जेनेटिक्स में खोजें जॉब्स के जींस      Publish Date : 03/10/2026

         जेनेटिक्स में खोजें जॉब्स के जींस

                                                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर

आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि मानव शरीर कैसे काम करता है? क्या अन्य जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों और मानव में कुछ आपसी समानताएं हैं? कैसे सिर्फ हड्डियों से किसी व्यक्ति के माता पिता का पता लगाया जा सकता है? कैसे लैब में किसी जीव को तैयार किया जा रहा ष्है? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन्हें जेनेटिक्स के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। बायो-टेक्नोलॉजी के अंतर्गत आने वाले इस फील्ड में आज जॉब को बेशुमार संभावनाएं मौजूद है।

क्या है जेनेटिक्स

जेेनेटिक साईस व जेनेटिक इंजीनियरिंग दोनों ही बायो-टेक्नोलॉजी का अहम हिस्सा है। आमतौर पर जेनेटिक इंजीनियर्स का काम विभिन्न जीनों के समूहों और उनके गुणों के बारे में विस्तृत अध्ययन करना होता है। इसके साथ ही यह उन्नत किस्म के जीनों को तैयार भी करते हैं। इसके आलावा, जेनेटिक्स के एक्सपर्ट इस बात का पता भी लगाते हैं कि पौड़ी दर पीढ़ी गुण एवं व्यवहार किस प्रकार समान होते हैं और कैसे संशानुगत विसंगतियां पैदा होती है। खासकर जेनेटिक इंजीनियर पेड़-पौधों और जानवरों में प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर करने के लिए कुछ खास तरीके से जींस की ईजाद भी करते हैं। लेकिन यह कार्य इतना आसान भी नहीं है। इसके लिए गहन अनुसंधान की जरूरत होती है।

स्पेशलाइजेशन

जेनेटिक्स के क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स कई स्तरों पर कार्य करते हैं। मेडिकल फील्डमें जेनेटिक इंजीनियर मुख्यतया जेनेटिक्स के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज को खोज करते हैं। साथ ही, मॉलिकुलर आधारित बीमारियों सेबचाव के तरीके भी ईजाद करते हैं। वैसा, इन दिनों क्रिमिनल मामलों में अपराधियों को पकड़ने के लिए भी जेनेटिक्स टेस्ट की खूब मदद ली जाने लगी है। साथ ही, जेनेटिक इंजीनियर आज जेनेटिक मॉडिफाइड क्रॉप्स तैयार करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

पर्सनल स्किल

इस क्षेत्र में कदम रखने वालों की इच्छा होती है कि वे जेम्स वॉटसन और फ्रॉमिस क्रीक की तरह जेनेटिक्स फील्ड में कुछ आश्चर्यजनक खोज करें। दरअसल, जेम्स वॉटसन और फ्रीक ने वर्ष 1953 में डीएनए के मॉलिकुलर स्ट्रक्चर के बारे में पता लगाया था। हालांकि, इस तरह की खोज करना मुश्किल है. लेकिन नामुमकिन नहीं। यदि आप में लगन, तेज दिमाग, जिज्ञासु प्रवृत्ति, रचनात्मकता, नए तरीके ढूंढने की ललक, विश्लेषण क्षमता हैं, तो आप भी इस क्षेत्र में नाम कमा सकते हैं। वैसे, जेनेटिक वैज्ञानिकों का जीवन उनके काम के प्रति समर्पण, बौद्धिक कौशल और तर्कशीलता के स्तर पर निर्भर करता है। ये वैज्ञानिक जीव को संरचना और जेनेटिक विसंगतियों को दूर करने के लिए जेनेटिक कोड को समझने की कोशिश करते हैं।

जॉब की संभावनाएं

अनुसंधान से जुड़े क्षेत्र का लगातार विस्तार होने से जेनेटिक इंजीनियर्स की मांग भारत के साथ-साथ विदेश में भी बढ़ती जा रही है। इस समय अकेले भारत में ही लगभग 200 से अधिक अनुसंधान व विकास केंद्र हैं, जहाँ इनके लिए कार्य करनेका अपार अवसर होता है। ऐसे अवसर मेडिकल, फार्मास्युटिकल्स, एग्रीकल्चर, सरकारी - निजी अनुसंधान व विकास केंद्रों में खूब हैं। यदि आपने इस क्षेत्र में उचित कोर्स किया है और भरपूर अनुभव रखते हैं, तो टीचिंग के क्षेत्रमें भी किस्मत अजमा सकते हैं।

वेसे, जेनेटिक इंजीनियर्स की मांग मायीटेक लेबोरेटरी, डेयरी फार्मिग और एनविस्नमेंट में संबंधित उद्योगों में लगातार बढ़ रही है। यदि आपके पास जेनेटिक इंजीयिरिंगमें पीएचडी की डिग्री है, तो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलांजी (नई दिल्ली), द सेंटर फॉर डीएनए, फिंगर प्रिंट, ऐंड डायग्नोटिक्स (हैदराबाद), बायोकेमिकल इंजीनियरिंग रिसर्च ऐंड प्रोसेस के लेवल पेर्मिटसेंटर (चंडीगढ़), द इंस्टिट्यूट ऑफ़ वेनोमिक ऐंड इंटेग्रेटिव बायोलॉजी (दिल्ली) इंस्टीट्यूट में जेनेटिक इंजीनियर्स और बायोटेक साइंटिस्ट के रूप में कार्य कर सकते हैं।

जॉब मार्केट

उद्योग चेंबर एसोचौम के आकलन के अनुमार, भारतीय बॉयो-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री वर्ष 2005-06 में 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के करीब थी, मगर वर्ष 2030 तक यह बढ़कर 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर के करीब पहुंचे जाने की उम्मीद है। वर्तमान में यह सेक्टर करीब 35 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, इस सेक्टर में वर्ष 2026 के अंत तक करीब 10 लाख जॉब्स सर्जित होंगे।

वेतन

यदि आप जेनेटिक्स इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएट हैं, तो मासिक वेतन आठ से 12 हजार रुपये हो सकता है। इस क्षेत्र में पीएचडी डिग्री रखने वाले प्रवेशकों शुरुआती दौर में 15 से 25 हर रुपये मासिक वेतन आसानी से मिल जाता है। इस क्षेत्र में योग्य व अनुभवी लोगों को अच्छी तनख्वाह ऑफर की जाती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।