
तरबूज के प्रमुख कीट एवं उनका प्रबन्धन Publish Date : 18/06/2026
तरबूज के प्रमुख कीट एवं उनका प्रबन्धन
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 डॉ0 निधि सिंह
तरबूज एक बेल वाली फसल है जो कि गर्मी के मौसम में उगाई जाती है और तरबूज हमारे देश में एक बहुत ही अच्छा लोकप्रिय गर्मियों में उगाया जाने वाला फल है। गर्मियों के मौसम में तरबूज का फल कई प्रकार से उपयोग में लाया जाता है जैसे- सीधे फल को काटकर खाने के रूप में जूस और शरबत एवं स्क्वैश आदि बनाने के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। तरबूज के पोषण और स्वास्थ्य को कई लाभ भी प्राप्त होते हैं। इसकी खेती छोटे एवं बड़े किसानों के लिए आर्थिक रूप से अच्छा लाभ प्रदान करने वाली मानी जाती है और यह एक अच्छी ताजगी देने वाला फल है। इसके प्रति 100 ग्राम तरबूज में 95.8 ग्राम पानी होता है। इसलिए इस तरबूज फल का सेवन गर्मियों के दिनों मे अधिकतर किया जाता है और यह तरबूज फल शरीर को ताजगी से भर देता है और शरीर में होने वाली पानी की कमी को भी पूरा करता है।
तरबूज के फल में उपलब्ध पोटेशियम हमारे हृदय को स्वस्थ रखने में मदद करता है। इस तरबूज फल में लगभग 119 मि.ग्रा. पोटेशियम होता है, जो कि हृदय के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। तरबूज की शुगर बेबी और अर्का मानिक एवं अर्का ज्योति अच्छी प्रमुख किस्में मानी जाती है। लेकिन इस तरबूज की फसल एवं फलों में कई प्रकार के कीट नुकसान पहुंचाते है जो निम्नलिखित हैः-
तरबूज के प्रमुख कीट

फल मक्खी- यह कीट सभी प्रकार की बेल वाली फसलों के फलों पर सबसे अधिक आक्रमण करने वाला कीट हैं और इस कीट की शिशु (मैंगट) अवस्था छोटे फलों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती हैं। इस कीट का प्रकोप खरबूज, करेला एवं तोरई आदि की फसलों में भी आसानी से देखा जा सकता हैं। इस कीट की वयस्क अवस्था एवं शिशु (मैगट) अवस्था दोनों ही बेल वाले पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं। इस कीट वयस्क अवस्था वाला कीट मटर के दानें के आकार के फलों को खाकर एवं उसमें अपने अण्डें दे कर नुकसान पहुँचाते हैं। अण्डे से शिशु कीट (मैगट) निकलते हैं और फल के गूदे को अन्दर ही अन्दर खाकर बडे हो जाते हैं और फिर इसके शिशु कीट फलों से बाहर निकल कर मिट्टी के अन्दर आ जाते हैं और प्यूपा बनाते हैं फिर 7-11 दिनों बाद उनसे वयस्क मक्खी निकलकर फिर से बेल वाली फसलों के फलों के अन्दर अण्डें देती हैं।
लाल भृंग कीट- यह छोटे चमकीले लाल रंग के कीट होते है़ं इस कीट के वयस्क एवं सूंडी कीट दोनों ही पौधों के अंकुरित भाग एवं नयी पत्तियों को खाकर छलनी जैसा बना देते हैं। इस कीट से ग्रसित पत्तियाँ फट जाती हैं या इसके प्रकोप से कई बार फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं एवं पौधे की बुण्ड में देती हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ पत्तियों को खाते हैं जिससे पत्तियों की संरचना जालीदार बन जाती है और फूल और फल कम लगते है जिससे किसान को भारी नुकसान होता है।
लीफ माइनर- इस कीट के वयस्क पीले रंग के एवं शिशु सूक्ष्म बिना पैर के नारंगी पीले रंग के होते हैं। इस कीट के शिशु पत्तियों में सांप के आकार की सुरंगें बनाकर अंदर से क्लोरोफिल खाते हैं, जिससे पौधे के हरे भाग में कमी होने के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया खत्म हो जाती है जिससे उत्पादन में बहुत कमी हो जाती है। इससे किसान को बहुत ज्यादा नुकसान होता है।
रेड स्पाइडर माइट- यह कीट छोटे आकार के लाल रंग के होते है। इस वयस्क कीट के शरीर पर काले रंग के धब्बे होते हैं। इस कीट के शिशु एवं वयस्क कीट रस चूसकर पौधों को हानि पहुंचाते हैं, जिसके कारण इन पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है और शुष्क मौसम मे इस कीट का प्रकोप अधिक होता है। इससे किसान को बहुत ज्यादा नुकसान होता है।
रोकथाम के उपाय-
- खेत की सफाई का ध्यान रखना चाहिए।
- गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि जमीन के अंदर छिपे कीट ऊपर आकर मर जाए।
- समय से बुबाई करना चाहिए।
- फलों की तुड़ाई सही समय पर करना चाहिए।
- इन सभी कीटों से ग्रसित फलों को एकत्रित कर जमीन में दबा देना चाहिए।
- पौधों पर राख का बुरकाव करते रहना चाहिए।
- खेत में रात के समय प्रकाश ट्रैप लगाये और उसके नीचे दवा मिलाकर पानी रखें।
- चिड़ियों को बैठने के लिए टी आकार की 20 लकड़ियों को प्रति एकड़ की दर से खेत में लगा दें।
- इस बेल वाली फसलों के खेतों में निम्बोली के पाउडर का बुरकाव करते रहना चाहिए।
- नीम सीड करनल इक्सटेक्ट 5 प्रतिशत का दो बार छिडकाव करें।
- इस कीट की रोकथाम के लिए 350 ग्राम तम्बाकू के पत्ते एवं 300 ग्राम कनेर के फल और 50 ग्राम लाल मिर्च पाउडर 2 लीटर पानी में अच्छे से उबालकर ठण्डा करलें और इस मिश्रण को 30 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
- इस कीट की रोकथाम के लिए नीमास्त्र का प्रयोग करें और इस नीमास्त्र को बनाने के लिए 5 किलोग्राम नीम की पत्तियाँ लें या फिर 5 किलोग्राम नीम के फल लें, और इनको कुचल लें, और फिर इसमें 5 लीटर देशी गाय का गौमूत्र मिलायें, एवं इसी में 1 किलोग्राम देशी गाय का गोबर मिलायें और फिर इसी में 100 लीटर पानी मिलाकर एक प्लास्टिक के ड्रम में भर दें, और इसे 48 से 72 घण्टे के लिये बोरा से ढ़क दें। लेकिन इस तरह से बने हुए अग्नि अस्त्र का उपयोग 3 माह के अन्दर ही कर लेना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
