गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन      Publish Date : 14/06/2026

       गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन

                                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

गन्ने के प्रमुख रोग – 2

गन्ने का उकठा रोग (विल्ट)

                                            

भारत में सर्वप्रथम इस रोग का प्रकोप वर्ष 1945 में बिहार प्रदेश में देखा गया था। आजकल यह रोग लगभग सभी गन्ना उत्पादक प्रदेशों में पाया जाता है। यह रोग जब लाल सड़न या पोरी विगलन रोगों के साथ अथवा गन्ना बेधक या शल्क कीट के साथ लगता है तो महामारी का रूप धारण कर लेता है और कभी-कभी तो इस बीमारी के कारण खेत का पूरा-पूरा गन्ना सूख जाता है।

रोग के लक्षण

इस रोग के लक्षण सामान्यतः बावक और पेड़ी दोनों फसलों में वर्षा ऋतु में ही दिखाई पड़ते हैं। प्रारंभ में रोगी गन्नों की पत्तियों की मध्य शिरा पीली पड़कर सूखने लगती है और ऊपर की सारी पत्तियां सूखकर नीचे को झुक जाती हैं तथा फिर कुछ समय पश्चात् पूरा पौधा सूख जाता है। रोगी पौधों को लंबाई में फाड़ने पर अंदर का रंग कत्थई दिखायी पड़ता है जो बाद में गाढ़ा कत्थई हो जाता है तथा रोगग्रस्त पौधों की पोरियां लंबाई में खोखली हो जाती हैं एवं अंदर का गूदा सूख जाता है। संक्रमित पौधों की वृद्धि रुक जाती है, जड़ें सड़ जाती हैं एवं पौधों की संख्या और भार भी कम हो जाता है।

आर्थिक महत्व

रोगग्रस्त गन्ना बीज के रूप में उपयोग करने से अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे खेत में जगह-जगह रिक्त स्थान दिखलाई पड़ते हैं। जिसका सीधा प्रभाव गन्ने की उपज पर पड़ता है। इस रोग द्वारा सर्वाधिक हानि उस समय होती है जब इसका प्रकोप गन्ने की परिपक्व अवस्था में होता है। पेड़ी गन्ने में बावक गन्ने की अपेक्षा इस रोग की तीव्रता एवं आपतन अधिक होता है। इस रोग द्वारा फसल की उपज में करीब 65 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। गन्ने में चीनी की मात्रा एवं गुणवत्ता का भी ह्रास होता है। रोगग्रसित गन्नों में चीनी की मात्रा स्वस्थ गन्नों की अपेक्षा 15 से 25 प्रतिशत कम पायी गयी है। रोगग्रस्त गन्नों में स्वस्थ गन्नों की अपेक्षा ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है और इससे गुड़ की गुणवत्ता कम हो जाती है तथा उसकी भण्डारण क्षमता भी कम हो जाती है।

रोगकारक एवं फैलाव

यह रोग “श्सिफेलोस्पोरियस सेकराई” नामक फफूंदी द्वारा फैलता है एवं कुछ ऐसे भी मत हैं कि यह रोग “श्सिफेलोस्पोरियम सेकेराई” तथा ‘‘फ्यूजेरियम मानिलीफार्मी” फफूंदी द्वारा भी उत्पन्न होता है। वर्ष 1974 में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में हुए शोधों द्वारा ज्ञात हुआ कि इस रोग के कारक ‘‘फ्यूजेरियम मोनेलीफार्मी” के अतिरिक्त एक्रिमोनियम फरकेटम एवं “एक्रिमोनियम टेरीकोला” जातियों की फंफूदियां भी है। इस रोग का प्राथमिक संक्रमण रोगग्रस्त बीज द्वारा व द्वितीय संक्रमण मृदा, जल, और कृषि यंत्रों द्वारा होता है।

इस रोग की तीव्रता, गन्ने की खेती कई वर्षों तक निरंतर एक ही स्थान पर करने, मिट्टी में आर्द्रता की कमी तथा नाइट्रोजन की अधिकता आदि जाती है। बावक फसल की अपेक्षा पेड़ी ज्यादा प्रभावित होती है।

नियंत्रण एवं प्रबंधन

सस्य विधियां: रोगरहित एवं स्वस्थ गन्ना बीज, प्रमाणित पौधशाला से लेकर बोने से रोग का द्वितीय संक्रमण फैलने की संभावना नगण्य हो जाती है। रोगी बावक फसल की पेड़ी नहीं रखनी चाहिए। फसल कटने के उपरांत खरपतवारों को खेत में ही पलटकर नष्ट कर देने और गहरी जुताई करने से रोगजनकों का कुप्रभाव फसल पर कम हो जाता है। शरदकालीन गन्ने के साथ राई या धनिया की सह फसल लेने से भी इस रोग का प्रभाव काफी कम हो जाता है।

ऊष्मोपचार: यदि बीज गन्ना प्रमाणित पौधशाला से नहीं लिया गया है तो बुआई से पहले बीज गन्ने को नम-गर्म वायु (54°से. पर 2.5 घण्टे) या गर्मजल (50°से. पर 2 घण्टे) से उपचारित करके बोने से इस रोग के संक्रमण में कमी आती है।

रासायनिक उपचार: सादे या गर्म पानी में कवकनाशी दवायें जैसे थाईरम, बेनोमिल, बैवस्टीन के 0.20 प्रतिशत घोल से उपचारित करने से बीज गन्ने में उपस्थित कवक काफी सीमा तक नष्ट हो जाता है। इन फफूंदीनाशक दवाओं को गर्म पानी मिलाकर उपचार करने से प्रभाव अधिक होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।