
दिमाग को इतना भी आराम न दें Publish Date : 10/06/2026
दिमाग को इतना भी आराम न दें
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
डॉ. एडवर्ड मोजर न्यूरो साइंटिस्ट हैं। अपने महत्वपूर्ण काम के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने हाल ही में बताया कि जीपीएस, यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम के कारण मनुष्य के दिमाग की वह क्षमता खत्म होती जा रही है, जिससे वह रास्ते तलाशता था, उनकी एक छवि या नक्शे को अपने दिमाग में सेव कर लेता था, जिससे कि अगली बार उस रास्ते तक आसानी से पहुंचा जा सके।
डॉ. एडवर्ड की बात में दम है। आपने देखा होगा कि जब आप कैब में जाते हैं, तो कैब वाला आपसे लोकेशन शेयर करने को कहता है। उसी हिसाब से गूगल मैप के जरिये रास्ते को तलाशता है, जबकि पहले के ड्राइवरों को रास्ते याद रहते थे। इसी तरह कोई ऑटो वाला हो, या फिर किसी को घर आना हो, सभी को लोकेशन चाहिए। रास्तों को पहचानने और उन्हें याद करने की कोशिश दिखाई नहीं देती। पहले तो किसी पेड़, कुएं, विद्यालय, दुकान, पार्क आदि के लैंडमार्क (निशान) को याद करके हम अपने गंतव्य तक आसानी से पहुंच जाते थे।
कुछ दिन पहले मैं गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई के बारे में पढ़ रही थी कि एक बार भारत में उन्हें किसी मित्र ने रात के खाने पर बुलाया। वह वहां जाने के लिए जीपीएस के जरिये घर ढूंढते रहे, लेकिन नहीं पहुंच सके। जब पहुंचे, तो बहुत देर हो चुकी थी। घर के लोग खाना खाकर सो चुके थे। इसलिए, उन्होंने गूगल मैप के विकास की योजना बनाई। एक बार गूगल मैप की महत्ता बताने के लिए उन्होंने ऐसा कहा था कि अब कोई भी स्थान ढूंढना कितना आसान है। हालांकि, बहुत-सी ऐसी घटनाएं भी पढ़ी हैं, जहां गूगल मैप ने गलती की और लोगों की जान पर बन आई। तकनीक हमारे जीवन को सरल जरूर बनाती है, लेकिन वह हमारे दिमाग की प्राकृतिक क्षमता को कम भी करती है।
एक बार एक परिजन ने कहा था कि लैंडलाइन के जमाने में उन्हें सैकड़ों नंबर मुंह- जबानी याद थे। कभी फोन डायरेक्टरी या उस डायरी को देखने की जरूरत नहीं पड़ती थी, जिसमें फोन नंबर्स दर्ज होते थे। लेकिन अब मोबाइल में नंबर सेव हो जाते हैं, जरूरत पड़ने पर उन्हें एक क्लिक से निकाला जा सकता है, इसलिए याद रखने की आवश्यकता नहीं।

कई साल पहले एक सब्जी वाले से सब्जी खरीद रही थी। सब्जी वाला दाम बताता जाता और यह लेखिका उंगलियों पर हिसाब लगाती जाती। अपना हिसाब ठीक है, यह जानने के लिए सब्जी वाले से पूछा कि कितने पैसे हुए, उसने फौरन कैलकुलेटर निकाला और हिसाब लगाकर बताया। उससे पूछा कि बिना इसके हिसाब नहीं लगा सकते, तो उसने हंसकर कहा, 'आंटी जी, क्यों दिमाग लगाऊं, जब इससे आसानी से हिसाब लगाया जा सकता है।'
पिछले ही दिनों साइबर कैफे से कुछ काम कराने गई, वहां हिसाब लगा रही थी कि कैफे में काम करने ऐसी वाला लड़का कैलकुलेटर पकड़ाने लगा। उससे कहा कि यों ही हिसाब लगा लूंगी। इन दिनों हर दुकानदारके पास कैलकुलेटर हैं, यानी कि लोग उंगलियों पर हिसाब लगाना भूल चुके हैं। मामूली जोड़-घटाव भी आसानी से नहीं कर सकते, जबकि हमारी पीढ़ी या उससे पहले वाली अनेक पीढ़ियां यह हिसाब बिना किसी तकनीकी मदद के लगा सकती थीं। लोगों को सवा और ढाई तक के पहाड़े याद थे। अब तो यहां तक है कि बच्चे इम्तिहान के दिनों में गणित के पेपर के दौरान भी कैलकुलेटर मांगते हैं।
इतना ही नहीं पुराने जमाने में लोग मीलों तक बिना किसी सवारी के पैदल ही पहुंच जाते थे। इससे उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता था, लेकिन साइकिल, बाइक, कार आदि की उपलब्धता के कारण, अब बहुत कम लोग पैदल चलना चाहते हैं। हां, ट्रेडमिल पर पैदल चलना जरूर वे स्वास्थ्य के लिए जरूरी समझते हैं।
हमारे शरीर में जितने भी अंग हैं, उनकी उपयोगिता है। इसीलिए उनका इस्तेमाल करना जरूरी है। जिस तरह से यदि किसी मशीन का अरसे तक इस्तेमाल न किया जाए, तो वह खराब हो जाती है, यही हाल शरीर का है। आप जिन अंगों का इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं, धीरे-धीरे प्रकृति उन्हें आपके शरीर से खत्म कर देती है।
कहा जाता है कि मनुष्य के विकास के क्रम में पहले उसके बड़े-बड़े कान हुआ करते थे, पर वे छोटे हो गए। इसी तरह मनुष्य की पूंछ भी खत्म हो गई। आज भी भ्रूण के विकसित होने के दौरान उसकी पूंछ होती है, लेकिन वह गर्भावस्था में ही झड़ जाती है।इसलिए कहीं ऐसा न हो कि हमारे दिमाग से भी बहुत-सी क्षमताएं गायव हो जाएं, जिनका इस्तेमाल कम होता जा रहा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
