अस्पतालों पर दबाव कम होगा      Publish Date : 15/03/2026

          अस्पतालों पर दबाव कम होगा

                                                                                                     प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

नीट-पीजी में दाखिले को लेकर जो फैसला लिया गया है, उसका दूरगामी असर पड़ेगा। देश भर में हजारों स्नातकोत्तर मेडिकल सीटें खाली रहने के कारण अब कटऑफ स्कोर घटा दिया गया है। खबर है कि राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड ने काउंसलिंग के दूसरे चरण के बाद योग्यता प्रतिशत में भारी कटौती की है। नए मानक के मुताबिक, सामान्य वर्ग के लिए कटऑफ 50 से घटाकर सात पसेंटाइल और आरक्षित वर्गों के लिए 40 से घटाकर शून्य पसेंटाइल कर दिया गया है। यह करना जरूरी था।

दरअसल, इस साल 2.4 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने नीट-पीजी परीक्षा दी थी, जबकि भारत में स्नातकोत्तर पढ़ाई के लिए सीटें लगभग 80 हजार हैं। माना जा रहा है कि इनमें करीब 20 हजार सीटें खाली रह गई थीं। ऐसे वक्त में, जब अस्पतालों पर मरीजों का बोझ अधिक हो और विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत महसूसकी जा रही हो, तब हजारों सीट खाली रखने का कोई औचित्य नहीं है।

                               

कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि इससे अक्षम चिकित्सक संस्थानों में आ जाएंगे। यह गलत सोच है। सबसे पहले तो यह समझना होगा कि नीट-पीजी की परीक्षा कोई आम नौजवान नहीं देता, बल्कि एमबीबीएस पास चिकित्सक देते हैं। इतना ही नहीं, अभ्यर्थियों के लिए मेडिकल कौंसिल में पंजीकरण भी आवश्यक है। यानी, नीट-पीजी परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थी खुद डॉक्टर होते हैं और उनको सेवा देने के योग्य माना जाता है। ऐसे में, सिर्फ इसलिए कि वे ऊंची डिग्री हासिल करने के लिए जरूरी अंक नहीं पा सके, उनको अक्षम कह देना, उनकी योग्यता पर सवाल उठाना होगा।

हम अपने आसपास ही देखें कि कितने एमबीबीएस डॉक्टर प्रैक्टिस करते रहते हैं और हम खुशी-खुशी उनसे इलाज कराते हैं। वे कोई झोला छाप नहीं होते।

                               

इस फैसले की जानकारी देते हुए अधिकारियों ने उचित कहा कि इसका मकसद उपलब्ध सीटों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहे दबाव कम किए जा सकें। कोरोना काल में हमने देखा था कि किस तरह डॉक्टरों की कमी से देश जूझ रहा था। आज डॉक्टरों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन गांव-गांव तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के लिए हमें कई डॉक्टर चाहिए। इसलिए, पसेंटाइल कम करने को लेकर बहस खड़ा करने की जरूरत नहीं है।

चिकित्सा की पढ़ाई को केवल अंकों से मत तौलिए। यह मरीज की सुरक्षा और समाज के भरोसे का भी सवाल है। ऐसी बहस खड़ी करने से लोगों का भरोसा चिकित्सकों पर से डिग सकता है। इससे हमें बचना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।