गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 17/06/2026

     गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                           प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

                            गन्ने के प्रमुख रोग – 5

पेड़ी का कुंठन (रैटून स्टंटिंग)

वर्ष 1950 में इस रोग को सर्वप्रथम ऑस्ट्रेलिया में देखा गया था। पेड़ी में इस रोग का प्रकोप बढ़ जाने से इसके लक्षण स्पष्ट दिखालायी पड़ते हैं। अतः इसे पेड़ी का बौना रोग कहा गया है। यद्यपि बावक फसल में भी यह बीमारी पायी जाती है। भारत में प्रथम बार उत्तर प्रदेश में को. 510 प्रजाति में इस बीमारी को देखा गया था। इसके पश्चात् इस रोग को को. 738 प्रजाति में देखा गया। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में इससे बहुत हानि होती है। कभी-कभी यह रोग दूसरी बीमारियों जैसे लाल सड़न, उकठा या मोजेक के साथ आता है तो फसल को अधिक हानि होती है।

लक्षण

                                

रोगी पौधों पर बाहरी लक्षण प्रकट नहीं होते इसलिए रोग को आसानी से नहीं पहचाना जा सकता है फिर भी रोगी गन्ने पतले व छोटे दिखलाई पड़ते हैं एवं पोरियां छोटी हो जाती है। रोग के मुख्य लक्षण गन्ने को लंबाई से फाड़ने पर गांठों पर दिखाई देते हैं। गांठों के संवहक ऊतकों का रंग गहरा लाल या गुलाबी दिखलाई पड़ता है। कई प्रजातियों में संवहक ऊतकों का रंग नारंगी भी हो जाता है। इस रोग से जड़तन्त्र का विकास कम होता है। सूचक पौधों पर इस बीमारी के लक्षण अधिक स्पष्ट दिखलाई पड़ते हैं। हाइड्रोजन पैरा-ऑक्साइड और हाइड्राक्लोरिक एसिड के मिश्रण को रोग ग्रस्त आंखों पर लगाने से उनका रंग नीला हो जाता है। रोगी पौधे की गांठों के ऊतकों पर 2-3-5 ट्राईनिल टेट्राक्लोराइड (0.5 प्रतिशत घोल) लगाने से गहरा लाल रंग उत्पन्न होता है।

आर्थिक महत्व

इस रोग से, बीज गन्ने का अंकुरण बहुत कम हो जाता है जिसके कारण फसल में रिक्त स्थान रह जाते हैं। इसका सीधा प्रभाव गन्ने की संख्या और उपज पर पड़ता है। गन्ने की उपज में 10-50 प्रतिशत तक कमी होती है।। इस रोग से गन्ने के रस पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता परंतु गन्ने छोटे एवं पतले होने के कारण प्रति इकाई चीनी की मात्रा कम हो जाती है। इस रोग का प्रकोप पेड़ी फसल में अधिक होता है इसलिए रोगी गन्ने की फसल से अधिक पेड़ियां नहीं ली जा सकती हैं।

रोगकारक एवं फैलाव

यह रोग “क्लैवीवैक्टर जाइलाई” नामक शाकाणु द्वारा उत्पन्न होता है। ऊतक पिसना विधि द्वारा रोगी गन्ने का रस निकाल कर या निगेटिव दबाव विधि द्वारा शाकाणुओं को इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है। यह रोग बीमार गन्ने के टुकड़े बोने से फैलता है। रोगी गन्ने को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने पर यह बीमारी नये स्थानों पर फैल जाती है। इस रोग का फैलाव कटाई यंत्रों, जैसे हंसिया, चाकू, खुरपा या गंडासे द्वारा भी होता है। इसके कारण, पेड़ी गन्ने में रोग का आपतन बढ़ जाता है। लगभग सभी प्रजातियों में यह रोग फैल चुका है। रोग के लक्षण बिना उत्पन्न किये भी गन्ने की फसल से रोग जनक शाकाणु प्राप्त होते हैं, जिससे रोग फसल दर फसल फैलता रहता है।

नियंत्रण एवं प्रबंधन

                                

1.   बुआई के लिए रोग रोधी प्रजातियों को अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

2.   ऊष्मोपचार इस रोग के नियंत्रण में काफी कारगर पाया गया है। नम-गर्म हवा में 54°से. पर 2.5 घंटे तक उपचारित करने से शाकाणु लगभग नष्ट हो जाते हैं। गर्म पानी द्वारा भी 50 °से. पर 2 घंटे उपचारित करने के बाद भी रोग के शाकाणु नष्ट हो जाते हैं। इसलिए ऊष्मोपचारित गन्ने के टुकड़ों का बुआई के लिए अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए।

3.   बीज गन्ना काटने वाले यंत्रों को बीच-बीच में आग में तपा लेना चाहिए या 0.1 प्रतिशत लाइसोल के घोल में डुबो लेना चाहिए। ऐसा करने से रोग के फैलाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।