
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन Publish Date : 12/06/2026
गन्ने की प्रमुख बीमारियां एवं प्रबंधन
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
“दोस्तों आज से हम गन्ने के प्रमुख रोग एवं प्रबन्धन की एक श्रंखला शुरू करने जा रहे हैं, जिसके अन्तर्गत हम गन्ने के विभिन्न रोग एवं उनके प्रबन्धन के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे। अतः आप समस्त बन्धुओं से अपील है कि अपनी गन्ने की फसल को रोगों से बचाने के लिए हमारी पोस्ट को नियमित रूप से पढ़ते हुए लाभ उठाएं। साथ ही यदि आपके कोई प्रश्न है तो आप हमारे कृषि विशेषज्ञ से बात कर उसका समाधान भी प्राप्त कर सकते हैं"।
धन्यवाद
गन्ने के प्रमुख रोग - 1
भारत में दूसरे देशों की अपेक्षा गन्ने की प्रति इकाई पैदावार बहुत कम है। पैदावार की कमी के कई कारण हैं। इन कारणों में गन्ने की फसल में लगने वाली बीमारियां मुख्य हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये बीमारियां रोगी बीज गन्ना द्वारा एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फैल जाती हैं। देश में बीज गन्ने को एक स्थान से दूसरे स्थान तक या एक से दूसरे प्रदेश में ले जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों के बीच संगरोध की उचित व्यवस्था भी नहीं है। इसलिए किसानों की नवीनतम् प्रजातियों की बढ़ती मांग के साथ-साथ बीमारियों को भी नये प्रक्षेत्रों में प्रवेश मिल जाता है।
संकर प्रजातियों के बढ़ते उपयोग, सिंचाई की पर्याप्त सुविधा व उर्वरकों के अधिक उपयोग और फसल दर फसल, रोगी बीज लेते रहने से गन्ने में बीमारियां बढ़ रही हैं। अच्छी उपज एवं प्रचुर मात्रा में चीनी पैदावार करने वाली अनेक प्रजातियां जैसे को. 213, को. 312, को. 360, को. 419, को. 453, को. 997, को. 1148, को. 1158, को.शा. 510, को. शा. 767, बी.ओ. 17, बी.ओ. 54, को.ज. 64, को.ज. 82 और को.क. 671 को इन रोगों के कारण अधिक समय तक उगाया नहीं जा सका और बोना बंद करना पड़ा।
पिछले दशक में किए गये एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में प्रतिवर्ष रोगों से गन्ने की औसत उपज में लगभग 19-20 प्रतिशत और चीनी के परते (शुगर रिकवरी) में लगभग 2-3 प्रतिशत की कमी आई है।
गन्ने में लगभग 60 प्रकार की बीमारियां लगती हैं, परंतु ये सारे रोग आर्थिक रूप से समान हानि नहीं पहुंचाते हैं। कुछ रोग अत्यधिक और कुछ कम हानि करते हैं। इसलिए सुविधा के लिए गन्ने की फसल में लगने वाले रोगों को आर्थिक नुकसान के आधार पर दो भागों में बांट सकते हैं। पहला बीजजनित या अधिक महत्वपूर्ण रोग- जैसे फंफूदी जनित लाल सड़न, उकठा, कंडुवा, फाइटोप्लामा जनित-घासीय प्ररोह और शाकाणु जनित पेड़ी कुंठन व पर्णदाह और विषाणु जनित मोजेक मुख्य हैं, दूसरा-कम महत्वपूर्ण रोग या अन्य जैसे पोरी विगलन रोग, पत्तियों में फंफूदी या शाकाणु जनित पत्तियों के धब्बे रोग, किट्ट रोग, जड़ गलन, निमेटोड आदि। इन बीमारियों से गन्ने की फसल को कम हानि होती है।
गन्ने की मुख्य बीमारियां ज्यादातर बीज जनित होती हैं और रोगग्रस्त बीज गन्ने द्वारा स्थानान्तरित होती रहती हैं। बीज जनित होने के कारण इन रोगों का सीधा प्रभाव अंकुरण पर पड़ता है, स्वस्थ किल्ले मर जाते हैं और जमाव कम हो जाता है। रोगी गन्ने सड़ कर सूख जाते हैं और खेत में गन्नों की संख्या कम हो जाती है। इसका सीधा प्रभाव गन्ने की उपज पर पड़ता है और किसान की आय में कमी आ जाती है। इन रोगों के लगने के कारण, गन्ने का रस सड़कर दूषित हो जाता है और चीनी की परता में कमी आ जाती है। इससे मिल मालिकों को आर्थिक रूप से हानि उठानी पड़ती है। पत्तियों के मोजेक या धब्बे आदि रोग लगने से पत्तियों में पर्णहरित (क्लोरोफिल) की मात्रा घट जाती है, जिससे गन्ने में चीनी का जमाव कम होता है।
गन्ने के प्रमुख रोग
लाल सड़न रोग (रेड रॉट)

गन्ने में बीज जनित रोगों में लाल सड़न जिसे काना रोग व लाल विगलन भी कहते हैं, एक प्राचीन व असाध्य रोग है। सर्वप्रथम इस रोग की पहचान इंडोनेशिया के एक वैज्ञानिक ‘वेन्टश ने वर्ष 1893 में की थी। अब यह रोग गन्ना उगाने वाले अनेक देशों में पाया जाता है। भारत में इस रोग को डा. बारबर ने प्रथम बार रेड मारीशस प्रजाति में गोदावरी डेल्टा (आंध्र प्रदेश) में देखा था। इसके बाद डा. बटलर ने इसका गहन अध्ययन किया और इस रोग को लाल सड़न (रेड रॉट) की संज्ञा दी। पश्चिम बंगाल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में इस रोग से गन्ने को अधिक हानि होती है। उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस रोग का प्रकोप महामारी के रूप में होता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक प्रान्तों में लाल सड़न का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। उत्तर प्रदेश में 1935-36 में लाल सड़न महामारी के रूप में उभरा था। को. 213, को. 312, को. 360, को. 419, को. 453, को. 8612, बी.ओ. 11, बी.ओ. 17, बी.ओ. 54 को.शा. 510, को.शा. 639 और को.क. 671 प्रजातियों की 1939-40, 1946-47. 1994-95 व 1998-99 में इस महामारी के कारण बुआई बन्द करनी पड़ी थी।
रोग के लक्षण
पत्तियों पर अनेक छोटे (2 से 3 मि.मी.) लंबे भूरे धब्बे बनते हैं जिससे पत्ती का रंग भूरा हो जाता है। सूखी पत्तियों पर अनगिनत एसरवुलाईश् बनती हैं जिनके अंदर रोग बीजाणु (कोनीडिया) बनते हैं। लगभग 3-6 दिनों में ये बीजाणु अंकुरित होकर नए धब्बे बनाते हैं, जुलाई के महीने से पत्तियों की मध्य शिरा तक 1 से 3 सें.मी. लंबे, लाल-भूरे धब्बे बनना आरंभ हो जाते हैं। भीषण अवस्था में ये धब्बे पूरी मध्य शिरा तक फैल जाते हैं। धब्बोंके बीच के हल्के पीले भाग में अनेक बीजाणु आकार (एसरवुलाई) बनती हैं। इस रोग के मुख्य लक्षण गन्ने के तने (गन्ने) में वर्षा के बाद दिखाई पडते हैं जो कि जुलाई से लेकर फसल कटने तक बने रहते हैं। गन्ने के पौधे में ऊपर से तीसरी या चौथी पत्ती सूखने लगती है और ये पत्तियां सूखने के बाद सीधी खड़ी रहती है। रोगी गन्ने को यदि लंबाई से फाड़ कर देखें तो अंदर ऊतकों का रंग लाल दिखायी देता है। इनमें चौड़ाई में बीच-बीच में सफेद रंग के धब्बे भी दिखाई पड़ते हैं, बीमारीयुक्त गन्नों से खट्टे रस (सिरका) जैसी गंध आने लगती है। गन्ना अंदर से खोखला हो जाता है और उसमें रोगकारक भूरे रंग की फंफूदी भरी हुई दिखाई पड़ती है।
आर्थिक महत्व
गन्ने में लाल सड़न से महामारी की दशा में अपेक्षाकृत अधिक हानि होती है। इस रोग की महामारी कई कारणों से फैलती है जैसे, रोग सुग्राही प्रजाति का अधिक बड़े प्रक्षेत्र पर उगाया जाना, रोग कारक के अधिक भीषण प्रभेदों का उत्पन्न होना, रोग के अनुकूल वातावरण मिलना, खेती में अधिक उर्वरकों और पानी का प्रयोग होना आदि। गन्ने की विभिन्न प्रजातियों में लाल सड़न की भीषणता यद्यपि अलग-अलग होती है परंतु अभी तक विकसित लगभग सभी प्रजातियों में रोग सुग्राहिता पाई गई है। कोई भी प्रजाति पूर्ण रूप से इस बीमारी से असंक्रम्य (इम्यून) नहीं है। परंतु बी.ओ. 91 में इस रोग के लिए सहनशीलता अपेक्षाकृत अधिक पायी जाती है। को. 312, को. 313, को. 453 आदि में इस रोग के प्रकोप से 11 से 42 प्रतिशत तथा को. शा. 430 में 44 प्रतिशत तक सुग्राह्यता पायी गयी है। गन्ना उपज घट जाती है इसके अतिरिक्त अगौले की मात्रा भी कम हो जाती है। शीरे की मात्रा में वृद्धि एवं चीनी की मात्रा घट जाती है।
रोगकारक एवं फैलाव
‘कोलेटोट्राइकम फालकेटम’ नामक फफूंदी लाल सड़न रोग का कारक है। काली गोलाकार ‘एसरवुलाईश् में ‘सीटी’ और ‘कोनीडिया’ की पर्ते होती हैं। कोनीडिया गुलाबी रंग के होते हैं तथा हंसिएनुमा मुड़े रहते हैं। प्रतिकूल वातावरण में फफूंदी ‘कलेमाइडोस्पोर’ बनाती हैं जो मिट्टी या गन्ने के अवशेषों पर अधिक समय तक जीवित रह सकती है। इस फफूंदी को लैंगिक अवस्था में ‘फाइसैलोस्पोरा टकुमनेन्सिस’ भी कहते हैं। यह अवस्था भी कभी-कभी इस रोग को फैलाने में मदद करती है।
रोग का प्राथमिक संक्रमण बीमारीयुक्त बीज गन्ना एवं मृदा से होता है। मृदा में फफूंदी के दूसरे आकार जैसे ‘क्लेमाइडोस्योर’ और ‘एस्कस’ पड़े रहते हैं जिनमें बीजाणु निकल कर गन्ने के स्वस्थ बीज को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त बीज गन्ने के अंदर और बाहर रोग फैलाने वाले बीजाणु मौजूद या छिपे रहते हैं जो अनुकूल वातावरण पाकर बीमारी को बढ़ावा देते हैं। गन्ने की पोरियों की गांठों पर बनी आंखों और सूक्ष्म पत्तियों पर रोग फैलाने वाली फफूंदी पड़ी रहती है जो आगे चलकर रोग के लक्षण पैदा करती है। रोगी गन्ने की गांठों पर काले- भूरे बिन्दु जैसे ‘एसरवुलस’ बनते हैं जिनमे कोनीडिया (बीजाणु) भरे रहते हैं। हवा, पानी बौछार तथा सिंचाई पानी द्वारा ये बीजाणु बिखर जाते हैं और दूसरे अन्य स्वस्थ पौधों को रोगी कर देते हैं।
नियंत्रण एवं प्रबंधन
प्रजातियों का चयन: रोग प्रतिरोधी प्रजातियों को अधिक से अधिक बुआई के लिए उपयोग करना चाहिए। अगर इन प्रजातियों का बीज उष्मोपचारित एवं प्रमाणित पौधशालाओं से लिया जाये तो बहुत अच्छा रहता है। आजकल जो भी नवीन प्रजातियां बुआई के लिए संस्तुति की जाती है उनमें लाल सड़न रोग विरुद्ध सहनशीलता का होना अनिवार्य कर दिया गया है।
बीज का ऊष्मोपचार: बीज गन्ना को 54°से. तापमान पर ढाई घंटे का नम-गर्म वायु उपचार या फिर 50°से. पर 2 घंटे गर्म पानी का उपचार देने से बीज सतह पर पड़े रोगाणु कारक मर जाते हैं। ऊष्मोपचार के बाद फफूंदीनाशक दवाई बावस्टिन के 0.2 प्रतिशत घोल में बीज को उपचारित करके बोने से जमाव अधिक तथा फसल में इस रोग का प्रकोप भी कम होता है।
रासायनिक उपचार: अभी तक किसी उपयुक्त रसायन की खोज संभव नहीं हो पाई है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला शायद फफूंदीनाशक रसायन समुचित सान्द्रता में गन्ने में प्रवेश नहीं कर पाते हैं और जो थोड़ा बहुत प्रवेश करते भी हैं तो गन्ने के अंदर पहुंचते ही तुरंत उनका कार्बान्डिाजिम विघटन आरंभ हो जाता है फिर भी फफूंदीनाशक दवाई जैसे कार्बान्डिाजिम के 0.2 प्रतिशत के घोल में गन्ना बीज को उपचारित करके बोने पर इस रोग का आपतन घट जाता है।
जैविक उपचार: ‘ट्राइकोडर्मा’ एवं अन्य ‘एस्परजिलस’ आदि फफूंदियों से लाल सड़न रोगकारक की रोकथाम के प्रयास अभी हाल में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में आरंभ किये गये हैं। अभी तक इस रोग को पूर्णरूपेण जैविक विधियों द्वारा नियंत्रण तो नहीं किया जा सका परंतु कुछ परिणाम उत्साहवर्धक है। संभवतः रोग सहिष्णु प्रजातियों में इस विधि से रोग को बचाया जा सकेगा। प्रति जीव-प्रतिस्पर्धा रखने वाले जीवाणुओं की संख्या बढ़ाकर इस रोग के प्रकोप को कम किया जा सकता है। उचित फसल चक्र अपनाने पर और हरी खाद का प्रयोग करने से लाल सड़न रोग कारक को कम किया जा सकता है।
गन्ना बोने से पूर्व खेत में धान की फसल 2-3 साल तक लगातार बोने से बीमारी के प्रकोप में कमी आती है, बशर्ते स्वस्थ बीज गन्ने का उपयोग किया जाये। खेत में जल भराव इस रोग को बढ़ावा देता है इसलिए गन्ने के खेत में पानी नहीं भरने देना चाहिए। रोगी बावक फसल की पेड़ी कभी नहीं लेनी चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
