गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 18/06/2026

       गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

                         पर्णदाह (लीफ स्केल्ड)- 6

सर्वप्रथम यह बीमारी इन्डोनेशिया और आस्ट्रेलिया देशों में देखी गयी थी। तदुपरांत अन्य 30 देशों में इस बीमारी को देखा गया। आर्थिक दृष्टिकोण से फिजी, इन्डोनेशिया, ताईवान, ब्राजील, क्यूबा और संयुक्त राज्य अमेरिका में यह बीमारी अधिक महत्वपूर्ण है।

भारत में इस बीमारी को सर्वप्रथम वर्ष 1962 में देखा गया था तथा श्रीनिवासन और राव ने वर्ष 1968 में इस बीमारी का निदान ताप उपचार से दर्शाया था। प्रजाति को. 419 में यह बीमारी भीषण प्रकोप के रूप में पाई जाती है। कई अन्य प्रजातियां जैसे बी.ओ. 3, बी.ओ. 17, बी.ओ. 24, बी.ओ. 70, को. 975, को. 1148, को. 1158, को. 62399, को.शा. 659, को.लक. 8001 में भी इस बीमारी के उग्र लक्षण प्रगट होते हैं। रोग सुग्राहिता के अनुसार अनेक प्रजातियों में इस बीमारी के लक्षण कम या अधिक देखे गए हैं।

लक्षण

                               

पत्तियों की शिराओं के साथ लंबाई में सफेद धारियां बनती हैं। ये धारियां बाद में बढ़कर चौड़ी हो जाती हैं तथा ऊपर से नीचे की ओर सूख जाती हैं। धारियों का सूखना प्रायः पत्ती के बाहरी छोर से प्रारंभ होता है। गन्ने की पोरियां छोटी होती हैं और गांठों पर आंखों का अंकुरण बढ़ जाता है। अंकुरण के बाद निकली पत्तियों पर भी सफेद धारियां बनती हैं। धारियों के बढ़ने और बाद में सूखने से बीमार पौधे को दूर से पहचाना जा सकता है। गन्ने को फाड़ कर देखने से अंदर लाल रंग के संवहक ऊतक दिखाई पड़ते हैं। अंखुए निकले हुए गन्ने में यह लक्षण अधिक स्पष्ट दिखते है। बीमार पौधों में पुष्पक्रम नहीं बनता केवल पतली छोटी पत्तियों का एक समूह निकलता है। यदि सफेद धारियों के स्थान पर पत्तियों को काट कर देखा जाय तो शाकाणु धीरे-धीरे बाहर की तरफ आते हुये दिखाई देते हैं। उग्र अवस्था में रोगी पौधा सूख जाता है। कम उर्वरक, जल भराव व पोषक तत्वों की कमी से भी पर्णदाह के लक्षण स्पष्ट और शीघ्र दिखाई देते हैं।

आर्थिक महत्व

इस रोग का सीधा प्रभाव गन्ने की उपज पर पड़ता है। उपज में हानि रोग की अवस्थाओं पर निर्भर करती है। रोग की उग्र अवस्था में गन्ने का पूरा-पूरा थान सूख जाता है तब उपज में काफी हानि होती है। रोग के जीर्ण अवस्था में पौधे तो नहीं मरते परंतु गन्ने के आंखों के कम अंकुरण के कारण उपज में कमी आ जाती है तथा साथ-साथ चीनी की मात्रा भी घट जाती है।

रोगकारक एवं फैलाव

यह रोग एक विशेष प्रकार के शाकाणु ष्जैन्थोमोनास एल्वीलीनिथन्सष् द्वारा जनित होती है। यह एक ग्राम ($) शाकाणु है जो 0.2-0.3 मि.मी.×0.6-1.0 मि.मी. आकार का होता है। मीडियम पर उगाने से इसकी कालोनी छोटी, पीली, गोल तथा चिकनी होती है। इस रोग का प्रथम संक्रमण रोगी बीज गन्ने के बोने से होता है। शाकाणु गन्ने का ठूंठ सूखी पत्तियों और जमीन में बहुत कम समय (2 दिन) तक जीवित रह सकता है। इस रोग का प्रथम संक्रमण रोगी बीज गन्ने के बोने से होता है। द्वितीय संक्रमण कृषि यंत्रों से होता है। इसलिए पेड़ी में यह रोग अधिक फैलता है। वर्षा या बाढ़ का पानी भर जाने से भी शाकाणु तेजी से फैल जाते हैं।

नियंत्रण एवं प्रबंधन

                                

1.   यह रोग, बीमार बीज गन्ने के बोने से बढ़ता और फैलता है इसलिए प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रमाणित स्वस्थ बीज ही बोना चाहिए।

2.   ऊष्मोपचार जैसे नम - गर्म वायु भाप (54°से. पर 2.5 घंटे) यागर्मजलभाप (54°से. पर 2.5 घंटे) द्वारा उपचारित करने पर बहुत हद तक रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

3.   पानी निकासी का समुचित प्रबंध होना चाहिए तथा उर्वरकों और खादों का पूरा प्रयोग करना चाहिए।

4.   रोगी बीज गन्ने को एक स्थान से दूसरे स्थान को नहीं ले जाना चाहिए और इसके लिए संगरोध लागू कर देना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।