गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 20/06/2026

       गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

                          पोरी विगलन रोग - 8

यह रोग भी एक कवक रोग है। इस रोग की सर्वप्रथम जानकारी वेन्ट नामक वैज्ञानिक ने वर्ष 1893 में इंडोनेशिया में दी थी। चूंकि रोगी गन्ने से अनन्नास जैसी गंध निकलती है इसलिए इस बीमारी को गन्ने का अनन्नास रोग भी कहा जाता है। विश्व के लगभग 39 देशों में श्यह रोग पाया जाता है। भारत में पंजाब, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र में यह रोग अधिक पाया जाता है। इधर कुछ समय से यह बीमारी उत्तर भारत में कही कहीं देखी गयी है। इस बीमारी के कारण गन्ना बीज का जमाव कम होता है और लगभग 40 प्रतिशत आंखें अंकुरण के पूर्व या बाद में सड़ जाती हैं। जमाव में कमी आने के अलावा खड़ी फसल में इस बीमारी से चीनी की मात्रा में 7 से 13 प्रतिशत तक कमी हो जाती है तथा बीमार गन्ने से चीनी के दाने भी ठीक से नहीं बनते हैं।

                                           

गन्ना बोने के बाद 15-20 दिन में गन्ना बीज के कटे हुए भाग से फफूंदी प्रवेश कर जाती है। रोगी गन्ने पहले लाल व बाद में भूरे लाल-काले हो जाते हैं। बाद में गन्ना बीज के टुकड़े सड़ने लगते हैं और सड़े हुए प्रभावित भाग से अनन्नास जैसी गंध आने लगती हैं। रोगी गन्ने में ‘एथीलीन’गैस बनती है जिसका जड़ों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और बीमार गन्ने का विकास रुक जाता है तथा गन्ना छोटा रह जाता है।

यह रोग एक विशेष प्रकार की फफूंदी ‘सेरेटासिस्टिस पैराडाक्सा’द्वारा जनित होती है। इस फफूंद में दो प्रकार के छोटे और बड़े बीजाणु बनते हैं। फफूंदी मिट्टी में पड़े गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़ों या मिट्टी में ही मौजूद रहती है जो सिंचाई के पानी द्वारा नई जगहों तक पहुंच जाती है। क्षतिग्रस्त गन्ने में यह बीमारी शीघ्र प्रवेश कर जाती है। गन्ना बेधक कीटों का इस बीमारी को फैलाने में प्रमुख स्थान है। मक्खियां व श्रृंगकीट भी इस बीमारी को फैलाने में मदद करते हैं। इस रोग के नियंत्रण हेतु गन्ने के लंबे टुकड़े बोने चाहिए, लंबे टुकड़े बोने से रोग कारक आसानी से पूरे बीज को प्रभावित नहीं कर पाता। चार या पांच आंख के टुकड़े बोने से फसल को इस रोग से बचाया जा सकता है।

कवकनाशी रसायन, डिमोसान का उपयोग इस रोग के नियंत्रण में काफी सार्थक सिद्ध हुआ है। डिमोसान (0.1 प्रतिशत घोल) में बीज गन्ने को 15 मि. डुबोकर बोने से फफूंदी का प्रकोप समाप्त हो जाता है और जमाव अधिक होता है। परीक्षणों से पता चला है कि बीज गन्ने को 30 मिनट साधारण पानी में भिगोने के बाद 20 मिनट बेनोमिल रसायन में 52°से. पर उपचारित करने पर रोग कारक पूर्णतया नष्ट हो जाता है। रोगरोधी प्रजातियों के बोने से भी इस रोग को कम किया जा सकता है। पानी निकासी का समुचित प्रबन्ध होने से यह बीमारी कम लगती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।