगों के आधार पर कहा जा सकता है कि कपास की अच्छी पैदावार के लिए कपास में खाद का प्रयोग नीचे दी गई सारणी के अनुसार निम्नलिखित मात्रा करना उचित माना गया हैः
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किस्में |
पोषक तत्त्व (किलोग्राम/एकड़) |
उर्वरक (किलोग्राम/एकड) |
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नाइट्रोजन |
फास्फोरस |
पोटाश |
यूरिया (46%) |
सिंगल सुपर फास्फेट (16%) |
म्यूरेट ऑफ पोटाश (60%) |
जिंक सल्फेट (21%) |
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अमेरिकन कपास |
35 |
12 |
- |
75 |
75 |
- |
10 |
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संकर कपास व बी.टी. कपास |
70 |
24 |
24 |
150 |
150 |
40 |
10 |
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देसी कपास |
20 |
- |
- |
45 |
- |
- |
10 |
बेहतर होगा कि पूरा फास्फोरस व जिंक सल्फेट को बुवाई के समय ही प्रयोग किया जाना चाहिए। अगर यह उस समय नहीं दिया जाता है तो डोडी बनते समय नाली द्वारा भी दिया जा सकता है। नाइट्रोजन वाली खाद की आधी मात्रा बौकी आने (जुलाई के अन्त तक) के समय तथा आधी फूल आने के समय दी जा सकती है। यदि कपास, गेहूं के बाद बोई जा रही है या फिर भूमि कम उपजाऊ है तो नाइट्रोजन वाली खाद की पहली आधी मात्रा पौधों को विरला करते समय देने की बजाय कपास की बुवाई के समय पर ही देना अच्छा माना जाता है। यूरिया खाद को एकसार बिखेरने के लिए हस्तचालित खाद बिखेरने वाली मशीन का प्रयोग किया जा सकता हैं। संकर व बी. टी. किस्मों के लिए नत्रजन खाद तीन बराबर हिस्सों में बांट कर तीन बार में दी जानी चाहिए। जिनमें से - पहली बुवाई के समय, बौकी आने पर तथा फूल आने पर देना उत्तम है।
बी.टी. कपास की अधिक पैदावार लेने के लिए 80 कि.ग्रा. जिप्सम (12 कि.ग्रा. गंधक) प्रति एकड़ की दर से बुवाई करने से पहले की जुताई के समय दिया जाना चाहिए।
बायोविटा का प्रयोगः आठ कि.ग्रा. बायोविटा दानेदार का छिड़काव बुवाई करते समय पर, 200 मि.ली. बायोविटा तरल का बौकी आने पर छिड़काव, 250 मिली. बायोविटा का छिड़काव फूल आने पर, 300 मि.ली. बायोविटा का छिड़काव टिण्डे बनने पर तथा 300 मि.ली. बायोविटा का छिड़काव टिण्डों के विकास पर प्रति एकड़ की दर से 60 लीटर पानी में मिलाकर करना लाभप्रद माना गया है।
यूरिया का पर्णीय छिड़कावः उपर्युक्त नाइट्रोजन की मात्रा में से 8 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ का यूरिया के रूप में छिड़काव करना लाभदायक पाया गया है। इसमें कीटनाशक दवाइयों को भी मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं और फसल में फूल व टिण्डे लगते समय छिड़काव करने सक अच्छा लाभ प्राप्त होता है। हाथ से चलने वाले पम्प में 2.5 प्रतिशत यूरिया का घोल होना चाहिए जबकि मशीनी पम्प में 8-10 प्रतिशत घोल बनाया जा सकता है।
पोटेशियम नाइट्रेट का छिड़कावः फसल में फूल आने पर एवं टिण्डे बनने के समय एक प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट (2 किलोग्राम पोटाशियम नाइट्रेट व 200 लीटर पानी) का पत्तों पर छिड़काव प्रति एकड़ की दर से करने पर कपास की उत्पादकता तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है।
कपास में निराई तथा गुड़ाई

- खरपतवार के नियंत्रण के लिए दो-तीन निराई तथा गुड़ाई करना आवश्यक माना जाता है अप्यथा की स्थिति में खरपतवार नाशकों का प्रयोग भी किया जा सकता र्है। पहली गुड़ाई कसोला से, पहली सिंचाई से पहले कररनी चाहिए। इसके बाद में हर सिंचाई या वर्षा के बाद समायोज्य कल्टीवेटर से निराई तथा गुड़ाई करते रहें।
- वैसे तो खरपतवार नियन्त्रण के लिए साधारण निराई-गुड़ाई को ही सबसे अच्छा माना जाता है या फिर खरपतवारनाशकों का प्रयोग भी कर सकते हैं। उगने से पहले स्टोम्प 30 (पैण्डीमिथालीन) का प्रयोग 2.0 लीटर प्रति एकड़ की दर से करने पर सांठी व सांवक किस्म के खरपतवारों पर नियन्त्रण पूरी तरह से हो जाता है।
- पौधों के निकालने के बाद एक सूखी गोड़ी के साथ प्रति एकड़ ड्यूरान 200 ग्राम या गैमक्सीन 600 मि.ली. का प्रयोग करना चाहिए।
- बुवाई से पहले बासालीन 800 मि.ली. का प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इसे ऊपरी मिट्टी में मिला दें। इसके बाद ही बुवाई की जानी चाहिए। इन दोनों खरपतवारनाशकों का प्रयोग उस सूरत में करना चाहिए जब मजदूरों की कमी हो, वे महंगे हों अथवा जब जमीन गीली बनी रहे, जब इसे निरन्तर या कभी-कभी होने वाली वर्षा के कारण तैयार न किया जा सके या जहां सांठी नामक खरपतवार की समस्या अधिक हो।
- कपास की बुवाई करने के 40-45 दिनों के बाद सूखी गुड़ाई करने के पश्चात् स्टोम्प 1.25 लीटर/एकड़ की दर से 200-250 लीटर पानी में घोल से उपचार के पश्चात् सिंचाई करने से भी वार्षिक खरपतवारों का उचित नियन्त्रण हो जाता है।
कपास में हार्मोंस का प्रयोगः
(क) नेप्थलीन एसिटिक एसिड (एन.ए.ए.): एन. ए. ए. का दो बार छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव 50 सी.सी. प्रति एकड़ की दर से कपास पर फूल आने के समय (अगस्त का दूसरा व तीसरा सप्ताह) व दूसरा छिड़काव 70 सी.सी. की दर से पहला छिड़काव करने के लगभग 20 दिन बाद करना चाहिए। छिड़काव में खारे पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह फूलों को सड़ने तथा टिण्डों को गिरने से रोकेगा। इससे टिण्डे अच्छे लगते हैं।
(ख) साइकोसिल का छिड़काव: जहां अमेरिकन कपास के अधिक बढ़ने की सम्भावना हो वहां 32 मि.ली. साइकोसिल (50 प्रतिशत) का 320 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ की दर से फसल में बौकी आने के समय छिड़काव करना लाभप्रद पाया गया है। इस घोल में कीटनाशक रसायन अथवा यूरिया आदि को भी मिलाया जा सकता है।
(ग) एन.ए.ए. एवं कोबाल्ट क्लोराइड का प्रयोगः बीटी कपास का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए बौकी बनने की अवस्था, अधिकतम फूल बनने की अवस्था एवं टिण्डे बनने की अवस्था पर सिंचाई या बारिश से पूर्व या इसके बाद (12 घंटे के भीतर) में एन.ए.ए. की 25 मि.ली. और कोबाल्ट क्लोराइड की 1 ग्राम मात्रा को 100 लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।
निष्कर्षः
कपास की फसल में संतुलित और वैज्ञानिक विधि से पोषक तत्वों का प्रबन्धन करना कपास की उच्च गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। मृदा परीक्षण के आधापर उर्वरकों का उपयोग, उचित समय पर जैविक एवं रासायनिक पोषक तत्वों का समुचित समावेश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति करने से न केवल उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है, बल्कि यह मृदा के स्वास्थ्य को भी अच्छा बनाए रखने में सहायक होते हैं।
इसके अतिरिक्त एकीकृत पोषण प्रबन्धन प्रक्रिया को अपनाकर दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को भी प्राप्त किया जा सकता है। अतः किसनों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुसारी ही पोषण प्रबन्धन की रणनीतियाँ बनायी जानी चाहिए जिससे कि कपास की फसल से अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
