
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन Publish Date : 19/06/2026
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
मोजैक - 7
विषाणु जनित इस रोग की पहचान में सर्व इयरले नामक वैज्ञानिक ने वर्ष, 1918 में की थी यद्यपि इन्डोनेशिया में इस बीमारी के लक्षण वर्ष 1893 में ही देख लिए गए थे। मोजैक गन्ने की पत्तियों पर लगने वाला रोग है। प्रकोप के दृष्टिकोण से यह रोग प्रथम स्थान पर है जोकि समस्त गन्ना उत्पादक देशों में पाया जाता है। कई देशों (क्यूबा, ब्राजील, पोर्टारिको व ल्यूसियाना) में वर्ष 1916 से 1925 के बीच मोजैक महामारी के रूप में उभरा था। यद्यपि वर्तमान समय में मोजैक अवरोधी प्रजातियों के उपलब्ध होने के कारण इस रोग को कम महत्व दिया जाता है। भारत वर्ष में सन् 1921 में इस बीमारी को दक्षिणी भारत में डा. बारबर ने देखा था। वहां पर जून-अगस्त तक इस रोग की व्यापकता अधिक होती है। अब यह रोग भारत गन्ना उगाने वाले सभी प्रदेशों में पाया जाता है।
लक्षण

इस रोग के लक्षण गन्ने की नई पत्तियों पर आसानी से दिखाई देते हैं। सूर्य की रोशनी के विरुद्ध पत्तियां देखने से लक्षण स्पष्ट दिखते हैं। प्रायः रोगी पत्तियों पर हजारों की संख्या में हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं जो शुरूआत में गोल, अण्डाकार होते हैं बाद में लंबाई में बढ़ जाते हैं तथा पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। लंबी, पतली शिराओं के बीच बने ये धब्बे हल्की पीली पट्टी जैसे दिखते हैं। पत्ती की हरीतिमा (क्लोरोफिल) घट जाने से पौधा पीला दिखाई पड़ता है। रोग- सुग्राही जातियों जैसे को.-740, को.-1148, को.ल.-8102 को.शा.-767 में लक्षण दूर से भी स्पष्ट दिखते हैं। लक्षण की भीषणता, तापमान और वातावरण पर भी निर्भर करती हैं। साधारणतः गन्ने की पोरियों पर लक्षण स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ते, परंतु को.ल.-511 में पीली, लंबी धारियां पोरियों के ऊपर बनती हैं और पोरियों के ऊतक सूख जाते हैं। बीमार पौधे, छोटे तथा गन्ने पतले हो जाते हैं। यह प्रभाव जाति विशेष की रोग-रोधिता पर निर्भर करता है। सहनशील प्रजातियों में मोजैक का प्रभाव कम होता है।
आर्थिक महत्व
इस रोग का सीधा प्रभाव गन्ने की उपज में पड़ता है। उपज में हानि, गन्ने की प्रजाति, आयु तथा संक्रमण के लिए अनुकूल वातावरण पर निर्भर करती है। उष्ण कटिबंधीय जलवायु में यह रोग अधिक हानि करता है। विभिन्न प्रजातियों में मोजैक रोग से 3-35 प्रतिशत उपज में कमी आंकी गयी है। बावक फसल की अपेक्षा पेड़ी में क्षति अधिक होती है।
विषाणु के उग्र प्रभेदों के संक्रमण से उपज में गिरावट अपेक्षाकृत अधिक होती है। कम उग्र प्रभेद से उपज में औसतन 8-15 प्रतिशत तथा अधिक उग्र प्रभेद से 30-40 प्रतिशत की कमी आ जाती है। जड़ गलन और पेड़ी कुंठन रोगों के साथ मिलकर मोजैक रोग अत्यधिक हानिकारक हो जाता है। रोगी गन्ने में रस की मात्रा लगभग 10 प्रतिशत घट जाती है और रस में शर्करा की मात्रा भी 0.1-1.4 प्रतिशत घट जाती है।
रोगकारक एवं फैलाव
यह एक लंबे धागे जैसा दिखने वाला, पोटी (विषाणु) होता है जिसकी लंबाई 650-750 एन.एम. और चौड़ाई 12-15 एन.एम. होती है। माहू (एफिड) कीट की अनेक किस्मों से रोगकारक स्वस्थ फसल में फैलता है। विश्व में विषाणु के 13 प्रभेद पाए जाते हैं। इन प्रभेदों में गन्ने और ज्वार की किस्मों पर अलग-अलग लक्षण उत्पन्न करने की क्षमता होती है। वरूल घास और जई पर इस विषाणु के लक्षण नहीं उत्पन्न होते हैं। प्रकृति में सामान्य प्रभेद, भीषण प्रभेद को फैलने से रोकता है क्योंकि वायरस के प्रभेदों का संयुक्त संक्रमण नहीं होता है।
मुख्यतः रोग कारक एफिड (माहू) कीट से फैलता है। बीमार पौधे के बाद स्वस्थ पौधे पर खाते हुए यह कीट 15-20 मिनट में उन्हें भी विषाणु से संक्रमित कर देते हैं। एफिड की 15 प्रजातियों इस रोग को फैलाने में सहायक हैं परंतु श्रोपैलोसाइफम मेडिसश् ‘श्लांग्यूगिस सेकराई’ तथा ‘स्टीरियोन्यूरा सिटेरी’ प्रमुख है।
एफिड की संख्या कम होने से बीमारी कम फैलती है। रोगी बीज से विषाणु फसल दर फसल फैलता व बढ़ता रहता है। रोगी पत्तियों के रस से भी विषाणु स्वस्थ पौधों की पत्तियों को संक्रमित कर देता है। इस विधि में स्वस्थ पौधों की पत्तियों में घाव होना नितान्त आवश्यक होता है। गन्ने की पत्तियों पर सिलिका, मोम और बालों की परत होती है जिससे बिना घाव किये पत्तियों को संक्रमित करना कठिन होता है।

गन्ने के अतिरिक्त 25 प्रकार के पौधों को मोजैक विषाणु प्रभावित करता है। इन पौधों में मक्का, ज्वार, बाजरा आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जंगली घासें जो पेनिकी, एंड्रोपोगोन, ट्रिप्सेसी आदि ग्रेमिनी कुल की हैं, इस रोग से प्रभावित होती हैं। परंतु गेहूं, राई, जौ और जई को मोजैक रोग ग्रसित नहीं करता है। परपोषी पौधों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से रोग नये स्थानों में पहुंच जाता है।
नियंत्रण एवं प्रबन्धन
1. रोग अवरोधी प्रजातियां को बोना चाहिए। श्सैकरम स्पान्टेनियम’ और श्से. बारबरी’ के कई क्लोन विषाणु अवरोधी पाए गए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया (जावा), क्यूबा, ब्राजील और आस्ट्रेलिया देशों में मोजैक प्रतिरोधी किस्मों के प्रजनन पर महत्वपूर्ण शोधकार्य हुए हैं तथा रोग अवरोधी किस्मों का प्रचलन बढ़ा है।
2. बीज गन्ना का चयन स्वस्थ एवं प्रमाणित फसल से करना चाहिए तथा शुरुआत में रोगी पौधों को खेत से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। रोगी पौधों को नष्ट करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में खरतपतवारनाशी रसायनों का भी उपयोग किया जाता है।
3. रोगवाहक एफिड कीट मारने के लिए कीटनाशक दवाइयां जैसे डाइमेक्रान, 0. 02 प्रतिशत घोल अथवा मेटासिस्टाक्स, 0.01 प्रतिशत घोल का छिड़काव रोग का फैलाव कम किया जा सकता है। कीटनाशक को 15-20 दिन के अंतराल पर छिड़कते रहने से विषाणु फैलते हैं।
4. बीज गन्ने के पेड़ों को गर्म पानी (52°से., 57.3°से.) में 20 मिनट तक क्रमशः तीन दिन तक उपचारित करने के बाद बोने से इस रोग की भीषणता को काफी कम किया जा सकता है। इस तरह के क्रमिक उपचार से लगभग 80 प्रतिशत पौधों में बीमारी उत्पन्न नहीं होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
