गन्ने में ग्रीष्मकालीन चूसक कीटों का नियन्त्रण      Publish Date : 29/06/2026

गन्ने में ग्रीष्मकालीन चूसक कीटों का नियन्त्रण

                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह

  • उ.प्र. गन्ना शोध परिषद, शाहजहाँपुर, ग्रीष्मकालीन चूसक कीटों का नियन्त्रण करने की तकनीक-

1. काला चिकटा (ब्लैक बग): काला चिकटा चूसक कीट काले रंग का होता है। इसका प्रकोप अधिक तापमान व शुष्क मौसम समान्यतः अप्रैल से जून में पेड़ी में अधिक व बावक फसल में कम दिखाई देता। प्रभावित पौधों की पत्तियाँ पीली हो जाती हैं तथा उन पर कत्थई रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके शिशु पत्रकंचुक एवं गन्ने के गोफ के मध्य में पाये जाते हैं। प्रौढ़ तथा शिशु दोनों पत्तियों का रस चूसते हैं, जिससे गन्ने की बढ़वार रुक जाती है।

2. थ्रिप्स: थ्रिप्स बहुत छोटे लगभग 2-3 मिमी आकार के होते है। मादा कीट गहरे भूरे रंग व नर हल्के रंग के होते है। इसका प्रकोप अधिक तापमान व शुष्क मौसम मे तेजी से होता है। थ्रिप्स पत्ती की उपरी सतह के अन्दर अण्डा देते है व निम्फ निकलकर पत्ती के रस चूसते हैं। पत्ती का अग्रभाग मुड़ कर नुकीला हो जाता है। प्रभावित पत्तियाँ ऊपर से नीचे की ओर सफेद/पीली हो जाती हैं व चाँदी जैसी चमक होती है। वर्षा के प्रारम्भ होते ही इनकी जनसंख्या में कमी होने लगती है।

                                

3. सैनिक कीट (कुतरकर खाने वाला कीट): इस कीट की सूड़ी अवस्था गन्ने की पत्तियों को खाती है। मादा कीट पत्रकचुक में एक समूह में अण्डे देती है। इन अण्ड समूहों से 4-5 दिन बाद छोटी-छोटी सूड़ियाँ निकलकर शाम के समय सैनिकों की भाँति समूह में पत्तियों को खाती हैं। दिन के समय सूड़ियाँ जमीन के अन्दर सूखी पत्तियों, पत्रकंचुकों एवं गॉफ में छिपी रहती हैं। पेड़ी फसल में इस कीट का प्रकोप अधिक होता है।

उपरोक्त तीनों कीटों के नियंत्रण की विधियाँ:

• खेत की नियमित अंतराल पर सिंचाई करते रहें।

• खेत को खरपतवार या गन्ने की सूखी पत्तियों से मुक्त रखें।

• संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें।

सुबह या शाम को निम्न में से किसी एक कीटनाशक का प्रति हेक्टेअर की दर से 625 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
1- प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिशत साइपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ई.सी. 750 मिली (संयुक्त उत्पाद)।

2- इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस. एल. दर 200 मि.ली.।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।