
शिक्षा रखती है हरदम आगे Publish Date : 03/01/2026
शिक्षा रखती है हरदम आगे
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
“किसी भी तरह की शिक्षा कभी बेकार नहीं जाती। यह हमारे ऊपर है हम खुद के साथ-साथ समाज और देश को आगे ले जाने में उसका किस तरह से सदुपयोग करते हैं। यह मूल्यों और नैतिकता से भी जुड़ी है। सिविल सेवा परीक्षा के क्षेत्र में अपने व्यापक अध्ययन व अनुभवों के आधार पर आज के संदर्भ में शिक्षा और ज्ञान के विभिन्न पहलुओं को व्याख्यायित कर रहे हैं प्रोफेसर आर. एस. सेंगर.............
हर किसी को एक जैसी शिक्षा मिलती है। अब यह हमारे ऊपर है कि हम इसका अच्छे उद्देश्यों के लिए उपयोग करते हैं या नकारात्मक चीजों के लिए। जब हम इसे मानवीय संदों से जोड़ते हैं, तब 'कल्चरल कंडीशनिंग ऑफ माइंड' होती है। । मनुष्य ने सबसे पहले नाप-तोल करना सीखा। आग जलाना सीखने के बाद जब उसे नियंत्रित करना और उसे मूल्यों के साथ इस्तेमाल करना सीख लिया, तब इसे वास्तविक अर्थों में ज्ञान होना माना गया। खुद सीखने के साथ-साथ ज्ञान को अगली पीढ़ी में किस तरह सही रूप में हस्तांतरित करना है, यह एक तरह से सांस्कृतिक प्रकिया है।
हां, इसमें हर व्यक्ति आर्थिक पहलू भो ढूंढ़ता है। वह अपने मन मुताबिक ऐसा काम कर सके, जिसमें उसे सुकून भी मिले। इसीलिए काम को अलग-अलग विधाओं/विद्याओं से जोड़ दिया गया, , जैसे-विज्ञान, भूगोल, इतिहास आदि।
रुचि का हो विषयः सिविल सेवा परीक्षा के लिए मुझ से तमाम छात्र पूछते हैं कि ऐसा कौन-सा विषय लें, जो लोकप्रिय और स्कोरिंग हो। यूपीएससी हर विषय के जानकार चाहती है। सरकार में भी अलग-अलग ज्ञान के लोगों की जरूरत होती है। मैं उन बच्चों से कहता है कि सबसे पहले यह देखो कि तुम्हारी रुचि किसमें है। अगर इस बारे में दुविधा हो, तो एनसीईआरटी की नौवीं, दसवीं की प्रारंभिक किताबें पढ़ो। ऐसा नहीं है कि तुम्हारी री किसी विषय में रुचि नहीं होगी। कहीं न कहीं रुचि होगी ही, उसे तलाशी। अपना ज्ञान बढ़ाओं। तुम आइएएस बनो या न बनी, लेकिन इससे तुम्हें जो नॉलेज मिलेगी, उसका फायदा कहीं न कहीं जरूर मिलेगा।
इसके अलावा, आप सभी अच्छे इंसान भी जरूर बन जाएंगे। जो अभ्यर्थी आइएएस में 2 या 5 नंवर से फेल हो जाता है, इसका मतलब यह नहीं कि वह अच्छा इंसान नहीं है। आइएएस की परीक्षा ती एक तरीका है, चयन करने का। एक व्यक्ति के ज्ञान को परिपक्व होने में दशकों लग जाते हैं, उसे तीन घंटे की परीक्षा में पूरी तरह से नापा नहीं जा सकता। जो पास हो गए, बेशक उन्हें अपनी मंजिल मिल गई, पर जो रह गए, उन्हें कोई और मंजिल मिलेगी।

इस बारे में एक रोचक बात साझा करना चाहता हूं। हमारे वर्तमान राष्ट्रपति कानपुर से लॉ करने के बाद दिल्ली आए थे आइएएस की तैयारी करने। पर तीन बार एग्जाम देने के बाद असफल रहे। हां, तीसरी बार उन्हें ग्रुप बी सर्विस मिली थी, लेकिन उसमें उसमें संतुष्टि न मिलने पर कुछ ही माह बाद उन्होंने उसे छोड़ दिया। उसके बाद बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन करा कर वकील बन गए। काहने का मतलब यह है कि तीन बार के प्रयास में आइएएस नहीं बने, तो कहानी खत्म नहीं हो गई। वह सफर पूरा हुआ देश का राष्ट्रपति बनकर।
काम आएं लोगों केः अक्सर यह देखा जाता है कि आइएएस में फेल होने पर युवा बहुत व्यथित हो जाते हैं या फिर पास होने पर खूब खुशियां मनाते हैं। मेरे ख्याल से ऐसा नहीं होना चाहिए। आप कितने अच्छे अधिकारी है, इसका पता आपके काम से चलता है। आप किसी के लिए कुछ अच्छा कर सकें। उनकी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सके। किसी समस्या को हल कर सकें, असली खुशी तब माननी चाहिए।
सलेक्ट हो जाने के बाद आपके ऊपर कुछ कर दिखाने की जिम्मेदारी होती है। आपको जो नंबर मिले हैं, उससे ज्यादा आपकी कीमत है। मान लें, किसान सालों-साल जमीन-खेती के लिए लेखपाल कानूनगो के चक्कर लगाते हैं। आपकी एक पहल से पलक झपकते ही उनकी समस्या का निपटारा हो सकता है। लेकिन अधिकारी आज रिस्क नहीं लेते। वे सोचते हैं कि हमारे पहले के लोगों ने नहीं किया, तो मैं क्यों करूं।

अदालत जब कहेगी, तो देखा जाएगा। फिर आप किसलिए है। अदालत तो किसान के खेत तक नहीं जा सकती, पर आप तो जा सकते हैं। दुविधा की स्थिति में रहने की बजाय वहां जाएं और समस्या को समझकर उसका फैसला करें। अगर जनसेवा की भावना आपके भीतर नहीं है, तो सिर्फ गाल बजाने की जरूरत नहीं है कि मेरी रैंक इतनी है, में दस लाख के बीच से चुना गया हूं।
जानने की रखें इचजः हमेशा नवा जानने, सीखने की इच्छा रखें। फिर उस पर नैतिकता के साथ अमल करें। एटम बम की खोज अणु शक्ति को जानने की लिए हुई थी, न कि विनाश के लिए। यह अलग बात है कि बाद में उसका इस्तेमाल बम बनाने के लिए किया जाने लगा। दरअसल, ज्ञान दुधारी तलवार है। यह आगे भी काटती है और पीछे भी।
समय और परिस्थिति के अनुसार सबके हित में इसका सदुपयोग करना चाहिए। मैं अपनी कक्षा के छात्रों से कहता हूं कि आप आइएएस बनें या नहीं, लेकिन यह जरूर देखें कि यहां से जाने के बाद आपके सोचने-समझने का नजरिया कितना बदला है। आइएएस बनना कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, ज्ञान बहुत बड़ी चीज है। इसको आत्मसात करें। इससे आपकी सोच में बदलाव आना चाहिए। एक उक्ति है, 'केवल सच को जान लेने से आप सच हो जाते हैं।' ज्ञान पता नहीं आपको कहां से कहां पहुंचा सकता है। इसका आनंद उठाएं।
ज्ञान के सागर में डूब भी जाएं, तो गम नहीं होना चाहिए। में इन दिनों शास्त्रीय संगीत के बारे में पढ़ रहा हूं। इसका मतलब यह नहीं कि मुझे संगीतकार बनना है। कोई परीक्षा देनी है। फिर भी में गंभीरता से पढ़ रहा हूं, क्योंकि मुझे इसमें आनंद आ रहा है। मुझे कुछ समझ में नहीं आएगा, तो पढूंगा। ज्ञान से आपको सुकून मिल सकता है। हम लोग आमतौर पर पढ़ाई को डिग्री और नौकरी से जोड़कर देखते हैं। जीवन ऐसे नहीं चलता। यह मानसिकता ठीक नहीं। हर चीज के बारे में हानि-लाभ के हिसाब से न सोचें। एक अच्छा इंसान बनने पर ध्यान दें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
