
सिर्फ अकादमिक तनाव से नहीं लड़ते छात्र Publish Date : 16/10/2026
सिर्फ अकादमिक तनाव से नहीं लड़ते छात्र
प्रोo आर. एस. सेंगर
देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों को प्रतिभा, अनुशासन और उत्कृष्ट शैक्षणिक केंद्रों के रूप में देखा जाता है। इन संस्थानों में प्रवेश पाना लाखों विद्यार्थियों का सपना होता है, लेकिन जब इन्हीं संस्थानों से छात्रों की आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं, तो समाज के सामने शिक्षा व्यवस्था, परिवार और सामाजिक सोच से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। हर ऐसी घटना पर संवेदना व्यक्त करने के साथ यह समझना भी जरूरी है कि आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनमें एक विद्यार्थी इतना असहाय महसूस करने लगा?

आईआईटी में पिछले वर्षों में विद्यार्थियों की आत्महत्या के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 75 आईआईटी छात्रों ने खुदकुशी की। एक दशक में ऐसे मामलों में 135 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक परिवार, माता-पिता के सपने, भाई-बहनों का संबंध, शिक्षक की भूमिका और एक विद्यार्थी का भविष्य जुड़ा होता है, इसलिए इन घटनाओं को केवल परीक्षा के दबाव या पढ़ाई की कठिनाई से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा।
निस्संदेह, आईआईटी जैसे संस्थानों में लगातार परीक्षाएं, परियोजनाएं, प्रयोगशाला कार्य, समय-सीमाएं, अच्छे अंक हासिल करने की चिंता व रोजगार की प्रतिस्पर्धा बनी रहती है, और जब विद्यार्थी अपने आसपास के साथियों को लगातार अच्छा प्रदर्शन करते देखता है, तब उसका आत्मविश्वास दरकने लगता है। किंतु, केवल पढ़ाई को दोष देना सही नहीं होगा। प्रत्येक विद्यार्थी की परिस्थितियां अलग होती हैं।

किसी के परिवार में आर्थिक समस्या हो सकती है, किसी को माता-पिता के अलगाव या किसी प्रियजन को खोने का दुख परेशान कर सकता है, कोई लंबे समय से मानसिक तनाव से जूझ रहा हो सकता है, तो किसी को भेदभाव, अपमान, अकेलापन या सामाजिक अस्वीकार का सामना करना पड़ सकता है। कुछ मामलों में नशे जैसी परिस्थितियां मानसिक परेशानी को और गंभीर बना सकती हैं।
इसलिए प्रत्येक घटना की संवेदनशील जांच जरूरी है। बिना जांच किसी एक कारण को अंतिम मान लेना न विद्यार्थी के साथ न्याय है और न समाज के साथ।
ऐसे में, आईआईटी सहित सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में केवल काउंसलिंग केंद्र खोल देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि विद्यार्थियों तक जरूरी सहायता पहुंचे। हर आत्महत्या केवल संस्थान की गलती नहीं होती। परिवार, शिक्षक, मित्र, सहपाठी और समाज मिलकर विद्यार्थी के आसपास का वातावरण बनाते हैं, इसलिए समाधान भी सामूहिक होना चाहिए।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।