गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 16/06/2026

       गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

                           गन्ने के प्रमुख रोग – 4

घासीय प्ररोह (ग्रासी शूट)

भारत में इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम वर्ष 1919 में देखे गये थे। ये लक्षण किल्लों की बहुतायत और पतली पत्तियों में हरीतिमा के हास रूप में दक्षिण भारत में दिखलाई दिये थे। वर्ष 1955 में इस रोग को घासीय प्ररोह का नाम दिया गया। यह रोग प्रायः एल्बिनों, लीफ टफ्ट तथा पत्तियों का पीत रोग आदि नामों से भी जाना जाता है। भारत के अतिरिक्त यह बीमारी दक्षिण एशियाई देशों जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल में पायी जाती है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र आदि अनेक राज्यों में गन्ने की विभिन्न प्रजातियों में इस रोग को देखा गया है। पुरानी कई प्रजातियां जैसे (को. 313, को. 356, को. 419, को. 740, को. 1081, को. 1149, को. 1191, को.शा. 321, को.शा. 515 बी.ओ. 10 एवं बी.ओ. 70) इस रोग से ग्रस्त होने के कारण ही किसानों के खेतों पर अधिक समय तक नहीं चल पाईं। नवीनत्म प्रजातियों में जैसे को.शा. 95255, को.शा. 96269 और को.ल. 8102 के प्रचलन में भी इस रोग से बाधा आई है क्योंकि इन प्रजातियों में घासीय प्ररोह रोग बहुत शीघ्रता से फैलता है। को.श. 96269 में लगभग 60-70 प्रतिशत बीमारी का प्रकोप देखा गया है।

रोग के लक्षण

बीमार पौधों में अनेक पतले किल्ले निकलते हैं और उनकी पत्तियां सफेद-पीलापन लिए हुए छोटी तथा पतली होती हैं। पीलेपन के कारण पौधे दूर से ही पहचाने जा सकते हैं। ग्रीष्म ऋतु में बीमार पौधों की पत्तियां सूख जाती हैं। रोगी पौधे में बीमारी की भीषणता के कारण मात्र 1 या 2 पतले और बौने गन्ने ही बन पाते हैं या कभी-कभी पूरे थान में एक भी गन्ना मिल में भेजने लायक नहीं बन पाता है। रोगी गन्ने में फूल नहीं आते तथा रोगी गन्ने की आंखे अंकुरित हो जाती हैं। इनसे निकले अंखुए सफेद-दूधिया रंग के होते हैं। इस रोग से बीमार पौधा घास की तरह दिखलाई पड़ता है। रोगी पौधों में जड़ें बहुत कम और छोटी रह जाती हैं।

जुलाई से अक्तूबर तक बीमारी के लक्षण खड़ी फसल में स्पष्टतः दिखलाई पड़ने लगते हैं। रोग-सुग्राही प्रजातियों में रोगी फसल से बीज लेने पर व बोने पर अगली फसल के सभी पौधे बीमार उत्पन्न होते हैं परंतु रोग सहनशील जातियों में बीमार फसल से बीज लेने पर भी अगली फसल में शत-प्रतिशत पौधों में रोग नहीं लगता।

आर्थिक महत्व

पेड़ी गन्ने में इस रोग से अधिक हानि होती है। इस रोग से औसतन 30-70 प्रतिशत पैदावार में गिरावट आंकी गई है। रोग सुग्राही जातियों की बावक फसल में घासीय-प्ररोह का प्रकोप 60-70 प्रतिशत तथा पेड़ी फसल में 70-80 प्रतिशत तक पाया गया है। को.शा.91269 और को.शा. 95255 की पेड़ी में यह रोग उग्र रूप में देखा गया है। औसतन 15-30 प्रतिशत आपतन अनेक किस्मों में पाया गया है। सिंचाई की सुविधा और रसायनिक उर्वरकों के प्रचुर उपयोग से रोग का फैलाव बढ़ जाता है। रोग सहनशील जातियों में घासीय-प्ररोह 5-10 प्रतिशत होता है। रोगी फसल से बीज लिया जाये तो हानि और बढ़ जाती है। इस रोग के द्वितीय संक्रमण से हानि तुलनात्मक रूप से कम होती है। संक्रमित गन्ने के रस में अशुद्धियां बढ़ जाती हैं और शुद्ध चीनी का परता 0.1-0.5 प्रतिशत घट जाता है। इस प्रकार मिल मालिकों को भी नुकसान उठाना पड़ता है।

रोगकारक एवं फैलाव

यह रोग श्फाइटोप्लाज्मा" नामक सूक्ष्म जीवाणु द्वारा जनित होता है। जीवाणु गोल और अंडाकार होते हैं। इन पर कोशाभित्ति नहीं होती तथा यह पेनीशिलिन से प्रभावित नहीं होते। परंतु टेट्रासाइक्लिन नामक दवा से नष्ट हो जाते हैं। प्रारंभिक समय में घासीय प्ररोह को विषाणु रोग माना जाता था क्योंकि यह किसी भी मीडिया में उगाया नहीं जा सका था। बाद में रोगी पत्तियों की फ्लोयम वाहिकाओं की चलनी नलिकाओं में इस रोग कारक को इलैक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी से देखा गया। खासकर बीमार कोशिकाओं की परिधि पर फाइटोप्लाज्मा की अधिकतम संख्या पाई जाती है। कोशिकाओं से बाहर ये रोगकारक प्रायः नष्ट हो जाते हैं क्योंकि परासरणी सान्द्रता अनुकूल न होने पर पतली परतें कोशाद्रव को घेरे नहीं रह पातीं।

बीमार फसल से बीज लेने के कारण यह रोग कई स्थानों तथा एक खेत से दूसरे खेत में फैल जाता है। द्वितीय संक्रमण, फुदका नामक कीट से फैलता है। यह कीट (डेल्टोसिफेलस वलगेरिस) दूब घास और गन्ने पर पूरे वर्ष पाया जाता है। मार्च-अप्रैल और अक्तूबर-नवंबर में फुदका कीटों की संख्या अधिक होती है। पौधों की पत्तियों का रस चूसते समय यह कीट रोग कारक को भी चूस लेते हैं जो बाद में फुदके के अंदर बढ़ता रहता है। रोग वाहक फुदके जब स्वस्थ पौधों की पत्तियों का रस चूसने जाते हैं तब रोगकारक को उस पौधे के अंदर छोड़ देते हैं जिनका ये रस चूसते हैं। फ्लोयम वाहनियों में पहुंच जाने पर यह रोग तेजी से बढ़ता है। एक लंबी अवधि (10-15 दिन) तक बीमार और स्वस्थ पौधों पर रस चूसने से फुदके के निम्फ (प्रौढ़ावस्था से पूर्व) बीमारी को सफलतापूर्वक फैलाने में सक्षम पाए गए हैं। श्फाइटोप्लाज्माश् एफिड कीट से नहीं फैलता, पत्तियों पर रगड़ने तथा मशीनों के उपयोग से भी यह रोग नहीं फैलता है, क्योंकि पौधे से बाहर निकलते ही रोग कारक (फाइटोप्लाज्मा) मर जाता है।

रोग नियंत्रण एवं प्रबंधन

बीज गन्ने का उष्मोपचार: बीज का ताप-शोधन करने से श्फाइटोप्लाज्माश् नष्ट हो जाता है और शत्-प्रतिशत इस रोग का नियंत्रण हो जाता है। अतः गन्ने को शोधित करके बोना चाहिए। इसके लिए बीज गन्ने को गर्म पानी (50°से. पर 2 घं) या गर्म-आर्द्र भाप (54°से.पर 2.5 घं.) से उपचारित करना चाहिए। गर्म-आर्द्र भाप शोधित बीज बोने पर पौधों की जड़ों का विकास अच्छा होता है और पत्तियों में हरीतिमा अधिक होती है।

रोगरोधी जातियों का बुआई के लिए उपयोग: रोगरोधी प्रजातियों को बोना चाहिए। कुछ प्रजातियों में सहनशीलता अधिक होती है और उनमें रोग-सुग्राही की अपेक्षा घासीय प्ररोह का आपतन कम होता है। ऐसी प्रजातियों के प्रचलन से इस रोग का प्रकोप कम होगा। बी.ओ.91 जाति में यह रोग नहीं दिखाई दिया है अतः इस जाति का रोग रोधी जातियां उत्पन्न करने में उपयोग किया जा सकता है।

फसल का निरीक्षण एवं श्रोगिंगश्रू बीज के लिए उगाई गई फसल में मार्च-अप्रैल और अक्तूबर-नवंबर में रोगी पौधे थान सहित उखाड़ कर नष्टकर देना चाहिए। इस प्रकार द्वितीय संक्रमण होने से फसल को बचाया जा सकता है।

कीटनाशक दवाओं का छिड़काव: मार्च-अप्रैल में फुदका नियंत्रण हेतु कीटनाशकों, डाइमेक्रान (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करने से रोग कम फैलता है।

जीव प्रतिरोधी रसायन (टेट्रासाइक्लीन 0.001 प्रतिशत) का छिड़काव करने से बीमार पौधे 5-6 महीने तक घासीय प्ररोह से बचे रहते हैं। रोगी गन्ने भी यदि 24 घंटे उक्त रसायन के घोल में भिगोकर बोए जायें तो फसल में बीमारी से बचाव होता है। चूंकि यह रसायन मंहगा होता है इसलिए सामान्यतः फसल में छिड़काव की संस्तुति नहीं की जाती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।