गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 24/06/2026

      गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

                  गन्ने का पीली पत्ती विषाणु रोग-9

इस बीमारी को सर्वप्रथम 1988 में ‘हवाई’देश तथा फिर 1990 में ब्राजील में देखा गया था। तदुपरान्त विश्व के कई अन्य देशों में भी इस रोग के लक्षण पाये गये हैं। भारत व मारीशस आदि देशों में इस रोग को 2000-2001 में पहचाना गया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में अनेक प्रजातियों में यह रोग पाया गया है। पत्तियों की मुख्य मध्य शिरा पीली पड़ जाती है। पत्तियों के अंतिम छोर से पीलापन प्रारंभ होता है और अन्ततः नीचे तक फैल जाता है। इसके साथ-साथ पत्तियां ऊपर से सूखने लगती हैं। भीषण लक्षण उत्पन्न होने पर पीलापन पूरी पत्तियों में फैल जाता है और पत्तियां सूख जाती हैं। अक्तूबर-नवंबर से पौधों में पीलेपन के लक्षण दिखाई देना प्रारंभ होते हैं। यह रोग एक विशेष प्रकार के विषाणु द्वारा जनित होता है और रोग का फैलाव माहू या एफिड कीट (मेलनाफिस सेकराई, मेलनाफिस इन्डोसैकराई रोपैलासइिफम मेडिस) द्वारा होता है। बीमार पत्तियों के रगड़ से या उनके रस से यह रोग स्वस्थ पौधों में नहीं फैलता है। इस रोग के नियंत्रण के लिए बीज का चयन स्वस्थ फसल से करना चाहिए। कीटनाशक रसायन छिड़कने से रोगवाहक एफिड नष्ट हो जाते हैं और फसल में रोग का फैलाव कम हो जाता है।

पत्तियों के धब्बे रोग

                                    

गन्ने की पत्तियों पर अनेक फफूंदियों से विभिन्न प्रकार के धब्बे रोग उत्पन्न होते हैं। सरकोस्पोरा के पीले धब्बे, आंखनुमा धब्बे, अंगूठीनुमा धब्बे, किट्ट रोग, पट्टीदार स्कलोरिसियल रोग आदि ये बीमारियां उपज में, हानि के दृष्टिकोण से अधिक महत्व की नहीं है। परंतु कभी-कभी ये रोग अनुकूल वातावरण वाले विभिन्न स्थानों/राज्यों में महामारी का रूप लेते हैं और तब अधिक हानि होती है। इन रोगजनक कवकों के भिन्न-भिन्न तरह के असंख्य बीजाणु बनते हैं जो हवा या पानी द्वारा फैलकर दूसरे स्वस्थ पौधों की पत्तियों को रोगी कर देते हैं। इन बीमारियों से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और सूखने लगती हैं। पत्तियों में हरितपर्ण (क्लोरोफिल) कम हो जाता है जिससे गन्ने कमजोर हो जाते हैं और चीनी की मात्रा कम हो जाती है।

                                   

इन रोगों का नियंत्रण फफूंदीनाशक रसायनों के छिड़काव से बहुत हद तक संभव है। इन रसायनों में कॉपर आक्सीक्लोराइड, डाईथेन एम-45, डाइथेन जैड-78, फरबाम, मैनकोजेव आदि काफी प्रभावी सिद्ध हुये हैं। रोगों के लगने पर कवकनाशी दवाओं का छिड़काव कम से कम दो बार जरूर करना चाहिए। वर्तमान अध्याय में गन्ने की फसल के सभी मुख्य रोगों एवं इनके नियंत्रण के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ये अधिकांश रोग बीज द्वारा जनित होते हैं और फैलाव हवा, वर्षा एवं सिंचाई जल, खरपतवार, कीट एवं कृषि यंत्रों द्वारा होता है। इसलिए इन रोगों के प्रभावी नियंत्रण के लिए व्यक्तिगत उपचार विधियों की अपेक्षा समेकित प्रबंधन से अधिक लाभ होता है। समेकित प्रबंधन से एक साथ कई रोगों का नियंत्रण किया जा सकता है और गन्ने की उपज एवं चीनी की मात्रा बढ़ायी जा सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।