
गन्ने की फसल में Fall Army Worm (FAW) : “अमेरिकन सुंडी” का बढ़ता खतरा Publish Date : 13/06/2026
गन्ने की फसल में Fall Army Worm (FAW) : “अमेरिकन सुंडी” का बढ़ता खतरा
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कृषि के सामने एक नया और बेहद खतरनाक कीट तेजी से उभरकर सामने आया है जिसको Fall Armyworm (Spodoptera frugiperda) के नाम से जाना जाता है। शुरुआत में इस कीट को केवल मक्का की फसल का दुश्मन माना गया, लेकिन अब यह गन्ने सहित 80 से अधिक फसलों पर हमला करने लगा है। भारत में इसका पहला बड़ा प्रकोप वर्ष 2018 में देखा गया और धीरे-धीरे यह दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक फैल गया। गन्ने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह कीट आने वाले समय में बड़ा आर्थिक खतरा बन सकता है।
Fall Army Worm आखिर है क्या?

यह एक अत्यंत आक्रामक और तेजी से फैलने वाला कीट है, जिसका मूल स्थान अमेरिका माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि:
- यह बहुत तेजी से प्रजनन करता है।
- रात में सक्रिय रहता है।
- कई कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेता है।
- हवा के साथ लंबी दूरी तक फैल सकता है।
- एक बार खेत में जमने पर नियंत्रण कठिन हो जाता है।
- ICAR और विभिन्न कृषि अनुसंधान संस्थानों ने इसे गन्ने के लिए संभावित गंभीर खतरा माना है।
गन्ने में पहचान कैसे करें?
Fall Army Worm का हमला मुख्यतः गन्ने की शुरुआती अवस्था (2–5 महीने) में ज्यादा देखा जाता है।
प्रमुख लक्षण:
- पत्तियों में अनियमित छेद।
- “Window Pane” जैसे पारदर्शी धब्बे।
- पत्तियों का कंकाल जैसा दिखना।
- स्पिंडल/व्हॉर्ल के अंदर भूरे रंग की बीट (frass)।
- नई पत्तियों का कटा या फटा निकलना।
- गंभीर अवस्था में पौधे की बढ़वार रुकना।
- कई बार किसान इसे साधारण इल्ली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह बहुत तेजी से नुकसान पहुंचा सकता है।
नुकसान कितना गंभीर हो सकता है?
- पौधों की प्रारंभिक वृद्धि प्रभावित।
- टिलरिंग कम होना।
- प्रकाश संश्लेषण घट जाना।
- गन्ने की मोटाई और वजन कम होना।
- चीनी रिकवरी पर भी असर पड़ सकता है।
- यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो भारी आर्थिक नुकसान संभव है।
Fall Army Worm का Integrated Management (IPM)
केवल दवा छिड़काव से इस कीट को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इस कीट का नियंत्रण करने के लिए Integrated Pest Management (IPM) सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
नियमित निगरानी सबसे जरूरी
- सप्ताह में कम से कम 2 बार खेत निरीक्षण करें।
विशेष ध्यान दें:
- नई पत्तियों पर।
- व्हॉर्ल के अंदर।
- खेत की मेड़ों और घास पर।
- शुरुआती पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है।
- खेत की साफ-सफाई।
- खेत की मेड़ों की घास हटाएं।
- खरपतवार नियंत्रण रखें।
- संक्रमित पौधों को तुरंत हटाएं, क्योंकि यह कीट कई वैकल्पिक पौधों पर जीवित रह सकता है।
फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग
5–8 pheromone traps प्रति एकड़ लगाने का प्रयोग करने से कीट के-
- नर पतंगों की निगरानी होती है।
- प्रकोप का शुरुआती संकेत मिल जाता है।
- कीट की संख्या कम करने में मदद मिलती है।
कीट का जैविक नियंत्रण (Biological Control):
आजकल कृषि वैज्ञानिक रासायनिक दवाओं पर पूरी निर्भरता से बचने की सलाह देते हैं। अतः इस कीट के जैविक नियंत्रण के लिए कुछ प्रभावी उपाय इस प्रकार से हैं-
- Neem based formulations (Azadirachtin)।
- Beauveria bassiana।
- Metarhizium anisopliae।
- Bacillus thuringiensis (BT)।
- ये पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं।
रासायनिक नियंत्रण (जरूरत पड़ने पर)
यदि प्रकोप अधिक हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह से नियंत्रित मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है।
आमतौर पर उपयोग होने वाले molecules:
- Chlorantraniliprole।
- Emamectin Benzoate।
- Spinetoram।
- Thiamethoxam + Chlorantraniliprole combinations
लेकिन ध्यान रखें:
- बार-बार एक ही दवा का उपयोग resistance बढ़ाता है।
- बिना सलाह के अंधाधुंध spray नुकसानदायक हो सकता है।
क्यों बढ़ रहा है यह खतरा?
- जलवायु परिवर्तन।
- लगातार monocropping।
- अधिक रासायनिक उपयोग।
- प्राकृतिक शत्रुओं की कमी।
- अंतरराष्ट्रीय कीट प्रसार।
इन सभी कारणों से Fall Army Worm तेजी से नए क्षेत्रों में फैल रहा है।
भारत के किसानों के लिए संदेश
भारत में गन्ना केवल फसल नहीं, लाखों किसानों की अर्थव्यवस्था का आधार है। Fall Army Worm जैसे invasive pests आने वाले वर्षों में खेती की लागत और जोखिम दोनों बढ़ा सकते हैं।
इसलिए:
- समय के रहते ही जागरूकता को बढ़ाएं।
- समय के रहते ही कीट की पहचान करें।
- कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार ही कार्य करें।
- Integrated Pest Management अपनाएं।
- संतुलित कीटनाशक उपयोग करें।
- क्योंकि यही भविष्य का रास्ता है।
- “कीट से लड़ाई केवल दवा से नहीं, समझदारी और निगरानी से जीती जाती है।”

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
