
प्रतिभा पर भारी महंगी पढ़ाई Publish Date : 12/05/2026
प्रतिभा पर भारी महंगी पढ़ाई
प्रो0 आर. एस. सेंगर
1991 में उदारीकरण के बाद भारत बहुत बदल गया है। छात्रों के पास अब करियर के विकल्प बहुत ज्यादा हैं। इसके बावजूद निम्न मध्यमवर्ग और मध्यमवर्ग के परिवारों में बच्चों में डाक्टर -इंजीनियर बनाने का क्रेज अब भी पहले की तरह ही है। इस साल जेईई मेन के लिए 25 लाख छात्रों ने पंजीकरण कराया है। कोचिंग सस्थानों ने इस आकर्षण को समझते हुए एक इंडस्ट्री खड़ी कर ली है और प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने वाले संस्थानों का सालाना कारोबार करीब 58 हजार करोड़ रुपये का हो गया है। इसमें 40 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ इंजीनियरिंग सेगमेंट का है। सीटों की बात करें तो देश के सभी आइआइटी को मिला कर 17 हजार सीटें और एनआइटी व दूसरे संस्थान मिला कर कुल सीटें करीब 41 हजार हैं।
प्रतिस्पर्धा कितनी कड़ी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जेईई मेन में 99 पर्सेटाइल लाने के बावजूद आइआइटी में सीट मिलेगी इसकी गारंटी नहीं है क्योंकि करीब 30 हजार छात्रों ने 99 पर्सेटाइल हैं। इसमें कोचिंग संस्थानों की खास भूमिका है। अब डाक्टर और इंजीनियर बनना सिर्फ प्रतिभा और मेहनत से संभव नहीं है। इसके लिए संसाधन चाहिए। छात्र संस्थानों में पढ़ाई पर 18 से 25 लाख खर्च कर रहे हैं। कोचिंग संस्थान इन परीक्षाओं के पैटर्न का विश्लेषण करके इसके हिसाब से तैयारी करवाते हैं। इसीलिए अब 99 पर्सेटाइल सामान्य बन गए हैं। ऐसे में वे प्रतिभाशाली छात्र प्रवेश परीक्षाओं की दौड़ में नुकसान की स्थिति में होते हैं, जो कोचिंग संस्थानों पर लाखों खर्च नहीं कर सकते। प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और संसाधनों की भूमिका की पड़ताल आज का अहम मुद्दा है।
कम संभावना और कड़ी मेहनत

वया हम में से कोई भी ऐसा काम करना चाहेगा जिसमें दो साल तक रोज 12-14 घंटे मेहनत करनी पड़े, लेकिन सफलता मिलने की उम्मीद 3 प्रतिशत से भी कम हो? हर साल भारत में 30 लाख से ज्यादा छात्र एनईईटी, जेईई और सीयूईटी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं ताकि वे आइआटी, एनआइटी और पम्ना जैसे बड़े संस्थानों में दाखिला पा सकें। उदाहरण के लिए, नीट (एनईईटी) 2025 में 22 लाख से ज्यादा छात्र थे, जबकि सरकारी और प्राइवेट सीटें मिलाकर केवल 60,000 के करीब थीं। यानी सफलता की दर मात्र 3 प्रतिशत है। आइआइटी के लिए तो यह और भी मुश्किल है।
नियामक संस्थाओं की भूमिका
सीबीएसई, एआइसीटीई, यूजीसी और एनएमसी जैसी संस्थाओं को इस व्यवस्था में सुधार करना बाहिए। सरकार को नियम बनाने चाहिए कि कोचिंग संस्थान अपनी सफलता का सही अनुपात जनता को बताएं, उनके लिए लाइसेंस अनिवार्य हो और वहां मानसिक स्वास्थ्य के लिए परामर्श की सुविधा हो।
कोचिंग इंडस्ट्रीः सपनों का व्यापार
भारत में कोचिंग का कारोबार 58,000 करोड़ से ज्यादा का है। इसके बावजूद सफलता की दर बहुत कम है। कोचिंग संस्थान हर छात्र को एक ही तरीके सेपढ़ाते है, बिनायह समझे किहर बच्चे कीक्षमता अलगहोती है। वेसिर्फ 'आधीक्टिव' (बहुविकल्पीय) सवाल हल करना सिखाते हैं, जबकि बोर्ड परीक्षाओं के लिए अलग तरह के कौशल की जरूरत होती है। ये संस्थान विज्ञापनों में अपनी सफलता तो बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, लेकिन छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को छुपा जाते हैं।
बेहतर भविष्य के लिए जरूरी बदलाव
माता-पिता को अपने बच्चों की पसंद का सम्मान करना बाहिए। उन्हें समझना होगा कि हर बच्चा आइआइटी या एम्स नहीं जा सकता। वहीं, नीति निर्माताओं को स्कूल जाना अनिवार्य करना चाहिए और कालेज दाखिले में बोर्ड परीक्षा के अंकों को भी महत्व देना चाहिए। कोचिंग संस्थानों में छात्र और शिक्षक का सही अनुपात होना चाहिए और वहां योग, संगीत और खेल जैसी गतिविधियों को भी शामिल करना चाहिए।
तनाव और पढ़ाई का बढ़ता बोझ
छात्र की काबिलियत सिर्फ 3 घंटे की परीक्षा से तय की जाती है। इससे छात्रओं पर मानसिक दबाव बढ़ गया है। माला-पिता और समाज के दवाव में छात्र कोचिंग संस्थानों की और भागते है और कोटा या दिल्ली जैसे शहरों में रहकर तैयारी करते हैं। कई छात्र ती बिना इच्छा के भी सिर्फ दिखावे या विकल्पों की कमी के कारण इस चूहा दौड़ में शामिल हो जाते हैं।
'डमी स्कूल' का बढ़ता चलन
कई प्राइवेट स्कूल अब 'उमी मोड' पर चलते है। यहां छात्र सिर्फ नाम के लिए दाखिला लेते हैं लेकिन पूरा समय कोचिंग में बिताते हैं। ये स्कूल फीस तो पूरी लेते हैं पर शिक्षा नहीं देते। सीबीएसई के नियमों के खिलाफ होने के बावजूद कई स्कूल कानूनी खानियों का फायदा उठाकर इसे चला रहे हैं।
पढ़ाई के असली मतलब से भटकाव
कोचिंग संस्थान सिर्फ विज्ञान और गणित पर ध्यान देते हैं, जिससे कला, खेल और रचनात्मकता पीछे छूट जाती है। यह हमारी नई शिक्षा नीति 2020' के भी खिलाफ है, जो सर्वांगीण विकास पर जोर देती है। लगातार पढ़ाई और अकेलेपन के कारण छात्र मोटापे, डिप्रेशन और कम आत्मविश्वास जैसी समस्याओं का शिकार हो रहे हैं।
परीक्षा से आगे भी है सफलता
भारत को परीक्षा के जुनून से बाहर निकलकर सीखने और रचनात्मकता पर ध्यान देने की जरूरत है। कोचिंग सिर्फ सहायता के लिए होनी चाहिए, न कि छात्र के मानसिक बोझ का कारण। हमें एक ऐसा सिस्टम बनाना होगा जो सिर्फ टेस्ट स्कोर को नहीं, बल्कि छात्र के व्यक्तित्व और खुशी को भी महत्व दे।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
