
उद्यान विज्ञान में रोजगार की अपार संभावनाएं Publish Date : 30/01/2026
उद्यान विज्ञान में रोजगार की अपार संभावनाएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
बागवानी विज्ञान के साथ ही कला भी है। पौधों की कटाई-छुटयाई, उन्हें उगाने के तौर-तरीके तथा एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने जैसी गतिविधियों के लिए विशेष जानकारी और अनुभव चाहिए।' उपवन विनोद' जैसे प्राचीन ग्रंथ से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में ही बागवानी की कला विकसित हो चुकी थी। लोगों को कलम लगाने की विधि तथा पड़े पौधों को कीड़े-मकोड़ों से बचाने की जानकारी थी।
मुगल काल में बागवानी का जोरदार विकास हुआ। भारत में विज्ञान के रूप में बागवानी का विकास वर्ष 1928 से माना जाता है जब इम्पीरियल काउन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की स्थापना हुई। इसके माध्यम से प्रत्येक राज्य में अनुसंधान केंद्र स्थापित किये गये और अनुसंधान का सूत्रपात हुआ। आठवीं योजना में भारत सरकार ने बागवानी को उच्च प्राथमिकता दी परिणामस्वरूप आज भारत फल, सब्जी व फूलों के उत्पादन की दृष्टि से विश्व के अग्रणी देशों में है।
आज महानगरों में लैंडस्केपिंग का काम तेजी से बढ़ रहा है। इसमें भूमि का सौंदर्याकरण किया जाता है। वागवानी इसका महत्वपूर्ण अंग है। पौधों, सब्जियों व गार्डनिंग हेतु नर्सरी और सलाह केंद्र खोलना कमाई का साधन बन गया है। भूमि की कमी और बढ़ते फैशन की वजह से रूफ फार्मिंग और किचन गार्डनिंग का प्रचलन बढ़ा है। बागवानी में जाने वालों का प्रकृति प्रेमी होना जरूरी है। उसमें शारीरिक श्रम की क्षमता भी होनी चाहिए।
मौसम चाहे कंपकंपाती सर्दी का हो या चिलचिलाती धूप वाला, उसे बगीचे में जाकर काम करने के लिए हरदम तैयार रहना चाहिए। इस व्यवसाय में तरक्की करने के लिए बेहतर, स्प्रेषण का होना भी बेहद जरूरी है।
उद्यान विज्ञान की शाखाएंपौधशाला और उद्यान प्रबंधन:- इस के तहत बगीचे के विकास, भू-आकृति को आकर्षक बनाने तथा पौध लगाने के तौर-तरीकों के बारे में बताया जाता है।
फल और सब्जी टेक्नोलॉजी:- इसके अंतर्गत प्रसंस्करण और परिरक्षण के तकनीक की जानकारी दी जाती है।
फ्लोरीकल्बर:- इसके अंतर्गत फूल वाले और सजावटी पौधों के बारे में अध्ययन किया जाता है।
आलेरीकल्बर:- इसके तहत साग-सब्जियों के उत्पादन का अध्ययन किया जाता है।
पोमालॉजीः- इसके अंतर्गत फूलदार पेड़ पौधों को उखाने और बढ़ाने के तौर-तरीकों की, जानकारी दी जाती है।
शिक्षा:- इस समय 33 कृषि 5 समकक्ष विश्वविद्यालय, मान्यतावाली संस्थाएं (इनमें 4 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के संस्थान है), तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय उद्यान विज्ञान की शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। यहां इसमें स्नातक और स्नातकोत्तर और पी, एचडी किया जा सकता है।
उद्यान विज्ञान में वी. एस सी (स्नातक)

यह चार साल का पाठ्यक्रम है जो करीब 26 कृषि विश्वविद्यालयों में उपलब्ध है। इसमें आम तौर पर सामान्य बागवानी, फल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, पुष्पोत्पादन और फसल तोड़ने के बाद की तकनीक के बारे में पढ़ाया जाता है। विज्ञान विषयों के साथ 10-2 परीक्षा पास विद्यार्थी इस पाठाक्रम में प्रवेश ले सकते हैं।
प्रवेश कैसे और कब
कुल उपलब्ध सीटों में से 15 प्रतिशत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्द्वारा संचालित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर भरी जाती है। यह परीक्षा हर साल मई/जून में होती है। बाकी 85 प्रतिशत सीटें कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित परीक्षाओं के जरिए भरी जाती है।
आवेदन का तरीका: केंद्रीय कोटा (आई.सी.ए.आर./बी.सी.आई) के अंतर्गत, प्रवेश चाहने वाले उम्मीदवार निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित संस्था को आवेदन कर सकते हैं। विश्वविद्यालय में प्रवेश चाहने वाले उम्मीदवार संबंधित विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से विस्तृत सूचना प्राप्त कर सकते हैं।
छात्रवृत्ति: परिषद् राज्य के बाहर के किसी भी विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में वरीयता के आधार पर 800 रुपया मासिक प्रतिभा छात्रवृत्ति प्रदान करता है। बी.एस.सी के लिए 15 छात्रवृत्तियां उपलब्ध है। परिषद् की अखिल भारतीय संयुक्त परीक्षा के आधार पर एम. एससी करनेवाले 29 विद्यार्थियों को जूनियर रिसर्व फेलोशिप दी जाती है। इसके अंतर्गत 3000 रुपये मासिक के अलाया आकस्मिक कार्यों के लिए 6000 रुपये सालाना दिये जाते हैं। परिषद विश्वविद्यालयों और समकक्ष मान्यता वाले संस्थानों में पीएचडी करने वाले उम्मीदवारों को अनुसंधान फेलोशिप प्रदान करती है। यह फेलोशिप कृषिवैज्ञानिक चयन बोर्ड द्वारा आयोजित के आधार पर दी जाती है।
रोजगार के अवसर
कई राज्यों में स्वतंत्र बागवानी विभाग हैं। सरकारी क्षेत्र में वनस्पति विशेषज्ञ, उद्यान वैज्ञानिक, पुष्पोत्पादन विशेषज्ञ, लैंडस्केपिंग ऑफिसर, नर्सरी और वगान प्रभारी, उद्यान प्रबंधक, जिला कृषि अधिकारी और व्याख्याता जैसे पद है। निजी क्षेत्र में भी इनकी उतनी ही मांग है। कृषि क्लीनिक खोलकर बागवानी, डिजाइन, पर्यवेक्षण और ग्रीन हाउस के बारे में परामर्श देने का काम भी किया जा सकता है। बीजों का उत्पादन, बागवानी उत्पादों का प्रसंस्करण आदि को शिक्षा के लिए संस्थान भी खोल सकते हैं।
प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
- सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ (उत्तर प्रदेश)।
- नरेद्र देव कृषि व प्रौद्योगिकीविश्वविद्यालय फैजाबाद, (उ.प्र.)
- चंद्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर, (उत्तर प्रदेश)।
- बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, (उत्तर प्रदेश)।
- राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)।
- डा. यशवंत सिंह परमार उद्यान विज्ञान और वानिकी विश्वविद्यालय, सोलन (हि.प्र.)।
- भारतीय उद्यान विज्ञान अनुसंधान संस्थान, बंगलूर।
- महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय राहुरी, महाराष्ट्र।
- विरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची, झारखंड।
- आचार्य एन.जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबाद।
माली प्रशिक्षण संस्थान
- पंजाब राव देशमुख कृषि विद्यापीठ अकोला महाराष्ट्र।
- रामकृष्ण मिशन, दिव्यायना केंद्र रांची, झारखंड।
- राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय समस्तीपुर, बिहार कृषि बागवानी सोसाइटी, पब्लिक गार्डन हैदराबाद।
- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना।
प्रमुख कृषि विश्वविद्यालय
- असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहट (असम)।
- चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा)।
- इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (छत्तीसगढ़)।
- राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर (राजस्थान)।
- जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जक्तपुर (मध्यप्रदेश)।
- गोविंद बालभ पंत कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंत नगर, उधम सिंह नगर (उत्तरांचल)।
- पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना (पंजाब)।
- तमिलनाडु कृषि, विश्वविद्यालय कोयंबटूर (तमिलनाडु)।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
