स्पेस साइंस / इंजीनियरिंग अवसरों का खुला आसमान      Publish Date : 19/12/2025

           स्पेस साइंस / इंजीनियरिंग अवसरों का खुला आसमान

                                                                                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

“भारत अपने भावी अंतरिक्ष स्टेशन, सूर्य मिशन, गगनयान तथा चंद्र मिशन जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों के अलावा उपग्रहों और न्यू जेनरेशन राकेट की सफल लांचिंग से दुनिया में अलग पहचान बना रहा है। इससे स्पेस साइंस इंजीनियरिंग में रुचि रखने वाले युवाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं”।

भारत इन दिनों अमेरिका, रूस और चीन की तरह अपने स्वदेसी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के माध्यम से तीन अंतरिक्ष यात्रियों के दल को अंतरिक्ष में ले जाने की तैयारियों में जुटा है। इसके अलावा, चंद्रयान-3 की सफलता के बाद अब भारत चंद्रयान-4 अंतरिक्ष मिशन की तैयारी भी कर रहा है। इतना ही नहीं, उपग्रहों की लांचिंग में भारत आज इतना आगे बढ़ चुका है कि वह दूसरे देशों के उपग्रहों को अपने यहां से लांच कर रहा है।

      कहने का आशय यह है कि अंतरिक्ष में खोज अभियानों के मामले में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आज किसी से कम नहीं है। वह अंतरिक्ष में भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए अपने इनोवेशन और खोज अभियानों को लगातार आगे बढ़ा रहा है। जाहिर है इससे इसरो और इसके अनुषंगी संगठनों में स्पेस साइंस स्पेस इंजीनियरिंग से जुड़े कुशल युवाओं के लिए करियर की संभावनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

                                                                    

तेजी से बढ़तीं संभावनाएं: भारत जैसी विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले देश में मौसम के अनुमानों का शुरू से बहुत महत्व रहा है। इसके लिए लगातार इसरो के स्पेस सेंटर से कोई न कोई सैटेलाइट या राकेट लांच होते रहते हैं। अग्नि बाण नाम से ऐसा ही एक क्रायोजेनिक 3डी प्रिंटेड इंजन राकेट कुछ माह पहले काफी चर्चा में रहा, जो वजन और लागत दोनों में कम है और केरोसिन व लिक्विड आक्सीजन फ्यूल से उड़ाया जा सकता है।

यह एक स्टार्टअप कंपनी द्वारा लांच किया गया राकेट है। विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दिनों में निजी क्षेत्र की तमाम टेक कंपनियों से लेकर स्टार्टअप कंपनियां अपनी तकनीकों को बेहतर बनाने या दूरदराज के क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बढ़ाने, मौसम के अनुमानों की सटीकता बढ़ाने के उद्देश्य से स्वयं के छोटे-छोटे सैटेलाइट का इस्तेमाल करने के लिए आगे आएंगी।

      जाहिर है इससे स्पेस इनोवेशन में रुचि रखने वाले युवाओं के लिए इस तरह की कंपनियों में भी अवसर बढ़ने वाले हैं। इससे स्पेस साइंस एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले युवाओं के लिए इन सभी जगहों पर भी अवसरों के नये द्वार खुलेंगे। वैसे भी, केंद्र सरकार की ओर से स्पेस तकनीक को लगातार प्रोत्साहित करने और वर्ष 2020 से अंतरिक्ष के क्षेत्र को सभी के लिए खोले जाने से कई निजी कंपनियां इस क्षेत्र में रुचि ले रही हैं।

                                                                    

आकर्षक अवसरः स्पेस साइंस एयरोस्पेस इंजीनियरिंग से संबंधित कोर्स करने के बाद युवा इस क्षेत्र में एस्ट्रोनाट, एयरोस्पेस इंजीनियर, स्पेस साइंटिस्ट, टेक्नोक्रैट के अलावा अपनी योग्यता के आधार पर यहां टेक्निशियन, एआइ एक्सपर्ट, डाटा साइंटिस्ट जैसे विभिन्न रूपों में भी आकर्षक करियर बना सकते हैं।

विशेष तौर से जो युवा इंजीनियर या विज्ञानी के रूप में इसरो या इसके अन्य संगठनों में जाना चाहते हैं, उन्हें हाईस्कूल और 12वीं में मैथ, साइंस और केमिस्ट्री विषयों में रुचि लेकर पढ़ाई करने की जरूरत है। इसी के आधार पर आगे चलकर स्पेस साइंस या एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिग्री लेनी होगी। आमतौर पर मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल व कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने वाले या फिर एस्ट्रोनामी, फिजिक्स या मैथ में पीएचडी करने वालों को ही इसरो में विज्ञानी के रूप में प्राथमिकता मिलती है।

इसरो में विज्ञानी और इंजीनियर पदों के अलावा मिशन प्लानर, कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट, प्रोजेक्ट मैनेजर, क्वालिटी कंट्रोल प्रोफेशनल तथा ऐंडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ के पदों पर भी भर्तियां होती रहती हैं, जिसके लिए वांछित क्षेत्र से संबंधित योग्यता होनी चाहिए। इसरो में सभी भर्तियां प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से होतो हैं, जिन्हें इसरो स्वयं अपने सेंट्रलाइज्ड रिक्रूटमेंट बोर्ड के माध्यम से आयोजित करता है।

कोर्स एवं योग्यताः अंतरिक्ष विज्ञान/इंजीनियरिंग में करियर बनाने के लिए मुख्य रूप से स्पेस साइंस या इंजीनियरिंग (इलेक्ट्रानिक्स, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल तथा कंप्यूटर साइंस) की पढ़ाई करना जरूरी है। इसके लिए 12वीं पीसीएम विषयों से होना चाहिए। इसके अलावा, बीटेक इन एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, बीटेक इन एवियोनिक्स, मास्टर इन एस्ट्रोनामी जैसे कोर्स के माध्यम से भी इसरो और इससे जुड़े संगठनों में आप अपने करियर को आगे बढ़ा सकते हैं।

इंडियन इंस्टीट्यूट आफ स्पेस टेक्नोलाजी (आइआइएसटी), तिरुवनंतपुरम व इंडियन इंस्टीट्यूट आफ रिमोट सेंसिंग (आइआइआरएस) देहरादून में संचालित कोर्स मुख्य रूप से इसरो की जरूरत को ध्यान में रखकर ही कराया जाता है। इस संस्थान से कोर्स करने वाले छात्रों को इसरो अपने यहां नियुक्ति में प्राथमिकता भी देता है। इसके अलावा, देश में कई अन्य संस्थानों द्वारा भी स्पेस साइंस और स्पेस इंजीनियरिंग से संबंधित कोर्स संचालित कराए जा रहे हैं।

  • भारत द्वारा अब तक 424 से अधिक विदेशी उपग्रह, लांच किए गए हैं, जिसमें 389 उपग्रह पिछले नौ वर्षों में लांच किए गए हैं।
  • 104 उपग्रह पिछले साल लांच हुए: इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा से, जिसमें 101 अंतरराष्ट्रीय उपग्रह थे।
  • 2030 तक दुनिया में उपग्रहों का बाजार 83 लाख करोड़ रुपये (एक ट्रिलियन डालर) तक पहुंचने की उम्मीद है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।