फैसलों में उलझन मतलब डिसीजन फटीग      Publish Date : 16/05/2026

     फैसलों में उलझन मतलब डिसीजन फटीग

                                                                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर

काम की प्राथमिकताएं तय करने, उसे करने या न करने का निर्णय लेने में उलझन वाली स्थिति डिसीजन फटीग कहलाती है। इसे सही रणनीति और जागरुकता के जरिये नियंत्रित किया जा सकता है।आज के तेज-तर्रार और विकल्पों उसे भरे युग में हम प्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े निर्णय लेते हैं, सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक। इसमें क्या खाना है, कौन सा काम पहले करना है, किस संदेश का जवाव देना है। ये सभी निर्णय हमारे मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं। लगातार निर्णय लेने की इस प्रक्रिया के कारण जो मानसिक थकान उत्पन्न होती है, उसे निर्णय थकान या डिसीजन फटीग कहा जाता है। निर्णय थकान का अर्थ है, जब व्यक्ति बहुत अधिक निर्णय ले चुका होता है, तो आगे डॉ. संजय तेवतिया निर्णय लेने की उसकी वरिष्ठ चिकित्सक क्षमता कमजोर हो जाती है। इस स्थिति में व्यक्ति या तो निर्णय लेने से बचने लगता है या फिर जल्दबाजी में गलत फैसले कर बैठता है। यह समस्या विशेष रूप से उन लोगों में अधिक देखी जाती है, जो उच्च्च जिम्मेदारियों वाले पदों पर होते हैं जैसे-प्रबंधक, शिक्षक, चिकित्सक याव्यवसायी।

क्या है वजह

                                    

डिसीजन फटीग के मुख्य कारणों में सबसे प्रमुख है विकल्पों की अधिकता। आज के डिजिटल युग में हमारे पास हर चीज के लिए अनेक विकल्प मौजूद हैं। चाहे वह ऑनलाइन शॉपिंग हो, कॅरिअर का चयन हो या मनोरंजन के साधन। इतनी अधिक विविधता होने के कारण हमारा मस्तिष्क लगातार तुलना करता रहता है, जिससे मानसिक ऊर्जा खर्च होती है। दूसरा कारण है लगातार मानसिक दबाव। जब व्यक्ति एक दिन में कई महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती जाती है। यह ऊर्जा सीमित होती है और जब यह खत्म होने लगती है, तो निर्णय लेने की गुणवत्ता भी गिरने लगी है।

पेशेवर जीवन पर प्रभाव

डिसीजन फटीग के लक्षण कई प्रकार से सामने आते हैं। व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर उलझन महसूस करने लगता है, निर्णय टालने लगता है या फिर बिना सोचे-समझे फैसले लेता है। ऐसी स्थिति में कई बार लोग अनावश्यक चीजें खरीद लेते हैं, गलत खान-पान चुनते हैं या अपने महत्वपूर्ण कार्यों को टालते रहते हैं। यह प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेशेवर जीवन को भी प्रभावित करता है। कार्यस्थल पर निर्णय थकान के कारण कार्यकुशलता प्रभावित हो सकती है, गलतियां बढ़ सकती हैं और कार्य की गुणवत्ता मेंगिरावट आ सकती है। इससे न केवल व्यक्ति, बल्कि पूरी संस्था प्रभावित हो सकती है।

प्रभावी उपाय अपनाएं

डिसीजन फटीग से बचने के लिए कुछ प्रभावी उपाय अपनाए जा सकते हैं। सबसे पहला उपाय है अपने दिन की योजना पहले से बनाना। यदि आप पहले से तय कर लेते हैं कि दिन में कौन-कौन से कार्य करने हैं, तो आपको बार-बार निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है प्राथमिकताएं तय करना। हर निर्णय समान महत्व का नहीं होता, इसलिए जरूरी है कि आप महत्वपूर्ण कार्यों को उस समय पूरा करें, जब आप मानसिक तौर पर पूरी तरह से तरोताजा हों। इससे आप बेहतर निर्णय ले पाएंगे। तीसरा उपाय है रुटीन बनाना। कई सफल लोग अपने दैनिक जीवन में एक निश्चित दिनचर्या अपनाते हैं, जैसे-एक ही समय पर उठना, व्यायाम करना और काम शुरू करना। इससे छोटे-छोटे निर्णय अपने आप तय हो जाते हैं और मानसिक ऊर्जा बचती है। इसके अलावा, समय-समय पर विश्राम लेना भी आवश्यक है। लगातार काम करने से दिमाग थक जाता है, इसलिए बीच-बीच में ब्रेक लेना, ध्यान करना या हल्का व्यायाम करना लाभदायक होता है।

हर चीज के लिए हां कहना जरूरी नहीं

एक महत्वपूर्ण पहलू है 'न' कहना सीखना। जब हम हर चीज के लिए हां कहते हैं, तो हमारे सामने अधिक निर्णय आ जाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हम केवल उन्हीं कार्यों को स्वीकार करें, जो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं। अंत में यह समझना जरूरी है कि डिसीजन फटीग एक सामान्य मानवीय स्थिति है और इससे बचाव संभव है। यदि हम अपने समय, ऊर्जा और प्राथमिकताओं का सही प्रबंधन करें, तो हम बेहतर और प्रभावी निर्णय ले सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।