गेहूं की प्रमुख बीमारियां एवं उनका प्रबंधन      Publish Date : 01/12/2025

                 गेहूं की प्रमुख बीमारियां एवं उनका प्रबंधन

                                                                                                                                                              प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

गेहूं फसल मे कई प्रकार के रोग लगते है जो फसल की उत्पादकता तथा बीज की गुणवत्ता को प्रभावित करते है। गेहूं में मुख्य रूप से कंडुआ, गेरूई, करनालवंट, पत्र अंगमारी, बुकनी तथा सेहूं रोग का प्रकोप होता है। इनमे से कंडुआ, करनालवंट तथा सेहूं रोग बीज की गुणवक्ता को प्रभावित करते है तथा इसके लिए केन्द्रीय बीज प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा मानक निर्धारित है। निर्धारित मानको से अधिक रोग रहने पर बीज प्रमाणीकरण संस्थाए उत्पाद को बीज के लिए अयोग्य घोषित कर देती है।

पत्र अंगमारी के कारण बीज फसल अयोग्य घोषित नहीं होती है लेकिन बीज की मात्रा प्रभावित होती है। अतः फसल एवं बीज उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए यह आवश्यक है कि वे यह जानकारी रखें कि इन रोगों के पहचान के लक्षण क्या है, इनके निर्धारित मानक क्या है तथा फसल में इनका प्रबंधन कैसे किया जा सकता है। गेहूँ के प्रमुख रोगों का प्रकार और लक्ष्ण इस प्रकार सें है-

                                                            

छिदरा कंडुआ रोग- यह एक फफूंदजनित रोग है जो लगभग पूरे भारत वर्ष में होता है तथा इससे उपज में लगभग 5 प्रतिशत हानि होती है। बीज फसल में निर्धारित मानकों से अधिक प्रकोप होने पर प्रमाणीकरण संस्थाए बीज फसल को अयोग्य घोषित कर देती है।

पहचान के लक्षण- यह रोग केवल बालियों को प्रभावित करता है। सामान्यतः बालियां निकलने से पहले रोगी एवं स्वस्थ्य पौधों में कोई विशेष अंतर नहीं रहता है, रोगी पौधों में बालियां प्रायः स्वस्थ्य पौधों से कुछ पहले निकलती है तथा कुछ प्रजातियों में बालियां निकलने से पहले ही घवज पत्तीयां पीली पड़ जाती है। रोगी पौधों की बालियां पूर्ण या आंशिक रूप से काले चूर्ण में परिवर्तित हो जाती है। शुरू में यह काला चूर्ण चांदी के समान सफेद झिल्ली से ढ़का रहता है तथा बाद में हवा के झोकें से फट जाता है तथा काला चूर्ण हवा में उड़कर दूसरी बालियों को संक्रमित कर देता है। संक्रमित बीज से दें। अगले वर्ष काली बालियां निकलती है।

प्रमाणीकरण मानक

  • आधार एवं प्रमाणित बीजों के खेतों में काली बाली वाले पौधों की संख्या क्रमशः 0.1 एवं 0.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिये।
  • आधार एवं प्रमाणित बीज फसल के खेतों में 150 मीटर के दायरे में भी काली बाली वाले पौधों की संख्या क्रमशः 0.1 एवं 0.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिये।

प्रबंधन

  • रोग प्रतिरोधी किस्मों का उत्पादन करें।
  • फसल उत्पादन वाले गेहूं के खेतों में कम से कम 150 मीटर दूर गेहूं का बीजोत्पादन करें।
  • बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम या कार्बोक्सीन (2.50 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज ) या वाइटाबेक्स 200 (4.00 ग्राम प्रति कि.ग्रा बीज) से अवश्य उपचारित करें।
  • बीज उत्पादन वाली फसल में बालियां निकलते समय लगातार निरीक्षण करते रहे तथा जैसे ही रोगी बालियां दिखाई दे, उन्हे कागज के लिफाफे से ढककर तोड़ ले तो जमीन में दबा दे या जला दें।

करनालबंट- फफूंद द्वारा होने वाला यह एक बीज जनित रोग है। बीज में निर्धारित मानक से अधिक रोग ग्रसित बीज होने पर बीज का प्रमाणीकरण नहीं हो पाता है।

पहचान के लक्षण- यह रोग दानें बनने के बाद दिखाई पड़ता है। रोग ग्रस्त दाने आंशिक या पूर्ण रूप से काले चूर्ण में परिर्वतित हो जाते है। एक पौधे की सभी बालियां तथा एक बाली के सभी दानें रोग ग्रस्त होते है।

सामान्यतः खड़ी फसल में रोग ग्रस्त पौधों को पहचानना संभव नहीं है।

प्रमाणीकरण मानक- आधार एवं प्रमाणित बीज में रोगग्रस्त दानों का प्रतिशत क्रमशः 0.05 एवं 0.25 से अधिक नही होना चाहिये।

प्रबंधन

  • रोग प्रतिरोधी किस्मों में प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करें। बीज उत्पादन हेतु आधार/अभिजनक बीज का प्रयोग करें।
  • बाली निकलते समय यथा संभव सिंचाई न करें।
  • नत्रजन का संतुलित व्यवहार करें।
  • फसल में जब 50 प्रतिशत बालियां निकल गई हो तो टिल्ट 25 ई.सी. (0.01 प्रतिशत) या कार्बेन्डाजिम (0.01 प्रतिशत) या मैन्कोजेब (0.2) का छिड़‌काव करें।

पत्र अंगमारी- यह एक फफूंद जनित रोग है तथा इससे बीज की मात्रा प्रभावित होती है। इस रोग से उन्नत प्रजातियां भी प्रभावित होती है और उपज पर काफी असर पड़ सकता है।

पहचान के लक्षण- प्रारम्भ में रोग के लक्षण, नीचे की पत्तियों पर गोलाकार या अंडाकार छोटे-छोटे भूरे रंग के धब्बों के रूप में देखे जा सकते है। ये धब्बे अनुकूल मौसम मे ऊपर की पत्तियों को झुलसा देते है। प्रभावित फसल आग से झुलसी हुई सी प्रतीत होती है। दानें सिकुड़े हुए तथा वजन में हल्के हो जाते है।

प्रमाणीकरण मानक- बीज फसल में इस रोग के लिए कोई मानक नहीं है। प्रमाणित फसल बीज फसल के रूप में प्रमाणित हो सकती है। लेकिन उपज में काफी कमी हो जाती है। प्रभावित फसल के बीज किसानों को ग्राह्य नहीं होते है।

प्रबंधन

  • बीजोपचार अवश्य करें।
  • रोग के लक्षण दिखाई है। देने पर टिल्ट 25 ई.सी. 0.01 प्रतिशत या मैन्कोजेब (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव अवश्य करें।

सेहूं रोग (इयरकाकिल)- यह रोग एक सूत्रकृमि के द्वारा होता है।

पहचान के लक्षण- पौधों की उंचाई कम होना रोग संक्रमण का एक प्रमुख लक्षण है। प्रभावित पौधों की पत्तियां मुड़ी हुई तथा संकुचित दिखाई पड़ती है। प्रभावित बालियां अधिक समय तक हरी रहती है तथा बालियों में दानों की जगह भूरे/काले रंग के इलायची के दाने के बराबर कठोर पिटिटकाये बन जाती है।

प्रमाणीकरण मानक- बीज में एक भी पिटिटकाये नही होनी चाहिये।

प्रबंधन

  • बीज उत्पादन के लिए रहित पिटिटका अभिजनक/आधारिय बीज का प्रयोग करें।
  • फसल उत्पादन के लिए सदैव प्रमाणित बीज का ही व्यवहार करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।