ट्राइकोडर्मा: मिट्टी का डॉक्टर, खेत का पहरेदार      Publish Date : 21/01/2026

            ट्राइकोडर्मा: मिट्टी का डॉक्टर, खेत का पहरेदार

                                                                                                                                     प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

Trichoderma (ट्राइकोर्मा) एक बहुत ही फायदेमंद और मित्र फफूंद है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से खेती में जैविक फफूंदनाशक के रूप में किया जाता है। यह मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है और पौधों को बीमारियों से बचाने में मदद करता है।

ट्राइकोडर्मा क्या है?

जैसे दही जमाने के लिए हमें 'अच्छे बैक्टीरिया' की जरूरत होती है, वैसे ही मिट्टी के लिए ट्राइकोडर्मा एक 'अच्छा फफूंद' है। यह मिट्टी में रहकर उन 'बुरे फफूंद' को चुन-चुन कर मारता है जो फसलों की जड़ों को सड़ाते हैं या फसल सुखा देते हैं।

यह किसान के लिए क्या काम करता है?

बीमारियों से सुरक्षा: यह जड़ सड़न, तना सड़न और उकठा (पौधे का अचानक सूखना) जैसी बीमारियों को जड़ से रोकता है।

फसल की बढ़त: यह पौधों की जड़ों का विकास तेजी से करता है, जिससे फसल हरी-भरी रहती है।

खाद बनाने में मदद: अगर आप इसे गोबर की खाद में मिलाते हैं, तो यह खाद को जल्दी सड़ाकर उसे और ज्यादा ताकतवर बना देता है।

सबसे जरूरी बातें (सावधानियां)

केमिकल से दूरी: जिस खेत में आप ट्राइकोडर्मा डाल रहे हैं, वहां 4-5 दिनों तक कोई भी रासायनिक जहर (Chemical Fungicide) न डालें। जहर डालने से यह मित्र फफूंद मर जाएगा।

नमी भी जरूरी है: ट्राइकोडर्मा तभी काम करता है जब मिट्टी में थोड़ी नमी (गीलापन) हो। सूखे खेत में यह काम नहीं करेगा।

धूप से बचाएं: इसे हमेशा ठंडी और छायादार जगह पर रखें। धूप में रखने से इसकी ताकत खत्म हो जाती है।

ट्राइकोडर्मा को गोबर की खाद के साथ तैयार करना सबसे फायदेमंद तरीका है। इससे बहुत कम खर्चे में करोड़ों की संख्या में "मित्र फफूंद" पैदा हो जाते हैं जो पूरे खेत की मिट्टी को बीमारियों से मुक्त कर देते हैं। अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद, 100 से 200 किलो (खाद पुरानी होनी चाहिए, एकदम ताजी और गर्म नहीं)।

                                                       

ट्राइकोडर्मा पाउडर: 1 से 2 किलो।

पानी: हल्का छिड़काव करने के लिए।

जूट की बोरी या टाट: ढकने के लिए।

छायादार जगह चुनें: सबसे पहले एक ऐसी जगह चुनें जहाँ सीधी धूप न पड़ती हो (जैसे किसी बड़े पेड़ के नीचे या छप्पर के नीचे)। इसे कभी भी खुले आसमान के नीचे सीधी धूप में न बनाएं।

खाद का ढेर लगाएं: गोबर की खाद को जमीन पर फैला दें या उसका एक ढेर बना लें। ध्यान रहे खाद में नमी होनी चाहिए, न ज्यादा सूखी और न ही बहुत ज्यादा गीली।

ट्राइकोडर्मा मिलाएं: अब इस खाद के ऊपर 1-2 किलो ट्राइकोडर्मा पाउडर को चारों तरफ छिड़क दें। आप चाहें तो पाउडर को थोड़े से पानी में घोलकर भी खाद पर छिड़क सकते हैं।

अच्छे से मिक्स करें: फावड़े की मदद से खाद और ट्राइकोडर्मा को अच्छी तरह मिला दें ताकि पाउडर पूरी खाद में एक समान मिल जाए।

नमी चेक करें: मुट्ठी में खाद को दबाकर देखें, अगर लड्डू जैसा बन रहा है तो नमी सही है। अगर सूखी लगे तो थोड़ा पानी छिड़क दें।

ढक कर रखें: अब इस ढेर को जूट की बोरी या टाट से ढक दें। इससे अंदर अंधेरा और नमी बनी रहेगी जो फफूंद के बढ़ने के लिए जरूरी है।

तैयार होने की पहचान:

                                                          

हर 3-4 दिन में एक बार बोरी हटाकर खाद को ऊपर-नीचे पलट दें और जरूरत लगे तो थोड़ा पानी छिड़क दें।

7 से 10 दिन के अंदर आप देखेंगे कि पूरी खाद पर हल्के हरे या सफेद रंग की परत (फफूंद) जम गई है। इसका मतलब है कि आपका "जैविक हथियार" तैयार है।

खेत में इस्तेमाल कैसे करें?

जब यह खाद पूरी तरह हरी दिखने लगे, तब इसे आखिरी जुताई के समय अपने खेत में बिखेर दें और हल्का पानी (सिंचाई) लगा दें।

ध्यान देने वाली बात:

अगर आप इसे बरसात के मौसम में या पहली बारिश के बाद डालते हैं, तो इसके नतीजे सबसे शानदार मिलते हैं क्योंकि उस समय हवा में नमी ज्यादा होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।