
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन Publish Date : 15/06/2026
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
गन्ने के प्रमुख रोग – 3
गन्ने का कंडुआ (स्मट) रोग
भारत में गन्ने का कंडुआ रोग सर्वप्रथम सन् 1906 में बिहार प्रदेश में एक महामारी के रूप में दिखलाई पड़ा था परंतु आजकल यह रोग लगभग प्रत्येक गन्ना उत्पादक प्रदेश में फैल गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों में इस रोग का प्रकोप कम होता है जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु तथा मध्य प्रदेश आदि राज्यों में इस का प्रकोप अधिक होता है। यह रोग अक्सर प्रचलित प्रजातियां जैसे को. 419, को. 740, को. 975, को. 1158, को. 419, को.शा. 510, को. लक. 7901 में उग्र रूप से फैलता है।
रोग के लक्षण

इस रोग के लक्षण गन्ना बोने के 2-3 महीने बाद दिखायी देने लगते हैं। सर्वप्रथम रोगग्रस्त गन्ने के शीर्ष भाग अगोले से एक पतली लंबी चाबुकनुमा काली कमची निकलती है, जिसकी लंबाई एक मीटर तक हो सकती है। कभी-कभी यह कमची छोटी भी रह जाती है। अनुकूल परिस्थतियों में जब रोग का प्रकोप अधिक होता है, एक थान के प्रत्येक गन्ने से ऐसी कमचियां निकल आती हैं और गन्ने की अंकुरित आंखों से भी ऐसी कमचियां निकल आती हैं। आरंभ में यह कमची एक सफेद पारदर्शक झिल्ली द्वारा ढकी होती है जिसके नीचे एक काली परत होती है। इसके अंदर करोड़ की संख्या में बीजाणु भरे होते हैं। इस झिल्ली के फटते ही ये बीजाणु हवा द्वारा वातावरण में बिखर जाते हैं।
प्रारंभ में संक्रमित पौधा स्वस्थ दिखायी पड़ता है परंतु कुछ समय पश्चात् यह स्वस्थ पौधों से अलग स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है। रोगग्रस्त पौधों की पत्तियां नुकीली एवं पतली हो जाती हैं तथा वे एक दूसरे से काफी दूरी पर निकलती हैं। कभी-कभी मुख्य लक्षण के अतिरिक्त कुछ अन्य लक्षण भी दिखालाई पड़ते हैं जैसे परिपक्व गन्ने की गांठों एवं पत्तियों पर फफोलेनुमा उभार का प्रकट होना, परंतु ऐसे लक्षण बहुत कम दिखाई देते हैं। इस रोग का जीवाणु फूल के नग्न अंगों को भी ग्रसित करता है और यदि ऐसे पुष्पक्रम द्वारा उपजित बीजों को बोया जाये तो अंखुओं में भी कंडुआ रोग का प्रकोप फैल जाता है।
उत्तर भारत में प्राथमिक संक्रमण (बीज से) उत्पन्न कमचियों से (1) मई-जून (ग्रीष्म ऋतु) में तथा द्वितीय संक्रमण (वायु से) (2) अक्तूबर-नवंबर (शरद ऋतु) में दिखायी पड़ता है। यदि फसल अप्रैल तक खड़ी रहे तो इस रोग का तीसरा एवं अंतिम संक्रमण (3) फरवरी-मार्च में दिखायी पड़ता है।
आर्थिक महत्व
इस रोग से गन्ने की फसल को काफी हानि होती है। इस रोग से किसानों एवं मिल मालिकों दोनों को ही नुकसान होता है, क्योंकि इस रोग से फसल की पैदावार के साथ-साथ चीनी परता भी घटता है। गन्ने की पैदावार में कमी के कारण रोगग्रस्त गन्ने के पौधे बौने तथा पतले रह जाने से उनका भार घट जाता है।
इस रोग से गन्ने की फसल को होने वाली हानि कई बातों पर निर्भर करती है जैसे, रोग संक्रमण की स्थिति प्राथमिक है या द्वितीय है। द्वितीय संक्रमण में हानि ज्यादा होती है तथा नियंत्रण भी कठिन हो जाता है। गन्ने की फसल बावक है या पेड़ी है। पेड़ी फसल में नुकसान अधिक होता है। गन्ने की विभिन्न प्रजातियों में रोग का प्रभाव कम या अधिक होता है। मौसम की स्थिति जैसे सूखे और तेज हवा चलने से बीजाणु वितरण तेज होता है और रोग का प्रकोप अधिक हो जाता है।
रोगकारक एवं फैलाव: यह रोग “अस्टीलागा सिटामिनी” नामक फफूंदी द्वारा जनित होता है। रोगग्रस्त गन्ना बोने के लगभग 3-5 महीने बाद पौधों में कमची निकलती है जिनमें असंख्य बीजाणु भरे होते हैं। इसे रोग का प्रथम संक्रमण कहते हैं।
इस प्रकार रोगी पौधों के बीजाणु हवा या पानी द्वारा फैलकर उसी खेत या दूसरे खेत के स्वस्थ पौधों की आंखों को रोगी कर देते हैं। रोगी गन्ने की आंखे अंकुरित हो जाती हैं और प्रत्येक अंकुर से एक कमची निकलती है, इसे द्वितीय संक्रमण कहते हैं। यदि संक्रमण फसल के अंतिम दिनों में होता है तो रोगजनक का कवकजाल सुषुप्तावस्था में पड़ा रहता है। ऐसे गन्ने की पेड़ी लेने पर रोगी पौधे निकलते हैं। रोगी गन्ने को जमीन की सतह से काटने पर इसकी पेड़ी से बहुतायत में छोटे-छोटे रोगी किल्ले निकलते हैं।
नियंत्रण एवं प्रबंधन

प्रजातियों का चयन: रोग के नियंत्रण का सबसे उत्तम उपाय रोगरोधी जातियों का प्रचलन है। प्रायः यह देखा गया है कि जिन गन्ने की किस्मों की आंखों में शल्क पत्तियां चिपकी होती हैं वे प्रायः रोगरोधी होती हैं। अतः किसानों में गन्ने की ऐसी ही जातियों का प्रचलन बढ़ाना चाहिए।
स्वस्थ बीज का उपयोग: बोने के लिये स्वस्थ गन्ने से ही बीज चुनना चाहिए। बीज के लिये गन्ने स्वस्थ एवं ऐसे खेत से लेने चाहिए जहां पर आस-पास की फसल में भी कंडुआ रोग न हो।
ऊष्मोपचार: रोगग्रस्त पौधों को गर्म पानी या नम गर्म वायु द्वारा उपचारित करने से गन्ने की आंख की शल्क पत्तियों में उपस्थित बीजाणु नष्ट हो जाते हैं। परंतु जब इस रोग का संक्रमण आंखों के ऊतकों में होता है तब इस विधि से नियंत्रण शत-प्रतिशत नहीं हो पाता है। रोगग्रस्त पौधों को नम-गर्म वायु शोधक यंत्र द्वारा (54°से. पर 2.5 घंटे) उपचारित करके बोने से रोग रहित फसल पैदा की जा सकती है।
सघन निरीक्षण एवं श्रोगिंगश्रू पूर्ण फसलकाल में गन्ने की फसल का सघन निरीक्षण करते रहना चाहिए और प्रारंभ से ही रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना या मिट्टी में दबा देना चाहिए। इससे रोग के फैलाव पर काफी नियंत्रण पाया जा सकता है।
फसल चक्र: एक ही खेत में कई बार गन्ने की फसल बोते रहने से रोगजनक का निवेश शीघ्रता से बढ़ता है। अतः संक्रमित खेतों में उचित फसल चक्र अपनाकर इस रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है। फसल चक्र में हरी खाद लेना श्रेयस्कर माना गया है क्योंकि ऐसी फसल लेने से मृदा में सूक्ष्मजीवियों की संख्या बढ़ जाती है जो रोगजनक के फैलाव को कम करते हैं। गन्ने की दो पंक्तियों के बीच अरहर की सहफसली खेती से भी कंडुआ रोग के संक्रमण में कमी आती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
